<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805</id><updated>2012-02-16T18:13:52.242-08:00</updated><title type='text'>ख़बर वो, जो ले सबकी ख़बर...</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>64</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-5348958523628888940</id><published>2012-01-15T19:29:00.000-08:00</published><updated>2012-01-15T19:30:53.839-08:00</updated><title type='text'>अंधों में काना आर्यभट्ट</title><content type='html'>समाज में हमारे इर्द गिर्द कहावतों का दौर कुछ यूं पसरा हुआ है, जैसे भारत के कई हिस्सों में फैला 42 फीसदी कुपोषण। लेकिन हम अक्सर इन कहावतों को एक दम सटीक सच की तरह नहीं देख पाते। कहीं न कहीं कोई कमी जरुर रहती है। अंधों में काना राजा एक ऐसी ही कहावत है। क्या वाकई जहां सारे अंधे होते हैं वहां काना श्रेष्ठ होता है? ऐसी कहावतें जब सच की चादर ओढ़ती हैं, तो एक सामाजिक व्यंग भी होता है, और कई बड़े सवाल भी इसी व्यंग से जन्म लेते हैं। इसी कहावत की सच्चाई को मैने बड़े करीब से देखा है। &lt;br /&gt;                           तीन जनवरी 2012 की बात है । जब मैं बिना आरक्षण शाहजहांपुर की अकस्मात यात्रा पर निकला था। हाड़ कंपाती सर्दी में मैं रात बारह बजे स्टेशन पहुंचा। अनारक्षित श्रेणी के टिकट के लिए लाइन में लगा तो देखते ही देखते लाइन काफी लंबी हो गई। लेकिन टिकट खिड़की नहीं खुली। मेरी बारह चालीस की ट्रेन थी। करीब तीस मिनट खड़े रहने के बाद जब खिड़की खुली तो मेरा टिकट लेने का तीसरा नंबर था। मेरी बारी आई तो मैने अपनी जेब से टूटे नब्बे रुपए निकालकर टिकट खिड़की की ओर आगे बढ़ा दिए, और ये सूचना दी कि मेरा शाहजहांपुर तक का टिकट कर दो। अंदर से आई किर्र किर्र की आवाज़ से साफ इंगित हो रहा था कि शाहजहांपुर के टिकट की एक प्रति मेरे हाथ आने वाली है। कुछ सेकेंडों में टिकट तो मेरे हाथ था, लेकिन नब्बे रुपए में से बची हुई धनराशि मुझे वापस नहीं की गई। वो शायद रेलवे कर्मचारी ने बतौर मेहनताना अपनी जेब में रख ली थी। मैने भी इस बात को ज्यादा तूल देना उचित न समझा, क्योंकि मैं अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए लेट हो रहा था। अगर ये ट्रेन छूट जाती फिर मेरे पास शाहजहांपुर के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं थी। ऐसी स्थिति में मुझे टुकड़ों में ही जाना पड़ता। &lt;br /&gt;                     मैं प्लेटफॉर्म नंबर ग्यारह पर पहुंच गया। जहां ट्रेन खड़ी शायद मेरा ही इंतज़ार कर रही थी, क्योंकि उस वक्त रेलवे की घड़ी में 12:42 AM हो चुका था, जबकि उस ट्रेन का दिल्ली से चलने का टाइम 12:40 था। मैं अनारक्षित श्रेणी के एक डिब्बे में चढ़ गया जो बाहर से देखने पर बिल्कुल खाली दिखाई दे रहा था। इस डिब्बे में जैसे ही मैं आगे बढ़ा, एक कर्णभेदी  हूटर के साथ ट्रेन आगे की ओर चल दी। अब बोगी में मैं अपना बिस्तर लगाने की जुगत भिड़ा रहा था, क्योंकि मुझे ठंड भी लगी रही थी, और मैं उस दिन सुबह काफी जल्दी भी उठ गया था, जबकि अमूमन ऐसा होता नहीं कि किसी दिन सोकर मैं जल्दी उठा हूं। कूपा आशा से परे 95 फीसदी खाली था। इसलिए मुझे अपनी जगह तलाशने के लिए कुछ ज्यादा ही दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। कहां सोऊं, कहां बैठूं, कहां से बाहर के दृश्य बेहतर दिखेंगे, कहां से ठंडी हवा कम लगेगी, आदि अनादि कुछ ऐसे ही प्रश्न मेरे दिमाग में कौंध रहे थे। दस मिनट बाद मैं ये तय कर पाया कि अब मुझे फलां जगह तशरीफ टिका देनी चाहिए। मैने सीट पर चादर बिछाई और खिड़की के बगल से सटकर बैठ गया। कुछ देर खिड़की खोली रखी ताकि बाहर के मौसम का आनंद उठा सकूं, चूंकि हवा बेहद सर्द थी, इसलिए ज्यादा देर मौसम का मज़ा लेने का विचार मेरी नाक बहाने के लिए काफी था। इस तरह की किसी भी रिस्क से बचने हेतु मैने खिड़की का पहले शेटर बंद किया उसके बाद शीशा भी बंद कर दिया। अब मैं उस बेरहम हवा से पूरी तरह सुरक्षित था, जो मेरे बुखार और नज़ले का सामान अपने साथ लिए ट्रेन से बाहर बह रही थी। ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी, लेकिन काफी थकान के बावजूद मुझे उस दिन नींद नहीं आ रही थी। इसलिए मैने अपने बैग से शरद जोशी के व्यंगों पर आधारित एक किताब ‘यथा समय’ निकाली और उसके पढ़ने लगा। आंखे बोझिल हो रही थीं, लेकिन ‘यथा समय’ की कहानियों के सामने आंखे मूंदने का अब मन नहीं हो रहा था। वक्त बीतता जा रहा था, और मैं किताब के पन्ने पलटता जा रहा था। गाज़ियाबाद, पिलखुआ, और हापुड़ को ट्रेन पीछे छोड़ चुकी थी, मुझे इस बात का इसलिए पता था, क्योंकि इन तीन जगहों पर जब ट्रेन रुकी तो कुछ चाय वाले मेरी बोगी में अपनी ना पी सकी जाने वाली चाय पर ताज़गी का ठप्पा लगाये उसे बेंचने आ गये थे। इस दौरान कुछ पूड़ी सब्जी वाले भी आये थे, जिनकी पूड़ियों की शक्ल देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता था, कि उन्हें दोपहर में बनाया गया होगा, लेकिन वो जब बिक नहीं सकीं, तो रात को उन्हें दोबारा मिलावटी घी में गर्म करके ताजगी का नाट्य रूपांतरण कर बेचा जा रहा था। इसी बीच अमरोहा स्टेशन भी पार हो गया। ट्रेन बड़ी बेफिक्री के साथ हूटर पर हूटर मारे अपनी ही पहले से तय पटरियों पर आगे की ओर बढ़ती जा रही थी। मैं भी ट्रेन की बेफिक्री से सीख लेकर किताब पढ़ने में तल्लीन था। कि इसी बीच ट्रेन द्वारा पटरियां बदलने की ध्वनि मेरे कानों में पड़ने लगी थी, और ट्रेन अपनी रफ्तार को धीमा कर रही थी। ये किसी स्टेशन के आने के संकेत थे। मेरा कयास जल्द ही सच निकला, जब मैने खिड़की से बाहर झांका तो ट्रेन मुरादाबाद के आउटर में प्रवेश कर चुकी थी। अब तक जो ट्रेन सत्तर अस्सी की स्पीड में चल रही थी, उसकी रफ्तार चार पांच किलोमीटर प्रतिघंटा हो गई थी। शायद कोई ट्रेन पहले से उसके लिए निर्धारित प्लेट फॉर्म पर खड़ी थी, जिसके वहां से निकलने के बाद तक के लिए इस ट्रेन को धीमे ही चलना था। ट्रेन ने अचानक कुछ तेज़ रफ्तार पकड़ी, और मुरादाबाद स्टेशन के दो नंबर प्लेट फॉर्म पर जाकर खड़ी हो गई। इस वक्त प्लेट फॉर्म की घड़ी का छोटा कांटा चार पर था, जबकि बड़ा कांटा बारह पर जाने की अथक कोशिश कर रहा था, मानों बड़ा कांटा इशारा कर रहा हो कि उसे उसकी मंज़िल बारह पर आकर मिल जाएगी। ये घड़ी में सुबह के चार बजने के संकेत थे। गाड़ी स्टेशन पर जैसे ही लगी, वैसे ही कुछ लोग पूर्व की भांति ट्रेन में दाखिल हुए, और अपनी चाय को श्रेष्ठ बताने के लिए मिथ्या वर्णन का सहारा लेने लगे। लेकिन उस जाड़े में महज़ पांच रुपए हासिल करने हेतु किया जा रहा ये मिथ्या वर्णन किसी कड़वे सच जैसा था, जिसका एक घूंट मैने भी पांच रुपए देकर खरीद लिया था, क्योंकि बाहर ठंड कुछ ज्यादा ही पड़ रही थी, जिस ठंड का अनुभव मुझे दिल्ली में नहीं हुआ था, उससे कहीं ज्यादा ठंड को मैं मुरादाबाद स्टेशन पर महसूस कर रहा था, हमेशा की तरह चंद मिनटों में ही मैने उस ना पसंद आने वाली चाय को खत्म कर दिया था। बाहर कोहरा बहुत ज्यादा होने  की वजह से विज़िबिलटी बेहद कम हो गई थी। मुरादाबाद बड़ा स्टेशन है इसलिए यहां लगभग हर ट्रेन का स्टॉप दस मिनट से कुछ ज्यादा है। लेकिन उस दिन ट्रेन करीब तीस मिनट तक स्टेशन पर ही खड़ी रही। मुझे ठंड बहुत ज्यादा लगने लगी थी। सोच रहा था कि कैसे भी एक अदरक वाली चाय मेरे गले को नसीब हो जाती, तो दिल आनंद-आनंद तृप्त- तृप्त हो जाता। लेकिन बदनसीबों की बस्ती में नसीब कहां जागते हैं। ऐसे ही मुझे एक प्याला अच्छी चाय नसीब नहीं हुई। और मजबूरन ही मुझे मिथ्या वर्णन वाली उस चाय के तीन प्यालों को पीना पड़ा। &lt;br /&gt;                                                       ट्रेन शायद जब चलने ही वाली थी, कि इसी दौरान पांच लोग भागते हुए ट्रेन में चढ़े, हर कोई एक दूसरे को अपना बैग थमाकर ट्रेन के अंदर दाखिल होने की कोशिश कर रहा था, ऐसा लग रहा था कि जैसे वे पांचों काफी दूर से भागकर आ रहे हैं। और ट्रेन की हरी बत्ती देखकर बहुत घबरा गए हैं कि कहीं उनकी ये ट्रेन छूट न जाए। खैर वो पांचो ट्रेन के भीतर जैसे तैसे दाखिल हुए क्योंकि ट्रेन हलके हलके रेंगने लगी थी। जान हथेली पर लेकर सफर तय करने की ये नीति साफ बता रही थी, कि वे मजदूर वर्ग से ताल्लुक रखते हैं, और हर रोज़ ऐसे ही ट्रेनों में सफर तय करते हैं। मेरा ये कयास भी पूर्व की भांति एक दम ठीक था। पहले किताब बैग में रख लूं उसके बाद बताऊंगा कि आखिर मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। &lt;br /&gt;                          &lt;br /&gt;                      ये पांचों लोग आपस में ठेठ देहाती भाषा में बातें कर रहे थे, ये भाषा अवधी भी थी, मैथली भी थी, और भोजपुरी भी थी। कुल मिलाकर इनकी भाषा का अंतिम उत्पादन कबीरदास की सधुक्कड़ी भाषा जैसा था। इन लोगों की वार्ता के कुछ अंश मुझे बड़ी ही मुश्किल से समझ आ रहे थे। लेकिन कहा जाता है कि मुश्किल पंक्तियों से अपने लिए कुछ सरल निकाल लेने वाला ही जिज्ञासू है। सो इसी तर्ज पर मैं उन पांचों की रोमांचक बातों का स्वाद लेने लगा। इस दौरान मुझे ज्ञात हो गया था, कि वो पांचों लोग दिहाड़ी मजदूर थे, जो दिन भर काम करने के बाद दिल्ली से अपने घरों की ओर लौट रहे थे, लेकिन मुरादाबाद में ट्रेन छूट जाने की वजह से वो मुरादाबाद स्टेशन पर ही काफी देर से सोये हुए थे। पर जब मेरी ट्रेन वहां पहुंची तो अचानक खुली नींद ने उन्हें मेरी ट्रेन में दाखिल होने को मजबूर कर दिया। इन्हीं आशंकाओं के बीच मैं उनकी बातों को आराम से सुनता जा रहा था, कि मुझे एक और बात पता चली कि उनमें से एक व्यक्ति उनका नेता है। जिसका नाम संभवत: छन्नू रखा गया था। क्योंकि सभी लोग बार बार उसे छन्नू भइया के नाम से ही पुकार रहे थे। उन पांचों लोगों में छन्नू ही एक मात्र दल का ऐसा सदस्य था, जिसने अपनी ज़िंदगी में या तो कभी पढ़ाई को महत्व दिया होगा, या फिर घर में पिता की डांट का उसे ख्याल रहा होगा। मुझे नहीं पता था कि छन्नू कितना पढ़ा लिखा था, लेकिन उसकी काबलियत का अंदाज़ा उसके चार साथियों ने भलीभांति लगा लिया था, क्योंकि उनकी नज़र में छन्नू उनका नेता था। छन्नू के शारीरिक ढांचे की एक और खास बात थी, कि वो एक आंख से देख नहीं सकता था। उसकी आंखों में लगा पत्थर इस बात की ओर साफ इशारा कर रहा था, कि बचपन में किसी दुर्घटना की वजह से उसकी एक आंख जाती रही होगी, या फिर मोतियाबिंद का सही वक्त पर इलाज न करवा पाना उसकी आंख के लिए प्राणघातक साबित हुआ होगा। जो भी हुआ हो लेकिन एक आंख से देख सकने वाला ये शख्स उन दो दो आंखें रखने वाले लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा था। &lt;br /&gt;                                                 छन्नू के हाथों में सौ सौ के कुछ नोट थे, जिनका हिसाब छन्नू को ही करना था। उसे उन चारों में तो नोट बांटने ही थे। साथ ही अपने काम का हिसाब भी तय करना था। इसलिए छन्नू ने 675 रुपए प्रति व्यक्ति का हिसाब करने  के लिए अपनी उंगलियों का सहारा लेना शुरु कर दिया था। गणित के तमाम फॉर्मूले फिट कर लेने के बावजूद भी जब छन्नू पैसों का सही हिसाब नहीं लगा सका। तो उसने अपनी जेब से भारत के एक पड़ोसी कम्यूनिस्ट देश से आया एक मोबाइल निकाल लिया। और उसके साथ खुड़पैंच करने लगा। अंदाज़ा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं था कि जब उसके दिमाग की गणित फेल हो गई तो उसने कंप्यूटरीकृत गणनांक का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया होगा। यकीनन ऐसा ही था। छन्नू अब मोबाइल में मौजूद कैलकुलेटर के सहारे उस हिसाब के अंकेक्षण में जुट गया था। उन चारों की आंखें बरबस ही छन्नू की काबलियत पर टिकटिकी लगाये देख रही थीं। उनकी नज़र में छन्नू शिक्षित भी था, तकनीकी जानकार भी, वैज्ञानिक भी, और सबसे समझदार भी। क्योंकि वो चारों आंखों ही आंखों में छन्नू द्वारा किये गये प्रयासों को सराहने की चेष्टा में लगे हुए थे। लेकिन इस  बात से छन्नू एक दम अंजान था। क्योंकि उसका पूरा ध्यान अपने चाइनीज़ मोबाइल की स्क्रीन पर था। उसके सराहनीय प्रयासों की दृढ़ता देखकर सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि वो आज अपने पास मौजूद धनराशि में से 675 रुपए के उस अबूझ हिसाब का हल निकाल ही लेगा। &lt;br /&gt;                       माहौल इस वक्त बेहद शांत था। उन चारों की नज़रें छन्नू पर टिकी थीं, तो मेरी नज़रें उन पांचों के क्रिया कलापों पर । लेकिन इसी बीच उन चारों में से चिल्ला नाम के एक शख्स ने अपने भारी से दिखने वाले मोबाइल में गाना बजा दिया। प्यार से लिखा गया वो गाना उस मोबाइल में जाकर इस कदर कर्णभेदी हो गया था, कि मजबूरन छन्नू को हस्तक्षेप कर कहना पड़ा...अरे बंद करऊ भोंसड़ी के...चिल्ला की इस हरकत से छन्नू इस कदर आहत हो गया था, कि एक मिनट के भीतर उसने चिल्ला को उसके अनपढ़ होने के सैकड़ों नुकसान गिना दिये थे। शायद चिल्ला को भी अपने अनपढ़ होने का जितना अफसोस पहले न हुआ होगा। उतना आज हो रहा था, क्योंकि छन्नू ने तो सीधे उसके स्वाभिमान को ही ललकार दिया था। &lt;br /&gt;      अब तक जो तस्वीर थोड़ी शांत दिखाई दे रही थी, उसमें अब तनाव नज़र आने लगा था। चिल्ला से हुई बकझक के बाद छन्नू अपनी कंसर्ट्रेशन खो बैठा था। छन्नू की शक्ल देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे अब वो 675 रुपए की उस पहेली को सुलझा ही न सकेगा। लेकिन छन्नू तो छन्नू था, उसे ये साबित करना था कि उसकी प्राइमरी तक की पढ़ाई उसके काम आई है। चिल्ला की उस शांति भंग करने वाली हरकत ने कुछ घंटों से हिसाब लगा रहे छन्नू के चेहरे पर बारह बजा दिये थे। लेकिन फिर भी मामले को आन पर लेते हुए छन्नू 675 के कुल योग वाली बैलेंस शीट को बनाने में पिला हुआ था। ये छन्नू का अपने हिसाब के प्रति समर्पण ही था, जो उसने चिल्ला द्वारा किये गये उस गाना बजाने के अपराध को नज़रअंदाज़ कर हिसाब में ही ध्यान लगाये रखा। अगर और कोई होता तो वो चिल्ला की गुटखौसी दांतों वाली मुस्कान से खीज कर हिसाब किताब को बंद करता, और पहले चिल्ला के दांत तोड़ता। &lt;br /&gt;                                                       ट्रेन अब रामपुर स्टेशन पहुंच चुकी थी। लेकिन छन्नू वहीं का वहीं था। शायद उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके पास मौजूद रुपयों में से 75 रुपए के उचंत खाते के पैसे आखिर गये तो गए कहां ? इस बात का पता भी मुझे तभी लगा जब उसने एक गाली के साथ कहा भोंसड़ीं के जई 75 रुपिया कहां चले गए, इस दौरान ये पहला ऐसा मौका मैने पाया था जब छन्नू ने प्रश्नवाचक अवस्था में चारों के चेहरे पर बारी बारी से अपनी एक आंख के द्वारा बड़ी ज़ोर देकर देखा था। क्योंकि अब से पहले तक तो छन्नू की सारा ध्यान उस हिसाब ने खींच लिया था, या फिर चिल्ला की उस हरकत ने जिसकी वजह से चिल्ला को अपमान के सैकड़ों घूंट चंद मिनटों में ही पीने पड़ गए थे। &lt;br /&gt;   ट्रेन रामपुर स्टेशन पर बिना किसी सूचना के रुकी हुई थी, लेकिन छन्नू के हिसाब की गाड़ी जापान की विकास दर की तरह आगे की ओर जा रही थी, ये बात अलग थी, कि अब तक छन्नू के हिसाब को उसकी मंजिल नहीं मिल सकी थी। लेकिन कहा जाता है कि किसी की शक्ल पर उसकी होशियारी के बारे में नहीं लिखा होता। ऐसा ही छन्नू के साथ भी था। उसके चेहरे की उड़ चुकी रंगत साफ बता रही थी कि रामपुर से चलकर जैसे ही ये ट्रेन बरेली पहुंचने वाली होगी, तो उसके हिसाब का तलपट भी मेल खा जाएगा। क्योंकि जिस तरीके से उसकी भावभंगिमाओं को मैं भांप पा रहा था, तो मुझे लगने लगा था कि छन्नू हिसाब के बेहद करीब है। हां एक बात और याद आ रही है कि रामपुर से ट्रेन रवाना होने से पहले उन पांचों ने न पी सकी जाने वाली पांच प्यालियां चाय भी खरीदी थी। और इसके पैसे उसने चुकाये थे, जिसे अब से कुछ वक्त पहले एक छोटी सी गलती के एवज़ में बड़ी सी फटकार छन्नू द्वारा लगाई गई थी। इस दौरान चाय पीते वक्त शेष चार तो आपस में अपने हरदोई स्थित किसी गांव की बातें कर रहे थे, लेकिन छन्नू चाय की चुस्कियों के साथ ही गणित की उस अबूझ पहेली को सुलझाने में लगा हुआ था। छन्नू की चाय का प्याला खत्म हो चुका था, लेकिन हिसाब अब तक नहीं लगाया जा सका था। &lt;br /&gt;               ये विडंबना ही थी कि बरेली रेलवे क्रॉसिंग के कुछ पहले ही छन्नू उन चार लोगों की भीड़ को संबोधित करने की मुद्रा में आ गया। उसकी एक आंख में साफ पढ़ा जा सकने वाला आत्मविश्वास बताने के लिए काफी था, कि वो हिसाब की बहियों का हिसाब कर चुका है। उसने 75 रुपए के उस सस्पेंस अकाउंट का पर्दाफाश कर दिया है। जिसने उसकी नाक में दम कर दिया था। जो छन्नू अब तक बेहद शांति से हिसाब लगा रहा था, वही अब चिल्ला समेत उन चारों को 675 के मूल का रहस्य समझाने लगा था। छन्नू को पता चल गया था कि जिन 75 रुपए की बदौलत उसके हिसाब का चिट्ठा मेल नहीं खा रहा था, उसी 75 रुपए के खर्चे को उसने खोज निकाला था। और ये 75 रुपए वही थे जो उन पांचों ने आपसी सहयोग से कच्ची दारु  की भट्टी पर खर्च कर दिये थे। लेकिन नशा ज्यादा होने की वजह से किसी को याद नहीं था कि पैसे आखिर गए तो गए कहां। ये सब संभव हो पाया था तो बस छन्नू के द्वारा। क्योंकि छन्नू ने प्राइमरी की पढ़ाई में एक से लेकर सौ तक की गिनतियों के बड़े ही मन से पढ़ा था। और इस पढ़ाई के ही बूते उसने ये साबित कर दिखाया था, कि अंधों में काना राजा ही नहीं बल्कि आर्यभट्ट भी हो सकता है। &lt;br /&gt;                      सुबह के दस बजे हैं। बरेली आ गया है । और मुझे इसी स्टेशन पर उतरकर शाहजहांपुर के लिए ट्रेन पकड़नी है, क्योंकि जिस ट्रेन से मैं आया हूं वो ट्रेन बरेली से सीधे लखनऊ जाती है, शाहजहांपुर उस ट्रेन का स्टॉप नहीं है। और हां छन्नू ने अपने हाथों में मौजूद सौ रुपए के सभी कड़क नोटों का हिसाब उन चारों में कर दिया है। आगे का रास्ता वो कैसे तय करेंगे मुझे नहीं पता, क्योंकि मेरे देखे जाने तक वो बरेली स्टेशन पर उतरे नहीं थे। और हरदोई नामक जिस ज़िले में उन्हें जाना था, ये ट्रेन वहां भी नहीं रुकती थी। शायद ये पांचों लखनऊ पहुंच जाएंगे, या फिर चेनपुलिंग कर हरदोई उतरेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-5348958523628888940?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/5348958523628888940/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=5348958523628888940' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5348958523628888940'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5348958523628888940'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='अंधों में काना आर्यभट्ट'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-84792130947579482</id><published>2011-12-27T01:47:00.000-08:00</published><updated>2011-12-27T01:48:13.228-08:00</updated><title type='text'>राम रचि राखा...</title><content type='html'>मैं बहुत छोटा सा था, मुझे इतना सा याद है बस। सामाजिक तानेबाने से दूर लोगों की अपेक्षाओं से कहीं ज्यादा दूऱ। मैं उस वक्त अकेला था, एक दम अकेला। कई बार आपके साथ बहुत सारे लोग खड़े होते हैं, लेकिन उनकी वैचारिक अभिव्यक्ति आपसे मेल नहीं खाती। बस इतना ही समझिए मुझसे मेरे अपनों के विचार मेल नहीं खाते। ऐसा नहीं कि मैं उनको या वो मुझको समझते नहीं। ये सिर्फ विचारों को समझने का बस एक इंच का अंतर है । जो वक्त के साथ एक एक इंच का नहीं बल्कि एक मीटर का हो जाता है। सोच का यही अंतर मेरी आने वाली ज़िंदगी पर भी प्रभाव डालने वाला था। इस बात का मुझे अनुमान नहीं था। क्योंकि मेरा हर चीज़ को आंकने का तरीका अलग था। &lt;br /&gt;                      एक रोज़ की बात है, जब मैं मीडिया के एक बड़े से संस्थान में कार्यरत् था। संस्थान में बहुत सारे लोग ऐसे थे, जो अपने आप को बहुत ज्यादा ज्ञान परक होने का अक्सर दावा किया करते थे। मैं तो उनके अनुभवों के सामने एक अदने सिपाही जैसा था। जिसका न तो रसूख था, न कोई धाक थी, और न ही कोई साख थी,। इस परिस्थिति को सिर्फ ऐसे ही देख सकते थे जैसे हमारे समाज में सवर्ण दलित को देखते हैं। हीन भावना की ऐसी तस्वीर थी ये जिसे मैं कभी बना तो न सका, लेकिन मेरे ह्रदय से ये छवि कभी गायब न हो सकी। ज़िंदगी के हर एक पहलू को अपने हाथों में समेटे मैं आगे बढ़ने की ख्वाहिश पाले हुए था। लेकिन क्या वो ख्वाहिश पूरी होनी थी, ये बात मेरे ज़हन में अक्सर सवाल बनकर घूम जाया करतीं।&lt;br /&gt;       संगठन में करीब पैंतालीस की तादाद में कर्मचारी हुआ करते थे। उन पैंतालिस कर्मचारियों में मैं सिर्फ अकेला ऐसा व्यक्ति था । जिसे लोग बतौर हिंदी मीडियम संबोधित किया करते थे, ऐसा नहीं था कि वो मेरी हिंदी को बेज्जत करने की कोशिश किया करते थे। बस उन्हें ये पता था कि मैं एक ऐसे स्कूल से आता हूं जिसमें पढ़ने की आखिरी कीमत मैने सिर्फ डेढ़ रुपया माहवार चुकाई थी। असल में तो सच्चाई को स्वीकारने के बाद हिंदी की हमारे पास यही कीमत रह जाती है। महज़ डेढ़ रुपया। खैर आगे बढ़ते हैं। इन पैतालिस लोगों में करीब पैंतीस लोग ऐसे थे जो मुझे प्रत्यक्ष रुप से जानते थे। इन कर्मचारियों में गार्ड भी शामिल थे, और वो लोग भी शामिल थे जो गार्ड के वेतन को उनकी ड्यूटी के हिसाब से तय किया करते थे। इसके अलावा वो लोग भी थे, जो लोग गार्ड की ड्यूटी तय करने के साथ ही उन लोगों की भी दिहाड़ी पर निगरानी रखते थे, जो लोग दफ्तर में मौजूद बॉस प्रणाली के एकदम करीब हुआ करते । &lt;br /&gt;       इस संगठन में 6 माह तक दिहाड़ी करने के बाद मुझे मासिक वेतनभोगी कर्मचारी के रुप में नियुक्त कर लिया गया। इन 6 महीनों में मैने मजदूरी के हर गुण और अवगुण को शिरोधार्य किया। दफ्तर के शुरुआती वक्त में मैं अपने आप को ‘ऑन एक विंटर्स नाइट’ (पूस की रात) का हलकू समझता था। जो कर्ज के बोझ से इतना दबा था, कि उस बोझ से छुटकारा पाने की उसके पास सिर्फ एक ही युक्ति होती, और वो थी इस लोक से इहि लोग में सिधार जाना। यहां मेरी हालत की तुलना हलकू से की जा सकती है। क्योंकि हलकू भी तकलीफों में जीने का आदी था, और मैं भी तकलीफों को आराम से बर्दाश्त करने का आदी हो गया था। वक्त का हकीम हर किसी को काढ़ा पिला सकता है। तो मेरी क्या बिसात थी।  &lt;br /&gt;                                          इस निजी संस्थान में काम करने का हर किसी का अपना सरकारी ढर्रा था। मसलन कोई काम करता था, तो कोई जी हुजूरी का काम करता था। इस मामले में कई लोग अपने आप को मैनेजमेंट गुरु मान लिया करते ।  ये बात अलग है कि उन्हें प्रबंधन का आशय भी न पता हो। लेकिन उन्हें एक बात का बड़े अच्छे से पता था, कि बड़े साहब के आते ही अपनी कमर को कितनी डिग्री तक झुकाना है, और जुड़े हुए हाथों को अपने चेहरे से कितनी दूरी पर रखना था। ये मुद्रा बताने के लिए काफी थी, कि उक्त कर्मचारी के मन में बॉस के प्रति श्रद्धा नामक परी कैसे कत्थक कर रही है। ये तस्वीर तो जैसे हमारे निजी संस्थानों की तकिया कलाम बन गई है। &lt;br /&gt;                                        जैसे तैसे शुरुआती 6 महीनों को मैने संघर्ष की अवस्था में काट ही लिया। और अब आगे का वक्त काटने को तैयार हो गया था। इस दौरान जितनी तेजी से दफ्तर में मेरा वक्त गुज़र रहा था, उतनी ही तेज़ी से बॉस बदलने का सिलसिला भी चल निकला था। निजी संस्थानों में अक्सर बह निकलने वाली इस्तीफों की बयार ऐसी ही होती है। यहां नौकरी ऐसे बदलती है, जैसे किसी गर्भवती महिला की ज़ुबान का स्वाद। &lt;br /&gt;                                                            संस्थान में मुझे आठ महीने हो चुके थे। अब शनय शनय दफ्तर की कठिन स्थितियां मेरे इतिहास भूगोल से मेल खाने लगी थीं। आंकड़ों और आंखों का मेलमिलाप ऐसा हुआ कि लोग मेरे कायल और मैं उनका कायल हो गया। इस दौरान बिना कमर को किसी डिग्री पर झुकाए मेरे काम करने के तरीके ने कई लोगों के पैजामे ढीले कर दिये थे। दफ्तर में ऐसी ही स्थितियां मृत प्राय मुसीबतों में प्राण फूंकती हैं। कम उम्र में अपनों से छोटों की शोहरत नाते रिश्तेदारों को भी बर्दाश्त नहीं होती। तो ये तो वो लोग थे, जो किसी अजनबी शहर में मुझे मिले थे। लेकिन मनुष्य की फितरत में विश्वास का वास होता है। इसलिए अगर मेरे भीतर किसी के लिए विश्वास था तो कुछ गलत नहीं था। &lt;br /&gt;      खैर वक्त गुज़रता रहा, और मैं अपने कार्यों को तल्लीनता से करता रहा। चूंकि चपरासी से लेकर दफ्तर के सीनियर सिटीजन तक मेरी पहुंच अच्छी खासी हो गई थी। इसलिए साज़िशी तंत्र को भी मेरे खिलाफ ब्यूह रचना में मशक्कत करनी पड़ रही थी। इस बात का पता मुझे अक्सर लग भी जाया करता, लेकिन हमेशा की तरह ये दफ्तरी कठिनाई मेरे भीतर ज्यादा स्ट्रेस नहीं डाल पाई। मैने साजिशी तंत्र को भगवान भरोसे कर दिया। होइहे वही जो राम रचि राखा। अक्सर ऐसी बातें बड़ी सटीक साबित होती हैं। भगवान को जो मंजूर था वही हुआ। जो हमारी तरक्की में रोड़े अटकाने के लिए दिन रात एक कर रहे थे, उन्हीं के घर मंदी का ऐसा तूफान आया, कि वो नौकरी बचाने के लिए मेरे उसी मित्र के पास पहुंचे, जिससे मेरी तरक्की को रोकने के लिए उन्होंने सिफारिश लगाई थी।&lt;br /&gt;                         सार यही कहता है कि अगर पक्के मन से और सच्ची लगन से अगर आप से आप अपने कार्यों को अंजाम देते हैं। तो फिरकापरस्त ताकतें आपके पतन के बारे में सोच तो सकती हैं, लेकिन आपको कभी डिगा नहीं सकतीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-84792130947579482?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/84792130947579482/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=84792130947579482' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/84792130947579482'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/84792130947579482'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2011/12/blog-post_27.html' title='राम रचि राखा...'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-1887127192422315814</id><published>2011-12-22T00:01:00.000-08:00</published><updated>2011-12-22T00:04:12.229-08:00</updated><title type='text'>रजाई के भीतर से रईसी के दर्शन</title><content type='html'>रात के ढाई बज चुके हैं। मुझे नहीं पता कि कैलाश कॉलोनी में बाहर का तापमान क्या है । लेकिन इतना पता है कि मेरी रजाई के भीतर का तापमान मेरे शरीर को गुनगुना रखने के लिए काफी है। मेरे बारह बाई चौहद के रुम के पड़ोस में दो और युवक भी रहते हैं। वो इस वक्त सो चुके हैं। सिर्फ कुत्तों के भौंकने की आवाज़ और ऑफिस से मिली एक सस्ती दीवार घड़ी की नामालूम सी टिक-टिक को तो मैं सुन पा रहा हूं। &lt;br /&gt;                                         मैं दिल्ली के जिस इलाके  में रहता हूं उसे यहां की पॉश कॉलोनियों में शुमार किया जाता है। मैने जिस दिल्ली को दूसरे इलाकों में देखा है उसे यहां महसूस नहीं कर पाता । क्योंकि जब भी मैं ग्याहर बजे के आस पास ऑफिस से लौट कर आता हूं। सांझा चूल्हा रेस्टोरेंट के समीप एक ऐसी भीड़ देखता हूं। जो मुझे दुनिया की हर फिक्र से बेफिक्र दिखाई देती है। ये उन लोगों की भीड़ है जो बीएमडब्ल्यू, फरारी, और दूसरी अति आरामदेह गाड़ियों से अपना सफर तय करते हैं। मुझे हर रोज़ ये चेहरे अलग अलग गाड़ियों में ठीक उसी स्थान पर दिखाई देते हैं जहां मैने इन्हें पूर्व में देखा था। रेस्टोरेंट के समीप इन्होंने अपनी गाड़ी टिकाने  के लिए एक निश्चित जगह भी बना रखी है। अमूमन हर बार गाड़ियां बदली ही होती हैं, लेकिन चेहरे नहीं बदले होते। ये सभी सांझा चूल्हा से आने वाले महंगे खाने का इंतज़ार करते हैं। वेटर इनकी गाड़ियों तक खाना लेकर आते हैं। खाना वक्त पर नहीं पहुंचता तो सामाजिक रीतियों को दुत्कारते हुए गाड़ी के भीतर से ही वेटरों को अपशब्दों से नवाज़ने लगते हैं। रेस्टोरेंट और गाड़ी के बीच का फासला भले ही कितना हो, लेकिन इनकी जेब की गर्मी दिमाग में ऐसी चढ़ती है, कि ज़ुबान से निकले अपशब्दों का घनत्व रेस्टोरेंट के दरवाज़ों को बेखौफी से चीरता हुआ उस शख्स तक पहुंच जाता है, जिस शख्स को खाने का ऑर्डर दिया गया है। घने कोहरे में गाड़ियों के नंबर तलाशता हुआ वेटर जब गाड़ी के करीब तक पहुंचता है। तो कई बार गाड़ियों के भीतर जमी महफिल से एक जाम फूटकर वेटर के मुंह पर आ गिरता है। इसे गरीबों की बदकिस्मती नहीं, बल्कि रईसी का रुआब कहते हैं। &lt;br /&gt;                      कई बार तो ऐसा भी हुआ कि मैं जब उनकी गाड़ियों के करीब से गुज़रता तो गाड़ियों के भीतर से ही एक गिलास मेरी ओर फेंक दिया जाता। और बोल दिया जाता सॉरी भाई। टीचर्स के नशे से ज्यादा इन लोगों पर रईसी की खुमारी होती है। खुलेआम ये लोग एक बेहद संवेदनशील इलाके में शराब पीकर माहौल को बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। इन रईसज़ादों से उलझना अपनी शामत बुलाने के समान है। क्योंकि इनकी रईसी के रुआब के आगे तो पुलिस भी सलाम ठोकती है। &lt;br /&gt;                      यूं तो मैं करीब आठ साल बाद उसी बिल्डिंग में लौटा हूं जिस बिल्डिंग में मैं पहले रहता था। मैं जब यहां से गया तो मैने दिल्ली में दर ब दर ठोकरें खाई। हर जगह माहौल को देखा लेकिन लौटकर जब वापस कैलाश कॉलोनी आया । तो यहां कुछ नहीं बदला था। ठीक वही सांझा चूल्हा और अपनी उम्र से आठ साल बड़े वो चेहरे जिनको मैं काफी पहले से देखता आ रहा था। वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। लेकिन यहां आज तक कुछ नहीं बदला। वही गाड़ियों के भीतर से वेटर को चीखकर बुलाना। शराब के नशे में उन्हें गालियां सुनाना । वेटरों का उनके रौद्र के आगे कंपकंपाना। कुछ भी तो नहीं बदला। समाज की सुरक्षा की ज़िम्मेवार पुलिस भी इन लोगों से शायद कमीशन खाती है। मैने कैलाश कॉलोनी की ए ब्लॉक वाली इस गली में कई बार पुलिस की गाड़ियों को रात में गश्त करते देखा है। लेकिन इन पुलिस वालों की नज़र उन पर शायद कभी नहीं पड़ी, जिनके हाथ में रात गहराते ही सड़कों पर जाम छलक आता है। खुलेआम नशे की इस आदत ने प्रशासन द्वारा बनाए तमाम कायदे कानूनों को घुटने पर मजबूर कर दिया है। &lt;br /&gt;                    एक सच्चाई यहां ये भी है कि जाड़े के मौसम में आज मैने जिस रईसी के रुआब को महसूस किया है। उस रुआब की धमक कई बार पड़ोस में मौजूद एक सियासतदांन की कोठी तक भी जाती है। लेकिन उस कोठी से सफेदपोश काले शीशे की कार से एक बार निकलता है, तो फिर दोबारा कब आता है किसी को पता नहीं चलता। लेकिन उसे अपने आस पास में होने वाली गतिविधियों के बारे में तो पता होता ही होगा। कि कैसे उसकी चौखट से चंद फीट की दूरी में रईसों के इशारों पर रात बहकने लगती है। सोच कर भी मेरी रुह कांप जाती है कि कैसे यहां रात के बारह बजे सर्द रातों में तमाम लड़कियां अपने अधखुले शरीरों को अपने प्रेमियों के हवाले कर देती हैं। सड़क पर ही ये लड़कियां कथित पुरुष मित्रों के साथ अपने आप को दिल्ली की बिंदास बालाएं होने का प्रमाण देती फिरती हैं। नशे की आदी हो चुकी इन लड़कियों को सामाजिक तानेबाने से कोई सरोकार नहीं। इनके लिए नशे की दुनिया ही जन्नत जैसी है। फोरव्हीलर में नहीं चल सकने वाला हर व्यक्ति इनके लिए एक सामाजिक पाप जैसा है। जिसे ये जब चाहो तब दुत्कार सकती हैं। ये सब रईसी के रुआब की ही देन है, जिसने इनके चरित्र में ही खोंट पैदा कर दी है। घर के बाहर मां बाप से कुछ कहकर निकलती हैं, और बाहर जाकर अपने पुरुष मित्रों की बाहों में कपड़े बदलती हैं। &lt;br /&gt;                          क्या वाकई बिंदास लड़कियां ऐसी ही होती हैं। खैर जैसी भी होती हों। मैने आपको उस दिल्ली के दर्शन कराने की कोशिश की है। जिसे मैं कैलाश कॉलोनी में सांझा चूल्हा के करीब पिछले आठ सालों से देखता आ रहा हूं। ऐसा नहीं कि मैने रईस नहीं देखे। लेकिन दौलत की ऐसी खुमारी को मैने दिल्ली में कहीं महसूस नहीं किया। इन नज़ारों को देखने के बाद कई बार मुझे लगता है कि इनसे तो भला गांव में घुचड़ू मदारी था। जो भले ही अपनी ज़िंदगी में कुछ न कर सका हो। लेकिन उसने कभी किसी की इज्जत को सड़क पर नहीं उछाला। लेकिन यहां तो हर रोज़ स्ट्रीट लाइट के नीचे खुले आम इज्जत नीलाम होती है। ये बात और है कि रईसों के द्वारा जिन गरीबों की इज्जत का घर लुटता है वो प्रतिरोध नहीं कर पाते। घुट घुट कर कोहरे से भरी रातों में गाड़ियों के नंबर तलाशते रहते हैं। तीन बज गए अब मैं प्रशासन की तरह सो रहा हूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-1887127192422315814?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/1887127192422315814/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=1887127192422315814' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/1887127192422315814'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/1887127192422315814'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='रजाई के भीतर से रईसी के दर्शन'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-8876628993709196303</id><published>2011-07-23T01:32:00.001-07:00</published><updated>2011-07-23T01:32:38.812-07:00</updated><title type='text'>तुम</title><content type='html'>तुम एक रंग। जो बहारों सा दिखता है। तुम ख्वाहिश किसी मुकाम जैसी। तुम सांसों में शामिल वो ख्याल। जो हर दम तरन्नुम में मोहब्बत के अहसासों का नूर भरता गया। तुम शोख नादान  भोली परी सी। तुम तो जिजीविषा का वो पुष्प हो जो दिन में खिलता है तो मौसम बहारों की पैरहन से ढंक जाता है। और जब तुम मुरझाती हो तो नीला आसमान भी कयामत बरसाने लगता है। तुम मेरे शब्दों से सजी वो रचना हो । जिसको मैने अपनी मोहब्बत की रोशनाई से लिखा है। तुम शीतल बर्फ सी, जो गर्म अहसासों को सर्द कर देती है। तुम मनोभावों में बसी वो मूरत हो जिसके दीदार से कायनात भी झूम उठती है। तुम तो खुशी का वो अश्क हो। जिसे मैने कभी आंखों से गिरने ना दिया। तुम सजल नयनाभिराम एक ऐसी कहानी हो जिसका हर अक्षर सिर्फ महसूस करने के लिए है। तुम वो लौह अहसास हो जिसने मेरी कमज़ोरियों से उबार कर मुझे मजबूत बना डाला। तुम वो साज़ हो जो मेरी ज़िंदगी में प्यार के बोल को अपना रुमानी संगीत देता है। तुम दर्द पर मरहम सी। तुम दुश्मनों के सीने पर खंजर सी। तुम सैलाब में सहारा सी। तुम रेगिस्तान में पानी सी। तुम अंधेरे में आफताब सी। तुम हरिवंश की हाला सी। प्रेमचंद की रचना सी। तुम मखमल सी कोमल, कपास सी नाज़ुक, छोटी बिटिया सी चंचल, बच्चों सी मासूम, गुलाब सी प्यारी, खेतों की हवा सी, गोमुख की गंगा सी, बहती जलधारा सी, हरे पेडों के जैसी, बहारों के मौसम जैसी, समुंदर सी गंभीर, हिमालय सी अटल हां तुम सिर्फ तुम।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-8876628993709196303?l=khabarloongasabki.blogspot.com' 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गया&lt;br /&gt;अजनबी शहर से गुज़रा &lt;br /&gt;तो बाखुदा रास्ता भी मुड़ गया&lt;br /&gt;मोड़ एक आई तभी&lt;br /&gt;जब पाजेब दूर थी बजी&lt;br /&gt;रुक गए मेरे कदम&lt;br /&gt;शायद मिल गया था हमकदम&lt;br /&gt;साथ मेरे जो चलेगा&lt;br /&gt;दूर तक मुझको लेकर कहीं&lt;br /&gt;लेकिन वो छलावा-ए-सफर था&lt;br /&gt;फिर ना मिला कोई कहीं&lt;br /&gt;अजनबी शहर से गुज़रा &lt;br /&gt;तो बाखुदा रास्ता भी मुड़ गया&lt;br /&gt;गुम मुस्कुराहट सा सफर वो&lt;br /&gt;जहां महफिलें शमशान थीं&lt;br /&gt;जानिब ए मंज़िल वहां तो&lt;br /&gt;हर जुस्तजू अंजान थी&lt;br /&gt;फिर ठिठक जाएं कदम&lt;br /&gt;बस राह मिल जाए वही&lt;br /&gt;जो ना डगर अंजान हो&lt;br /&gt;जो ना ज़मी वीरान हो&lt;br /&gt;अजनबी शहर से गुज़रुं &lt;br /&gt;तो ना डगर अंजान हो...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-363747966707456628?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-7633415684863832365</id><published>2011-03-18T07:04:00.000-07:00</published><updated>2011-03-18T07:07:59.399-07:00</updated><title type='text'>रंगों का संदेश..</title><content type='html'>निर्जीव किंतु, जीवट हूं मैं&lt;br /&gt;रंगता हूं अंतरमन तक को&lt;br /&gt;नहीं जानता जाति-धर्म मैं&lt;br /&gt;बस लग जाता हूं सबको&lt;br /&gt;गोरे-कालों की भेद मिटाकर&lt;br /&gt;मैं भावों पर छा जाता&lt;br /&gt;कभी किसी की कविता बनता&lt;br /&gt;कभी गीत बन जाता&lt;br /&gt;मैं राष्ट्र एकता का भागी हूं&lt;br /&gt;और अहसासों का साथी&lt;br /&gt;एक रहें सब दुनिया में&lt;br /&gt;ये मेरे जीवन की थाती&lt;br /&gt;क्रोध मिटा लो, द्वैष मिटा लो&lt;br /&gt;भूल जाओ हर एक व्यथा&lt;br /&gt;लगा रहूं मैं सबके तन पर&lt;br /&gt;अंतिम लब्ज़ों में ये एक कथा&lt;br /&gt;----------------------------&lt;br /&gt;रंगों का त्यौहार, प्यार की फुहार, अल्हड़ मस्ती का सार, अहसासों की सिमटी दुनिया में प्रस्तुती का त्यौहार, होली आज मुबारक, कल मुबारक, हमेशा मुबारक....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-7633415684863832365?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/7633415684863832365/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=7633415684863832365' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7633415684863832365'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7633415684863832365'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='रंगों का संदेश..'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-7487853842892650610</id><published>2011-02-25T12:03:00.000-08:00</published><updated>2011-02-25T12:05:29.589-08:00</updated><title type='text'>नई गाथा...</title><content type='html'>वक्त की सुनामी ने अंधियारे और गमों के धुएं को समेट कर कहीं बहा दिया। झंझावातों में उलझे जज्बाज, छ सालों से सुलग रहे ज्वाला मुखी में जलकर कहीं भस्म हो गए । तकदीर के फसानों ने अब नई गाथा लिखनी शुरु कर दी है। इसी कहानी में अब एक नया चरित्र घर कर चुका है। उसके साथ उम्मीदों का कल्पतरु इतना विशाल है कि पिछले ज़ख्मों की टीस उसकी जड़ों में दबकर अब कहीं ज़मींदोज़ हो चुकी है। मुस्कान के खलिहान में उजाले की पहली किरण कुछ ऐसे पड़ी है कि मौसम सुनहरा हो उठा। इसी मौसम ने चेहरे की सड़क पर खुशी की नुमाइश लगा दी है। जिस किरण की तलाश में बरसों भटका, वो अब मेरे पास है। शहर की गलियों में उसकी मौजूदगी बड़ी खास है। स्याह रात से हसीन सुबह तक ये गाथा अब नया इतिहास लिखने वाली है। एवरेस्ट की पिघलती बर्फ पर शीतल अहसासों ने एक घरौंदा सा बना लिया है। उस घरौंदे में उम्मीदों के पंछियों ने अपना बसेरा कर लिया है। अब वो उस मौसम के इंतज़ार में रहते हैं कि कब बसंती मौसम उनके लिए बहारों की सौगात लेकर आता है। ये उन गुनगुने अहसासों की बारिश की बदौलत है जो पिछले छ सालों में एक टीस का पर्व बन गए थे। हर साल रह रह कर सताया करते थे। जब कभी पछुआ हवाएं चला करतीं तो घाव और हरे हो जाया करते । उनमें एक चीख उभर आया करती । जिसकी ह्दय विदारक ध्वनि आज भी जब महसूस करता हूं। तो कंपकंपी सी आ जाती है। लेकिन हर बार की तरह अब ऐसा नहीं होगा। बिखरी ख्वाहिशों का अब एक गट्ठर मैने बना लिया है। जो पहले से कहीं मजबूत है। हो सकता है कि ये मेरा वहम लो। लेकिन दिल की घबराहट अब जाती रही है। किसी की डर नहीं। बेखौफ हूं। व्यथित मन की अंगड़ाईयां हसरतों की गोधुली बेला के आने से कहीं गुम हो गई हैं। अब थकान नहीं। निरंतर चलने की ख्वाहिश है। अधूरेपन की बेचारगी को भूल एक नया दरख्त मन में अपनी जड़ें जमा चुका है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-7487853842892650610?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/7487853842892650610/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=7487853842892650610' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7487853842892650610'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7487853842892650610'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='नई गाथा...'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-6436735594834056595</id><published>2011-01-18T09:44:00.000-08:00</published><updated>2011-01-18T09:45:54.016-08:00</updated><title type='text'>बिहारीनामा</title><content type='html'>नाम बिहारी था। लेकिन रहते उत्तर प्रदेश में थे। कंजूसी उनका पेशा था, जिसे वो तब से कर रहे थे, जब से होश संभाला। चार बच्चे अपने, और दो बच्चे पराए। ये दो बच्चे युवावस्था के कुटैवों का परिणाम थे जो उनके अनुसार अब गले की हड्डी थे। उनका पेशा सरकारी नहीं था, फिर भी एक सरकारी आवास उनके कब्जे में था, और मरते दम कई सरकारी फरमानों के बावजूद वो उसका मोह त्याग न सके। जसके परिणाम स्वरूप वो दरवाजा पकड़े-पकड़े इस लोक से इह लोक सिधार गए। मतलब दरवाज़े की कुंडी पकड़े-पकड़े उन्होंने अपने प्राणों को यमराज के हवाले कर दिया। इसमें भी थोड़ा संदेह है, कि इतनी आसानी से उन्होंने अपने प्राण यमराज के हवाले क्यों किए। जबकि वो तो निहायत ही ज़िद्दी किस्म के थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                              इस समस्या के निदान के लिए उनेक आलोचकों के खोजबीन विभाग ने जब अपने डोज़ियर सौंपे तो पता चला कि उन्होंने चित्रगुप्त से भी समझौता कर रखा था, कि उनके कुटैवों को संज्ञान में न रखा जाए, और दो चार भले कार्य जो उनके द्वारा भली भांति नहीं निपटाए जा सके थे, उन्हें ध्यान में रखा जाए। इसका सीधा अर्थ ये था कि वो नर्क नहीं जाना चाहते थे, स्वर्ग उन्हें प्रिय था। चूंकि मरण एक सत्य है, इसलिए वो स्वर्ग जाने की ख्वाहिश तब से पाले थे, जब से उन्होंने होश संभाला था, और मृत्यु के मर्म को जाना था। यही कारण था कि 60 की अवस्था में उन्होंने छिनैती, छेड़खानी, उठाईगीरी, और कंजूसी जैसी घिनौनी घटनाओं को अंजाम दे दिया था। अप्रत्यक्ष तरीके से पैसा कमाने का कोई भी विचार उनसे बच न सका था।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                             बचपन से ही जुगाड़ नामक वाहन पर सवार बिहारी इतना ही पढ़ सके थे, कि बस किसी अखबार का मास्टहेड देखकर पहचान जाते थे, कि वो अखबार कौन सा है। वैसे नोट गिनने की तकनीक भी उनकी साक्षरता को दर्शाती थी। उनकी जुगाड़ प्रवृत्ति के किस्से बीसियों मील तक फैले थे, ठीक वैसे ही जैसे बम पुलिस के जमादारों द्वारा न साफ की जा सकी जगह की बदबू। युवावस्था की उम्र में पांचवें तक बमुश्किल ही की जा सकने वाली उनकी पढ़ाई का एक वाकया बेहद मशहूर था, जब मास्टर पढ़ा रहा था लिंग भेद, और कह रहा था नपुंसक लिंग, तो वो समझे कि मास्टर ने उन्हें नपुंसक कह दिया, तो वहीं मास्टर के सामने दिखाने लगे अपनी मर्दानगी के सुबूत। मास्टर शर्मसार थे, लेकिन बिहारी तो बिहारी थे, मास्टर द्वारा न की जा सकने वाली बेज्जती भला कैसे बर्दाश्त होती। ध्यान रहे उनकी मर्दानगी के सबूत लेख की शुरुआत में ही दिए जा चुके है&lt;br /&gt;                                  उनके फलेफूले शरीर को देखकर जल-भुन जाने वालों की एक लंबी कतार थी। किसी विवादास्पद ढांचे की तरह उनका उदर पूरे शरीर पर एक साम्प्रदायिक दंगे जैसा था। जिसमें निश्चित तौर पर जीत उनके उदर की ही मानी जाती। उनके करामाती उदर के भी काफी किस्से थे। कुछ लोग जो उनकी उदरछटा का शिकार हुए थे, वो जब उनके बारे में कुछ बताया करते थे, तो मन वाह वाह कर उठता। क्योंकि जब कभी सफेद धोती में बिहारी सैर सपाटे पर निकलते, तो सड़क चलते ही उनका उदर बहक जाता, और उनके पीछे आने वाला आदमी अपनी नाक को बचाए फिरता दिखाई देता । कई बार तो आलम ये हो जाता कि जब कभी शरीर पर मौजूद विवादित ढांचा दस्त के साये में होता, तो ये साया उनके उस प्रलाप के साथ बाहर निकलता और उनकी धोती पर फाइन आर्ट की अद्बुत छटा बिखेर जाता, जिसकी वजह से लोग अपनी नाक बचाये फिरा करते थे। और उन फाइन आर्ट रुपी दागो से उन्हें कोई ऐतराज भी नहीं होता क्योंकि उनके लिए तो दाग अच्छे हैं। अजीबो गरीब और पूर्व सूचना के साथ बने इन नक्शों में छोटे छोटे राज्यों की झलक साफ देखी जा सकती थी। कुल मिलाकर उनकी धोती ऐतिहासिक जामा बन चुकी थी।  &lt;br /&gt;                                               सीधे बोलना उनकी आदत थी। ऐसा नहीं था कि वो लखनऊ में बहन जी द्वारा कराए गए वर्टिकल डेवलपमेंट की तरह सीधे थे। कई बार उनकी ज़ुबान से निकला वर्टिकल वार उस क्रूज मिसाइल की तरह साबित होता, जिसे अक्सर अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान पर छोड़ा जाता था। जिसका नतीजा ये होता था। कि सीधी बात लोगों का कलेजा छलनी करते हुए मुंह के रास्ते अपशब्दों के माध्यम से बाहर आ जाती थी। और इसके बाद शुरु होता था फसाद-ए-मां बहन। जिसका जीवन रहते तो उन्हें कभी मलाल न हुआ। &lt;br /&gt;                         विडंबना देखिए कि हाथ अचानक बिहारी नामा लिखते लिखते रुक गए। ऐसा नहीं कि लिखने का मन नहीं हो रहा। बस यूं समझिए कि इतना उनकी छवि के लिये काफी है। वैसे कहानी अभी अधूरी है जिसका ज़िक्र अपनी किताब में कभी किया जाएगा। आत्मा अजर है ।अमर है ।बिहारी मृत हैं। लेकिन फिर भी उनकी स्मृतियां आज भी लोगों के ज़हन में हैं। और खास बात ये कि चर्चाओं के बाज़ार में वो हमेशा की तरह अपनी धाक जमा ही लेते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-6436735594834056595?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/6436735594834056595/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=6436735594834056595' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6436735594834056595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6436735594834056595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='बिहारीनामा'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-5124151707239348436</id><published>2010-09-06T06:15:00.001-07:00</published><updated>2010-09-06T06:25:25.571-07:00</updated><title type='text'>नाक का सवाल</title><content type='html'>इंसान से लेकर जानवर तक की भौतिक संचरना में नाक का स्थान काफी महत्वपूर्ण है, सूंघने के सुख से लेकर छींकने के सुख तक नाक ने अपनी महत्ता को ऐसे दर्शाया है जैसे आगरा में ताजमहल ने अपने आप को। चेहरे पर नाक की उपस्थिति दिल्ली के कुतुबमीनार का अहसास कराती है। कई वन्य जीवों के लिए नाक उनके शिकार का माध्यम बनती है। ये कहा जा सकता है कि उनकी जो जून की जुगाड़ नाक आधारित होती है। अगर नाक न हो तो उन्हें लंघन (व्रत) करना पड़ जाए।   &lt;br /&gt;                         पुराणों में भी नाक की महिमा का बड़ा ही विशद वर्णन किया गया है। शूर्पनखा की नाक न कटती तो राम की विजय और रावण की हार न होती। ये नाक की ही लीला थी जो लक्ष्मण, रावण की बहिन को नकटा कर बैठे, शूर्पनखा राम के साथ रंगरेलियां मनाना चाहती थी, जबकि लक्ष्मण के लिए यही बात नाक का सवाल थी, एक झटके में गुस्सैल लक्ष्मण ने शूर्पनखा की नाक को हमेशा-हमेशा के लिए उसके सुंदर मुखड़े से जुदा कर दिया। अब जब कि लक्ष्मण ने अपनी और अपने भाई की नाक की बदौलत शूर्पनखा की नाक शहीद कर डाली तो ये बात भला रावण की नाक के लिए कैसे सवाल न बनती। अहंकारी रावण चल दिया राम के साथ सीतमपैजार करने। नाक का सवाल तो सभी के लिए बराबर ही है फिर चाहे वो राम हो या रावण। अब सीता के अपहरण मामले में रावण की खोज एक बार फिर राम के लिए नाक का सवाल बन गई। दोनों की नाक चूंकि अपने अपने समाज में बेहद ऊंची थी, इसलिए नाक के बचाव के लिए दोनों एक दूसरे के प्राण हरने को आमादा थे। अब जबकि बात राम और रावण चल रही है तो भला सु्ग्रीव, बाली, अंगद और हनुमान जैसे चरित्रों को कैसे भूले, इन सभी ने अपनी अपनी नाक के सवाल की रक्षा हेतु शोणित की नदियां बहा डालीं। अथक प्रयासों से और नाक के सवाल ने क्षत्रीय कुल की जैसे- तैसे लाज बचा ही ली, तमाम सीतमपैजार के बाद जब सीता घर लौटीं तो राम के नाक का सवाल बन गई सीता जी की इज्जत, जिसकी खातिर लव कुश की महतारी को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी। वाह री नाक हो तो भी मुसीबत, न हो तो भी मुसीबत। &lt;br /&gt;                        द्वापर युगीन यदुवंशी के लिए भी कंस नाक का सवाल था, लिहाज़ा महज़ 12 साल की ही आयु में किसन जी को अपने मामा के रक्त से हाथ लाल करने पड़े। यहां भी नाक ने ही युद्ध करवा दिया । इस बात से ये बात भी साबित होती है कि नाक के सवाल के जवाब ढूंढो तो युद्ध हो जाता है। दो देश आपस में भिड़ जाते हैं। जैसा कि मैं पहले ही इंगित कर चुका हूं, कि नाक चाहे किसी की भी हो उसके अहंकार का प्रतीक होती है। अगर किसी भिखारी से भी ऊंचे स्वर में बात की जाए तो, और भिखारी थोडा़ भी स्वाभिमानी हुआ, तो नाक के सवाल की खातिर वो आपकी इज्जत का भी फालूदा कर सकता है।&lt;br /&gt;                        गणेश जी और शंकर जी की कहानी भी शायद आपको याद ही होगी, एक बार गणेश जी की अम्मा यानी पार्वती जी स्नान ध्यान में तल्लीन थी, लिहाज़ा द्वार पर ताका-झांकी से बचाव हेतु गणेश जी को पहरेदार के रुप में खड़ा किया गया था, इतने में कैलाश पर्वत पर भड़ैती फाने भगवान शंकर वहां आ पधारे, वो पार्वती से मिलना चाहते थे, लेकिन गणेश अवरोध उत्पन्न कर रहे थे, दोनों में काफी हील-हुज्जत हुई, लेकिन कोई टस से मस न हो। क्योंकि यहां भी दोनों की नाक का सवाल था, इसलिए दोनों में काफी तूतू-मैंमैं हुई, फैसला कुछ हो पाता इससे पहले ही गुस्सैल कैलाशी ने गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। ऐसे मौके पर पार्वती का हाल भी वैसा ही हुआ जैसा भारतीय पुलिस का, जो हमेशा देर से पहुंचती है, यहां पार्वती जब तक पहुंचीं तब तक गणेश जी खूना खच्चर हो चुके थे, अब पार्वती को शंकर जी पर गुस्सा आया, अब उनमें तूतू-मैमैं शुरु हो गई, निर्णय ये निकल कर आया कि अब गणेश जी के सिर की व्यवस्था की जाए। इसी व्यवस्था के साथ एक बार फिर शंकर जी के लिए नाक का सवाल सामने निकल कर आया, खैर जैसे तैसे शंकर जी की असीम अनुकंपा से एक हाथी के सिर की जुगाड़ कर ली गई, जिसे गणेश जी के धड़ में फिक्स कर दिया गया, जो आज भी हम कैलेंडरों में देख सकते हैं, कैलेंडर देख कर याद रखिएगा कि ये सिर किसी की नाक का सवाल था।                 &lt;br /&gt;                                                                  धर्मयुग पर चलते-चलते थोड़ा अधर्मी युग की ओर भी चलिए, जहां खाने को रोटी नहीं लेकिन फिर भी नाक का सवाल हर किसी की नाक पर रखा रहता है। चने वाले ने चने में प्याज थोड़ी कम डाली तो ये बात ठाकुर वीर सिंह ने अपनी आन पर लेते हुए, उसके ही चाकू से उसकी नाक काट डाली, और उसे शूर्पनखा का मर्दाना रुप दे डाला। भला हो लुच्चे रस्तोगी का, जिसको ये बात नागवार गुजरी कि किसी ने उसके पीछे से उसे चिढ़ाने के लिए सीटी बजा दी, ये बात लुच्चे रस्तोगी के लिए नाक का सवाल बन गई, और उससे सीटी बजाने वाले को गरियाना शुरु कर दिया, ये बात और है कि बाद में पिटाई उसी की हुई। और नाक का सवाल करते करते सरे आम उसकी नाक बगैर खूना खच्चर हुए कट गई। हमारे मोहल्ले में लल्लन बाबू की नाक के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि मोहल्ले में बंदर दिख न जाएं। क्योंकि जहां बंदर दिखेंगे वहां लल्लन बाबू भी दिख जाएंगे। लल्लन और बंदरों के बीच की ये दुश्मनी चोर सिपाही की दुश्मनी जैसी है। और इस दुश्मनी के बीच जो सबसे बड़ी बात जुड़ी है वो भी नाक से ही ताल्लुक रखती है। लल्लन चाहते हैं कि बंदर मोहल्ले से निकल जाएं और बंदर चाहते हैं कि लल्लन इस मोहल्ले से निकल जाएं। रोज़ इस बात की जंग होती है, लेकिन सच यही है कि पिछले तीस सालों का इतिहास आज भी बदला नहीं है, न लल्लन ने ही बंदरों के भय से मोहल्ला छोड़ा और न ही बंदरों ने लल्लन के भय से। उनकी नाक का सवाल आज भी सवाल ही है?              &lt;br /&gt;                   उत्तरप्रदेश की सत्ता में बहन जी का भी हाल नाक की खातिर कुछ ऐसा हो चुका है, चूंकि यूपी की सत्ता मायावती के लिए नाक का सवाल थी, इसलिए ब्राह्मण ठाकुरों को भी अपने दल में जोड़ने लगीं, जिन्हें पहले वो गरियाया करती थीं, अब उन्हीं को गले लगाती हैं, ये जरुर है कि पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सुख भोगने के बाद पुन: उनके दल से ब्राह्मण ठाकुरों को लतियाया जाने लगा है। खैर बहिन जी की नाक तो बच ही गई, अब चाहे दूसरों की कटे या बची रहे। सोनिया गांधी के लिए भी हिंदी सीखना नाक के सवाल जैसा था, क्योंकि विपक्ष उनकी हिंदी की खिल्ली उड़ाया करता था, और इस इतालवी महिला को बार बार शर्मिंदा होना पड़ता था, औरत के लिए हया ही सब कुछ है, हया और नाक के सवाल की खातिर सोनिया को हिंदी सीखनी ही पड़ी। और आज हिंदी में ही भाषण देने की बदौलत वो काफी हद तक लोगों को जवाब देने में सफल रही हैं।      &lt;br /&gt;           अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी नाक ने सफलता के झंडे गाड़े हैं, इस मामले में भारत की नाक वाकई कुतुबमीनार साबित हुई है, इंदिरा नुई, लक्ष्मी मित्तल, बॉबी जिंदल आदि आदि, इन सभी ने विदेशों में सफलता की वो इबारत लिखी कि विदेशियों के लिए ये लोग नाक का सवाल बन गए। तो भइया नाक सवालों की जननी है, या यूं कहें कि सूंघने छींकने के अलावा नाक के पास सवाल पैदा करने का भी एक बड़ा काम है। नाक ने जब-जब जहां-जहां सवाल किए वहां-वहां इतिहास लगभग बदल ही गया। बशर्ते कि सवाल बेक़ायदा न हों। इतिश्री फिलहाल नाक के सवालों को थोड़ा विश्राम दिया जाए। नाक बचा कर रखिएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-5124151707239348436?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/5124151707239348436/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=5124151707239348436' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5124151707239348436'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5124151707239348436'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/09/blog-post_6028.html' title='नाक का सवाल'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-6834395343975533721</id><published>2010-09-01T02:09:00.000-07:00</published><updated>2010-09-01T02:10:52.825-07:00</updated><title type='text'>अहिर चाहे पिंगल पढै़........</title><content type='html'>कई दिन बिस्तर पर बिताने के बाद खुराफाती कलम आखिर बंदिशों से मुक्त हुई, और चंचल मन कुछ खुराफात करने को बेताब हो उठा। विचार आया कि कुछ लिख दिया जाए। क्या लिखूं ये बड़ा सवाल था? पिछले कई दिनों से एक चाटुकार बॉस की तानाशाही से आजिज़ था, इसलिए बॉस पर व्यंग ही सबसे उम्दा विषय सुझाई दिया। तो चलिए बगैर सुस्ती दिखाई आपको मस्ती में डुबो देता हूं।&lt;br /&gt;                          शक्ल पर बजे 12 और शरीर पर बजे 24, टी.वी. की दुनिया में टी.बी.(ट्यूबर कुलोसिस) के मरीज की शक्ल को मात देता कुछ ऐसा ही चेहरा है हमारे दफ्तर में मौजूद एक बॉस का। कुंठा के मैले नाले से सराबोर उस बॉस की बदौलत दफ्तरी माहौल में एक नकारात्मक प्रभाव घुला सा नज़र आता है। जीर्ण शीर्ण अवस्था में चैनल के अंदर उसकी मौजूदगी हिरोशिमा नागासाकी के पीड़ितों की याद दिलाती है। तो वहीं महीनों से न धुले कपड़ों का चीकट आवरण दक्षिणी ध्रुव पर बने उन इगलू आवासित (बर्फ से बने मकान) लोगों की याद दिलाता है जिन्हें सालों स्नान ध्यान की आवश्यकता नहीं होती। अगर बॉस दफ्तर में कभी जुराब उतारकर बैठ जाए तो समझिए भोपाल गैस त्रासदी की तरह एक और हादसा दफ्तर में भी हो जाए। जुराबों की सड़ांध इस कदर समाचार कक्ष में घुल जाती है कि लोगों को कक्ष से बाहर भागना पड़ता है। अपने ऐसे ही कैरिकुलम की बदौलत बॉस दफ्तर में चर्चिल की तरह चर्चित रहता है। समीकरण अब कुछ यूं बनता है कि बॉस देश की जनसंख्या में नहीं बल्कि देश की समस्या में आता है। &lt;br /&gt;                          उसके चेहरे पर भावों का अभाव साफ बताता है कि बाढ़ के बाद का तनाव प्रभावित शहरों में ही नहीं बल्कि उसके हमेशा फूले रहने वाले चेहरे पर भी मौजूद रहता है। जिसे देखकर कोई भी मौसम विज्ञानी बड़ी आसानी से भविष्य में होने वाले घटनाक्रम का अंदाज़ा लगा सकता है। विशेषताओं को दबाती उसकी खामियां ही उसकी खूबी हैं, जिनकी बदौलत उसने रिशेप्सन से होकर बड़ी मैडम के केबिन तक गुजरने वाले रास्ते को शीश झुकाऊ प्रणाली के माध्यम से पार कर लिया है। और यही उसकी विशेषता है। जहां कोई नहीं जा पाता वहां वो आधार से 45 डिग्री के कोण पर अपने सर को झुकाकर पहुंच जाता है। उसकी साधारण लंबाई इस प्रकार के झुकाव में उसकी खासी मदद करती है। अपनी इसी विशेषता की बदौलत लुगदी साहित्य के माहिर उस बॉस का संकुचित सीना गर्व से चौड़ा रहता है। &lt;br /&gt;                           दो बजे की पाली में चार बजे दफ्तर की सीमा में उसका प्रवेश साफ इंगित करता है कि वो मैडम से सीधे टच में है। ऐसा जान पड़ता है कि मैडम को उसकी काफी आदतें पसंद हैं, जैसे-शीश झुकाऊ प्रणाली, जी मैडम-जी मैडम, हाथ जोड़ू तकनीक, गुदा के ठीक विपरीत दिशा में बंधे हुए हाथों की तकनीक, और दिवालिया दारुण चेहरा तकनीक आदि-आदि। मैडम की मुखबिरी करने वाले इस बॉस रुपी यस मैन ने दफ्तर के हर कोने में जाल बिछा रखा है। इस जाल के फंदे में जैसे ही कोई छोटी-मोटी कर्मचारी रुपी मकड़ी फंसती है, वैसे ही बॉस एक एसएमएस के द्वारा मैडम तक खुराक की खबर पहुंचा देता है, और त्वरित गति से मैडम रुपी बड़ी मकड़ी उस अदने को अपना शिकार बना लेती लेती है, ये एक ऐसी आहार श्रृंखला है जिसका शिकार कई लोग हो चुके हैं। &lt;br /&gt;                           संगठन में उसकी इस प्रकार की गाथाएं लिखने का तीन साल से ज्यादा का इतिहास हो चुका है। जो अब तक बरकरार है। बॉस के मन में कब क्या चल रहा है किसी को पता नहीं, ठीक वैसे ही जैसे किसी गुप्त रोगी के शरीर की बीमारी का पता किसी को नहीं चल पाता, हक़ीम ही जानता है कि गुप्त रोगी आखिर शरीर के किस आपत्तिजनक रास्ते का इलाज करवा रहा है। वो भी तब जब हक़ीम को पूरी बात तफ़्सील से बताई जाए। लेकिन ये बॉस निहायत ही सूम किस्म का इंसान है, इसको पता है कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, इसलिए बिना हाजमोला के ही बातों को निगल जाता है। बातें शेयर करने का डेयर उसके भीतर कतई नहीं। बस कुर्सी पर बैठकर हाथ में मोबाइल लेकर एक प्रकार की खुड़पैंच करता रहता है। सभी को पता रहता है कि ये खुड़पैंच सीधे डिजिटल संदेशों के माध्यम से बड़ी मैडम तक प्रेषित की जा रही है। ये एक ऐसा प्रेषण (consignment) है जिसके कमीशन के रुप में बॉस को मैडम के बाप से मिलता होगा 10,000 प्रतिमाह मैसेज का फ्री बाउचर। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि मैडम के अब्बा हुजूर से मिला ये कमीशन रुपी बाउचर बॉस की महिला मित्र को लेटनाइट तंग करने और मैडम का सूचना तंत्र मजबूत बनाने के काम आता होगा। यक़ीनन ऐसा था भी, क्योंकि डिजिटल संदेशों की सुपरफास्ट आवृत्ति देखकर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि सूचनाओं की आवाजाही कहां तक हो रही है। मजे की बात तो ये है कि कई बार मैडम की ओर से आए संदेश लोगों के लिए भय का प्रतीक बन जाते हैं,जिन्हें दिखाकर बॉस छोटे मोटे कर्मचारियों की जान हलक में डाल देता है। महज़ तीन अर्दलियों के गुट का नेतृत्व करने वाला बॉस अपने आप को ऐसा समझता है जैसे नेपोलियन की तरह वो तीस हज़ार सैनिकों का नेतृत्व कर रहा हो। लेकिन सच यही है कि वो बंदर के खौंखियाने मात्र से डर जाता है। &lt;br /&gt;                                                   निहायत ही कायराना प्रवृत्ति के इस बॉस के पास एक मोटरसाइकिल भी है, जो निश्चय ही देखने से युगांडा के ई-कचरे की समस्या जैसी लगती है, हॉर्न छोड़कर बाइक  का हर पार्ट बड़े ही करीने बजता है, किश्त भुगतान पद्धति के बाद से बाइक ने शायद ही कभी सर्विस सेंटर का मुंह देखा हो?  इस बॉस की एक और आदत है दूसरों के कार्य का क्रेडिट खुद ले उड़ना। और पिछले तीन सालों से ये इस कार्य को बखूबी अंजाम दे रहा है, झूठे रसूख के ठर्रे की मदहोशी इसके पाखंडी होने का अहसास हमेशा कराती रहती है। &lt;br /&gt;           सुकरात की तरह दिखने वाला ये बॉस ज़हर पीता नहीं बल्कि लोगों के लिए ज़हर की व्यवस्था करता है। दुनिया पर राज करने की जो समस्या अंग्रेजों के साथ रही वही समस्या इसके साथ भी है, लोगों में फूट डालकर ये बॉस अपने आप को डलहौजी समझता है। और खुद को एक निरंकुश प्रवृत्ति के चैनल का राजा समझता है, हालांकि ये एक ऐसा राजा है जिसे गद्दी कभी हासिल ही नहीं हुई। लेकिन फिर भी रहमो करम पर जीने की आदत ने इसकी आउटपुट हेड बनने की जिजीविषा को आज भी जीवित रखा है। &lt;br /&gt;                                                                                                                                         अपने आप को चैनल का एक प्रतिष्ठित और बेहद व्यस्त कर्मी सिद्ध करने के लिए ये अपने मित्रों तक को चैनल के बाहर दो-दो घंटे इंतज़ार करवा देता है। इस दौरान एक दूत को दोस्तों के पास भेजकर ये बात कहलवा देता है कि बॉस अभी मैडम के साथ मीटिंग में हैं, जबकि उसके दोस्त भी ये बात जानते थे कि ससुरा बेवकूफ बना रहा है, क्योंकि जब भी बॉस के दोस्त आते, तो बॉस की तरफ से एक ही संदेश भिजवाया जाता कि थोडा़ इंतज़ार करो, बॉस अभी मैडम के साथ मीटिंग में हैं। &lt;br /&gt;                    आधार से 45 डिग्री तक झुकाव की नीति को अपनाने वाले इस बॉस के एक डायलॉग से लोग काफी खौफ खाते हैं, और वो डायलॉग है नौकरी खा जाऊंगा, उसके इस डायलॉग से लगता है कि जिस प्रकार से सूरदास बचपन से आंखों के लिए तरसते रहे, वैसे ही बॉस बचपन से लोगों की नौकरी खाने के लिए तरस रहा है। इस बात का खौफ लोगों में इसलिए भी था कि पूर्व में उसकी षडयंत्रकारी नीतियों की बदौलत दो चार लोग नौकरी से हाथ धो बैठे थे, और यही बॉस की पिछले तीन सालों में सबसे बड़ी उपलब्धि थी। इन्हीं कारणों की बदौलत परेशान कर्मचारियों ने एक लंबे शोध के बाद उसके कई निक नेम रख दिए, जैसे- मोसाद(एक खूफिया जांच एजेंसी), खड़कसिंह, फ्राइड राइस, बुरी आत्मा, मैसेज मैन आदि आदि। ये सभी नाम उसके व्यक्तित्व के निखार को आधार मानकर रखे गए है। अब लोग अपनी भड़ास उसी के सामने उसके निकनेम के माध्यम से निकाल लेते हैं, और बॉस ये समझता है कि लोग किसी और का तियापांचा कर रहे हैं। &lt;br /&gt;            तो मित्रों बॉस पर व्यंग का ये एक सत्य घटनाओं पर आधारित किस्सा था, बचिएगा ऐसे अकर्मण्य बॉस से, क्योंकि इनका काम आप जानते ही हैं, ये चाटुकारिता और तानाशाही की दुनिया में तो झंडा बुलंद कर सकते हैं, लेकिन ईमानदारी की दुनिया में इनके लिए कोई जगह नहीं। वैसे भी तानाशाही ज्यादा दिन की नहीं होती, हिटलर भी मारा गया, और सद्दाम भी। अब तेरा क्या होगा बॉस ? क्योंकि सच ही कहा गया है “अहिर चाहे पिंगल पढ़ै, तबहुं तीन गुण हीन, खइबो, बुलिबो, बैठिबो लयो विधाता छीन”.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-6834395343975533721?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/6834395343975533721/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=6834395343975533721' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6834395343975533721'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6834395343975533721'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='अहिर चाहे पिंगल पढै़........'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3188576939019635850</id><published>2010-07-29T08:19:00.000-07:00</published><updated>2010-07-29T08:20:29.332-07:00</updated><title type='text'>राजनैतिक रतौंधी</title><content type='html'>इन दिनों सियासी चिल्ल-पों चरम पर है, उत्तर प्रदेश में बहन जी को चिंता सता रही है कि कहीं उनकी पार्टी का हाथी 2012 तक पगला न जाए। अगर ऐसा हुआ तो बौराया हाथी सबसे पहले अपने करीबियों को ही कुचलता है। जो माया पूर्ण बहुमत से सत्तासीन हैं, उनका सीन इस बार बिगड़ सकता है। हालात खुद के पैदा किए हुए हैं। खुद मायावती के खेमे में मौजूद एक सीनियर विभीषण से मेरी चंद रोज़ पहले वार्ता हुई। “तात लात रावण मोहि मारा” रावण की लात से बड़ा आहत मालूम दे रहा था वो। मैं उसके लिए शायद उस वक्त राम से कम न था, क्योंकि उसका दुखड़ा सुन रहा था।   &lt;br /&gt;                                                                          रावण के उस अनुज भ्राता के अनुसार टीका टिप्पणी करने वाले राजनीति के कथित बुद्धिजीवी इन दिनों यूपी वाली बहिन जी को संयुक्त रुप से घेरने की फिराक में हैं। साम, दाम, दंड, भेद, हर किस्म का इस्तेमाल दौलतमंद माया के खिलाफ उनके विरोधी कर सकते हैं। दल अलग-अलग हैं लेकिन मकसद एक है, कहीं बहन जी एक बार फिर सत्तासीन न हो जाए ! उसकी मोसादिक(एक खूफिया एजेंसी) प्रवृत्ति की रिपोर्ट के आधार पर  ये कहना उचित होगा कि, लोग बहिन जी को 2012 तक डाइटिंग जरुर करा देंगे। अपने घड़े समान उदर में करोड़ों समेट चुकी बहन जी चालाक हैं, शातिर हैं, और सबसे बडी़ बात, कथित तौर पर दलित मसीहा भी हैं, लिहाज़ा उनके खिलाफ शह और मात का खेल इतना आसान नहीं। तभी लोग माथापच्ची को मजबूर हैं। बहन जी की सत्ता समेटने के लिए लोग इस कदर प्रयासरत हैं कि बस पूछिए मत, अगर ऐसे प्रयास गुलाम भारत के लिए किए गए होते, तो शायद अंग्रेजी पिछवाड़े पर पेट्रोल पहले ही लग गया होता, और गुलामी का इतिहास 200 सालों का नहीं होता। &lt;br /&gt;              ये सत्ता का सुख राजनैतिक रतौंधी (एक बीमारी जिसमें रात में दिखाई नहीं देता) है, यहां दिन में आदमी सबका होता है, और रात में किसी का नहीं। राजनीति का ये अंधापन बहनजी को भी खा गया है, भले ही माया पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता और शासन का सुख भोग रही हैं, लेकिन दिन के वादे रात की भूल साबित हो रहे हैं। वो वादा तो कर लेती हैं, लेकिन किसी ग़लती की तरह भूल जाती हैं। उत्तर प्रदेश आपराधिक मामलों का जानकार बन गया है, और माया कहती हैं, ये दोष है और किसी का। अगर दोष किसी और का होता, तो कलह का शिकार उक्त विभीषण को न होना पड़ता । उसकी नौकरी नहीं जाती, वो बेरोजगार नहीं होता, ठलुअई नहीं करता, और सबसे बड़ी किसी राम की शरण में नहीं जाता। &lt;br /&gt;                     अब जब कि वो कलयुगीन राम के द्वारे आया है, तो कुछ न कुछ तो फायदा उसे मिलना ही चाहिए। लेकिन इस बार बेचारे राम भी कुछ नहीं कर सकते । वो खुद फाके में जी रहे हैं, विभीषण के लिए दो जून की व्यवस्था क्या ख़ाक करेंगे। लेकिन बहन जी के लिए किसी के फाके मायने नहीं रखते, खा-खाकर उनका घाट इतना चौड़ा गया है कि अब पुश्तें मौज काटेंगी ही। यकीन करिए, जिन योजनाओं का विस्तार कागज़ में हुआ, उनमें से कई कागज़ों को तो दोबारा हाथ तक नहीं लगाया गया। जिन योजनाओं को अमल में लाया भी गया, तो उनमें घोटाले चीख़-चीख़ कर कह रहे थे, कि मैं माया हूं, मैं माया हूं। भला कौन समझाए राजनीतिक रतौंधी की शिकार बहन जी को। वक्त सब कुछ समझा देता है, और वैसे भी माया के लिए उनके विरोधियों ने इस बार एक ऐसा मंच बना दिया है। जिस पर चढ़ते ही, धड़ाम की आवाज़ आएगी। आगे आप खुद समझदार हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3188576939019635850?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3188576939019635850/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3188576939019635850' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3188576939019635850'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3188576939019635850'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/07/blog-post_29.html' title='राजनैतिक रतौंधी'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-8894716547725040180</id><published>2010-07-16T00:38:00.000-07:00</published><updated>2010-07-16T00:39:30.055-07:00</updated><title type='text'>बदलते मौसम की भयानक तस्वीर</title><content type='html'>पसीने से सराबोर शरीर की दुर्गंध ने डियो कंपनियों के सारे दावों को तहस नहस कर दिया है। तप रही गर्मी की भट्टी में शरीर ऐसा लग रहा है मानो भुने हुए आलू की तरह सूरज हमें चटनी डालकर चाट जाने वाला है। वाह रे भगवान भास्कर की चटाई, पृथ्वी पर पैदा हुई इस सर्वश्रेष्ठ कलाकृति को ही लीलने पर उतारु है। शरीर पर जमी कालिख की परत और झुलस कर पड़ीं झुर्रियों ने अभी से साल के अस्सीवें पड़ाव पर लाकर खड़ा कर दिया है।&lt;br /&gt;                      बद मिज़ाज मौसम को तो देखिए, चीख-चीख कर कहता है मैं ग्लोबल वॉर्मिंग का शिकार हूं। मुझे बख्श दो। न हम उसे बख्श रहे हैं, और न वो हमें। जुलाई का महीना है और बारिश के नाम पर दिल्ली-एनसीआर में दो चार छीटे, अल्लाह ने मेघ जहां दिए वहां कयामत आ गई। पंजाब, हरियाणा, में अब तक पानी की कमी थी, लेकिन अब इतना पानी है, लोगों के रहने के लिए जगह कम पड़ गई। नियति का खेल, प्रकृति का तमाशा यही कहता है कि उससे छेड़ छाड़ न करो। वरना वो हमारे साथ खेलेगी। और ये खेल ऐसा है जिसमें जीत की मंशा रखना ही बेमानी है। न ड्रॉ की स्थिति, न वॉकओवर की, बस हारना ही है। खुदा खैर बरकत करे उन लोगों को जिनके घर बाढ़ में तबाह हो गए, जिनके परिवार में से कोई पानी की बलि चढ़ गया। जल की लीला ही ऐसी है, ज्यादा हो तब भी मुसीबत कम हो तब भी मुसीबत। &lt;br /&gt;                              कहानी से थोड़ा हटना चाहूंगा ले चलता हूं आपको अपने पैतृक गांव जहां इस बार हवा-पानी बदलने के लिए गया था, पूरे दस साल बाद गांव तस्वीर ही बदल गई थी, मेरा खुद का घर भी पक्का हो गया था। छप्पर की जगह लिंटर की छांव थी, मिट्टी की दीवार की जगह भट्टों की पकी लाल ईंटों ने ले ली थी। सड़क पक्की बनाई गई थी, लेकिन मिलावट के माल ने उसकी हकीकत को छिपाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, जो घुचड़ू मदारी मेरे साथ कभी खेला करता था, उसके चार बच्चे हैं, वो सिर्फ खेती करता है, और कच्ची पीता है। उसकी दिनचर्या भी यही है। ये दिनचर्या बच्चों की नहीं बच्चों के बाप की है। गांव में अब वैसा मजा नहीं था, जैसा सोचकर मैं वहां गया था। हालांकि चंद खुशकिस्मत पेड़ों की छांव मुझे जरुर मिल गई, लेकिन फिर भी उन पेड़ों के बीच अब सूरज की रोशनी की तपिश ने अपने लिए हजारों दर्रे बना लिए थे, जहां से वो अपने कोप से मुझे अपना शिकार बना सकता था। वहां मौजूद कई पोखर तालाब अब सूखने की कगार पर थे क्योंकि मौसम बेईमान है, और उससे ज्यादा हम। तालाबों को पानी की जरुरत है, और हमें पूंजीवाद में अपने आपको आगे बढ़ते देखने की ललक। तालाब अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन हम गलत हैं, क्योंकि हमारे हित नुकसान प्रकृति का ही करते हैं। और फिर प्रकृति या तो हमारे सामने भीषण गर्मी के रुप में, हाड़ कंपाने वाली ठंड के रुप में या फिर किसी सुनामी के रुप में सामने आती है, जिससे हम बच नहीं सकते । &lt;br /&gt;                             हमारी किस्मत चमकने के साथ प्रकृति की किस्मत फूट जाती है, और जब ऐसा होता है, तो तबाही का दृश्य बदलते मौसम की भयानक तस्वीर पेश करता है। ज़िंदगी की रहगुजर अब इतनी आसान नहीं रह गई, हमारी लड़ाई बदलते मौसम से है, जहां हम जीत नहीं सकते। इस नफरत को ख़त्म कर दें, वरना ये हमारे लिए नर्क के द्वार खोल देगी। हम प्रकृति को कुछ दे नहीं सकते तो उसकी रक्षा जरुर कर सकते हैं। वैसे भी भीषण गर्मी ने हमें हमारी औकात बता दी है। बामुलाहिजा होशियार तूफान तबाही लेकर ही आते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-8894716547725040180?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/8894716547725040180/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=8894716547725040180' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/8894716547725040180'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/8894716547725040180'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/07/blog-post_16.html' title='बदलते मौसम की भयानक तस्वीर'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-7930182800105094623</id><published>2010-07-11T02:48:00.001-07:00</published><updated>2010-07-11T02:48:53.332-07:00</updated><title type='text'>बारह फट्ट-फट्ट, आठ परसीं चार गायब</title><content type='html'>टाइटिल उलझाऊ हो सकता है, लेकिन कहानी बेहद साफ है। एक दम शीशे सी उजली । बात दिनों की है, जब शायद वस्तु विनिमय का दौर रहा होगा। एक गांव में एक भठियारन ( पैसे या सामान लेकर खाना बनाने वाली महिला) रहा करती थी, उस दौर में मुद्रा अलग-अलग रुपों में प्रचिलित थी, नोट चलन में नहीं थे, लेकिन सिक्कों का चलन शायद रहा होगा। वो भठियारन राहगीरों के लिए खाना बनाया करती थी, एवज़ में राहगीरों से लेती थी, अपनी जरुरत का कुछ सामान, जो कि उसके लिए मुद्रा का कार्य करता था। वो भठियारन अपनी उम्दा पाक कला के कारण दूर-दूर तक मशहूर थी, लिहाज़ा बीवियों से ठुकराए हुए, समाज से ठुकराए हुए, या नहीं भी ठुकराए हुए लोग उसकी झोपड़ी में कुछ दमड़ी चुका कर उदर छुदा को मिटा लिया करते थे। कुछ लोग उसके शरीर की कीमत भी लगा दिया करते थे, और वो भी मना नहीं करती थी। लेकिन ज्यादा पैसे की लोलुपता ने उसके मन में कपट भर दिया था।&lt;br /&gt;                  एक रोज़ की बात है, एक राहगीर जिसके पास पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री का कच्चा माल मौजूद था, लेकिन भोजन बनाना नहीं जानता था, इसलिए उसने उस भटियारन की झोपड़ी की ओर कूच कर दिया। दरवाजे पर पहुंचते ही, उसने अपनी फरमाइश भठियारन के सामने रख दी । और भठियारन ने कहा ठीक है, लेकिन खाना बनने में थोड़ा वक्त लगेगा, वो राहगीर वहीं भठियारन की झोपड़ी के एक दूसरे छोटे कमरे में बैठकर खाने का इंतज़ार करने लगा, सब्जी तैयार हो चुकी थी, और रोटियों के लिए आंटा भी गूथा जा चुका था। अब बारी थी, रोटियां सेंकने की। उस आंटे से बनने वाली रोटियों की तादात 12 थी। क्योंकि राहगीर ने बारह बार रोटियों की फट्ट फट्ट (हाथ से बेलने की आवाज़) की आवाज़ को सुना था, लेकिन जब राहगीर को रोटियां परोसी गईं तो रोटियां 12 की संख्या में नहीं बल्कि 8 की संख्या में थीं। राहगीर भौचक्का था, बोला क्या बीबीजी बारह “फट्ट फट्ट, आठ परसीं चार गायब” । पहले तो भठियारन को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जब राहगीर ने अकड़ कर उससे कहा कि मैने बारह बार रोटियां बेलने की आवाज़ को सुना, और तुमने आठ ही परोसीं, ये क्या घपला है। वो भठियारन सफाई देने लगी कि नहीं तुम्हें गलतफहमी हुई है। लेकिन वो राहगीर भी चालाक था और उसकी हरकतों को अच्छी तरह जानता था, वो उसकी रसोई की तरफ गया, और छिपा कर रखी गईं चार रोटियों को दिखाते हुए बोला कि ये वही रोटियां हैं, जो कि तुमने मेरे हिस्से में से चुराकर अपने पास रख लीं। गलत मैं नहीं था, गलत तुम हो अपने ईमान से।        &lt;br /&gt;           तो कहानी का सार यही कहता है कि हिंदुस्तान की सियासत में बनने वाली रोटियां बारह फट्ट फट्ट हैं, जिनमें चार गायब हो जाती हैं, और पता तक नहीं लगता, जनता जनार्दन जानती है, कि सरकार की योजनाओं से जो हिस्सा उसे मिलना चाहिए या तो वो उस तक पहुंच ही नहीं पाता और अगर पहुंचता भी है तो आधा-अधूरा। सरकार के बीच बैठे चंद लोग भठियारन का रोल निभाते हैं, और हम राहगीर हैं, जो अपने हिस्से से टैक्स देते हुए भी अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। आंखों में जब लालच भर जाए तो उन्हें दमड़ी के सिवाए कुछ दिखाई नहीं देता। ऐसा ही हाल भारतीय राजनीति का भी है, यहां भठियारन भी है, और राहगीर भी। &lt;br /&gt;भठियारन की आँखों में सिर्फ लालच भरा है, तो उसे सिर्फ दमड़ी दिखाई देती है, और राहगीर हमेशा की तरह बेचारा बना रहता है। &lt;br /&gt;          बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ के बाद की कहानी भी ऐसी ही है, यहां बाढ़ के बाद अगर कुछ बचता है, तो सिर्फ किसानों के हाथों में रेत, खेतों में खरपतवार, और तबाही, पिछली बाढ़ के बाद दूसरे राज्यों से मिली मदद के बावजूद कई लोग अब तक बेघर हैं, उनके खेतों से अभी तक वो मनहूस रेत नहीं हट सकी है, जिसे पिछले साल की बाढ़ बहा कर अपने साथ ले आई थी। और अब अगर इस बार भी बिहार को इंद्र देवता का कोप झेलना पड़ा, तो नुकसान की सुनामी आ जाएगी। और मुआवज़े या मदद के रुप में वही “बारह फट्ट फट्ट आठ परसीं चार गायब” या फिर शायद इससे भी ज्यादा। हमें उस राहगीर की तरह जागरूक और बुद्धिमान बने रहना होगा, और चेताना होगा सरकार के उन नुमाइंदों को जो सफेदपोश भठियारन का किरदार निभा रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-7930182800105094623?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/7930182800105094623/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=7930182800105094623' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7930182800105094623'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7930182800105094623'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='बारह फट्ट-फट्ट, आठ परसीं चार गायब'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-4636542841510758912</id><published>2010-06-22T00:59:00.000-07:00</published><updated>2010-06-22T01:00:29.555-07:00</updated><title type='text'>चमचा उन्नति कॉर्नर</title><content type='html'>पिछले कई बर्षों से देख रहा हूं, चमचों को फलते-फूलते, ये नहीं पता चल पा रहा था कि वो और क्यों, कैसे, और किस विधि से दिन ब दिन विकसित हो रहे हैं, और भारत विकाशसील का विकाशसील ही बना हुआ है। भारत ढर्रे पर चल रहा है, और वो ढर्रे से हट चुके हैं। शायद यही उनके विकास का जरिया बन गया है। विकासशील भारत की उन्नत तस्वीर जब चमचों के द्वारा खींची जाएगी, तो भारत का गर्त में जाना तय है। खासकर तब जब हिंदुस्तान में चमचा उन्नति कॉर्नर खोला जाने लगा हो। चूंकि अब से कुछ रोज पहले मैने अपने एक ब्लॉग में http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/03/blog-post_29.html  &lt;br /&gt;चमचा काल का जिक्र किया था, इसलिए इसमें जिक्र नहीं करुंगा की चमचों का इतिहास कलिकाल से चला आ रहा है। मेरी बात ढर्रों से थोड़ी हटकर है क्योंकि ढर्रे पर चलना मेरी आदत नहीं, लेकिन मैं एक चमचा भी नहीं, बस चमचों पर नज़र रखने वाला एक ख़बरदार हूं। इसमें कोई शक नहीं हमाम में नंगों की कोई कमी नहीं, लेकिन इस बात में भी कोई शक नहीं कि भारत में चमचों की कोई कमी नहीं। &lt;br /&gt;                     जब घी सीधी उंगली से नहीं निकला, तो चमचों ने उन्नति कॉर्नर खोल लिया। चमचों के इस ठिए में (निवास स्थान) सिर्फ मंत्रणा होती है, भारत के विकास पर नहीं, बल्कि खुद के विकास पर । जनता इन दिनों महंगाई और गर्मी से परेशान हैं, लेकिन चमचों को इससे कोई इत्तेफाक नहीं, क्योंकि वो मेरी नज़र में इंसानों की श्रेणी में नहीं आते, वो एक अलग तरह की प्रजाति है, जिसने पिछले दिनों में बेतरतीब उन्नति की है। बस कुछ ऐसा ही बूछिए कि वो जब चर्चा करते हैं, तो सिर्फ निजी विकास पर। भारत की विकास दर से उन्हें कोई आशय नहीं। &lt;br /&gt;                       चमचों का ये कोना एक ऐसी चर्चा का मंच है, जहां चमचैली परंपराओं की कलश यात्रा से लेकर उनका अश्वमेघ यज्ञ भी किया जाता है। एक बॉस की पीछे दस चमचे ठीक वैसे ही लगे होते हैं, जैसे कातिक की कुतिया के पीछे सड़क छाप कुत्ते। निजी विकास की रबड़ी को लालायित ये कुत्ते, कातिक की कुतिया के पीछे ऐसे पड़े रहते हैं, जैसे गाजर के पीछे गधा। “तात लात रावण मोहि मारा” की तरह किसी दफ्तर के लिए ये विभीषण साबित होते हैं, जैसे ही रावण इनके पिछवाड़े पर लात मारता है, ये फौरन राम की शरण में जाकर सारे राज़ उगल देते हैं। बस अंतर इतना है कि राक्षस कुलीन विभीषण एक सीधा साधा इंसान था, जबकि ये आदम युगीन लोग लोभी प्रजाति के जीव के जीव की तरह हैं। जो नौकरी में प्रमोशन पाने से लेकर, लोगों की नौकरी खाने तक में बॉस की जी हुजूरी बजाते फिरते हैं। काम के नाम पर उनकी दिहाड़ी सिर्फ बॉस को एक मैसेज भेजने मात्र से ही पूरी हो जाती है। मैसेज का विषय कुछ ऐसा रहता है, कि आज दफ्तर में इतने आदमी मौजूद रहे, उस व्यक्ति ने काम किया, अमुक व्यक्ति ने काम नहीं किया, फलाना व्यक्ति आपको गरिया रहा था, और आपकी दुआ से सब बढ़िया चल रहा है। कुल मिलाकर बॉस को भेजा गया ये एसएमएस छ महीनों में ही उनकी तरक्की के साधन जुटा देता । बॉस की जूठन चमचों के लिए नाइट मील से कम नहीं है। और उसकी जूठन खाकर चमचा अपने आप को महान समझता है। &lt;br /&gt;                      ये सच है कि चमचा उन्नति कॉर्नर में मौजूद सारे चमचे बॉस की खिचड़ी हिलाने का काम करते हैं, वो दिगंबर हैं, और उनका बॉस द हेड ऑफ दिगंबर। वाह रे नंग, जो तुम अपने आप को परमेश्वर से भी ऊंचा समझते हो। क्योंकि आपको पता ही होगा “नंग बड़े परमेश्वर से”। इसलिए चमचों की नंगई से बचकर ही रहिएगा। इनकी हरामगर्दी आपकी खुद्दारी को लील सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-4636542841510758912?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/4636542841510758912/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=4636542841510758912' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/4636542841510758912'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/4636542841510758912'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/06/blog-post_22.html' title='चमचा उन्नति कॉर्नर'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-6595966047458253949</id><published>2010-06-13T00:41:00.000-07:00</published><updated>2010-06-13T00:42:28.142-07:00</updated><title type='text'>चिलम चूतिया</title><content type='html'>एक रात की बात है,&lt;br /&gt;बिना विचारे, &lt;br /&gt;मेरे द्वारे,&lt;br /&gt;दो चूतिया पधारे।&lt;br /&gt;मकसद-ए-खाक था,&lt;br /&gt;इरादा नापाक था।&lt;br /&gt;बनाना था मुझे चूतिया,&lt;br /&gt;मौका था अप्रैल फूल का। &lt;br /&gt;भीषण गर्मी थी,&lt;br /&gt;उन्हें ठहराने को, &lt;br /&gt;घर में जगह कम थी।&lt;br /&gt;चू रहा था,&lt;br /&gt;उनकी टांट से पसीना,&lt;br /&gt;उस रात दोनों ने, &lt;br /&gt;कर दिया हराम मेरा जीना।&lt;br /&gt;अपनी संकुचित जुबान से,&lt;br /&gt;बड़े बड़े प्रोजेक्ट मुझे सुझाने लगे।&lt;br /&gt;कम लागत में, &lt;br /&gt;बड़े बनने का ख्वाब, &lt;br /&gt;मुझे दिखाने लगे।&lt;br /&gt;उनकी बातों में उस रात बड़ा दम था,&lt;br /&gt;जो मुझे हर बात सुहाने लगी।&lt;br /&gt;लगा,  &lt;br /&gt;कि अब बड़ा बन जाऊंगा&lt;br /&gt;टेम्स के दर्शन कर पाऊंगा ।&lt;br /&gt;लेकिन उनकी सुलगती, &lt;br /&gt;चिलम-ए-चूतिया का धुंआ,&lt;br /&gt;मैं महसूस न कर पाया,&lt;br /&gt;उनके इरादों को भांप न पाया ।&lt;br /&gt;अपने आप को वो समझ रहे थे, &lt;br /&gt;भारत की महान विभूतियां,  &lt;br /&gt;और बना रहे थे मुझे चूतिया।&lt;br /&gt;था मलाल इस बात का ,&lt;br /&gt;कि वो दो थे ,&lt;br /&gt;और मैं था अकेला, &lt;br /&gt;समझ नहीं पा रहा था,&lt;br /&gt;उनका झमेला ।&lt;br /&gt;उनकी हर बात में रबडी़ का लच्छा था,&lt;br /&gt;उनका हर विचार उस समय बड़ा अच्छा था।&lt;br /&gt;वो ब्रेन वॉश में माहिर थे,&lt;br /&gt;चाट गए किसी दीमक की भांति,&lt;br /&gt;मेरे दिमाग को, &lt;br /&gt;और समझ रहे थे बुद्धिजीवी,&lt;br /&gt;अपने आप को ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-6595966047458253949?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/6595966047458253949/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=6595966047458253949' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6595966047458253949'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6595966047458253949'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/06/blog-post_13.html' title='चिलम चूतिया'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-6689284218954098471</id><published>2010-06-05T06:11:00.000-07:00</published><updated>2010-06-05T06:13:29.361-07:00</updated><title type='text'>हलाल हो गई कसक</title><content type='html'>तुम्हारी कसक मेरे घावों पर लगी उस बैंडेड की उधड़ी पैबंद है जहां से झांकता मेरा घाव अब लोगों को भी नज़र आने लगा है। ये घाव कभी सी नहीं सकेगा कोई, तुम्हारे अहसासों की पुलटिस (मरहम) बार-बार इन घावों को हरा करती रहेगी, ये टीस हमेशा उठती रहेगी। बार बार आवाज़ आएगी, तुम मतलब परस्त हो। मैं तुम्हें जीत तो न सका, लेकिन तुम मेरी हार पर हमेशा हंसते गए। तुम्हारी उस हंसी में आत्म सुख की अनुभूति दिखाई देती है मुझे। शायद तुम्हारा आत्मसुख मेरी हार से ही जीवित है। मैं हर बार हारुंगा ऐसा नहीं होगा। जीतने आया था, जीत कर जाऊंगा। मेरी इच्छाएं नेपोलियन के साहस से भी ऊंची हो जाती हैं, जब मैं इस खेल में अपने आप को हारा हुआ महसूस करता हूं। कभी न झुकने का साहस मेरी खुद्दारी है। हो सकता है कि मैं थोड़ा सा नरम हुआ हूं, लेकिन झुका कभी नहीं। तुमने शायद इसी नरमी को गले लगाकर जीत का हार पहन लिया हो। लेकिन मैं अपनी हार से ऊपर उठ जाऊंगा, तुम्हें हराकर जाऊंगा। तुम्हारे साथ के अहसासों में मैने अपने आप को कहीं खो दिया था। लेकिन अब निष्ठुर हो चुका हूं। कहीं खोने नहीं दूंगा अपने आप को । अब साधा हुआ तीर चिड़िया की आंख पर ही लगेगा। मेरे दरीचे का जो शामियाना तुम्हारे तूफान से उखड़ गया था, वो अब फिर लग चुका है। फिर बहार उस शामियाने को अपने आगोश में लेने वाली है। तुम्हारी हर मीठी छुअन अब चुभन बन चुकी है। पोटेशियम साइनाइट बनते जा रहे हो तुम मेरे लिए, मैं तुम्हें सिर आंखों पर बिठाता गया, और तुम चंदन पर लिपटे सांप की ही तरह मेरे तन को डसते चले गए।तुम खुद्दार हो किसी के लिए ये तो मैं नहीं जानता, लेकिन तुम्हारी गद्दारी ने मुझे खूब सिखाया है। वक्त बदल चुका है, राहों के कांटे अब पुष्प बन चुके हैं। तुम्हारी याद करके इन लम्हों में और ज़हर नहीं घोलना चाहता। तुम्हारे सुख की कामना करता रहूं, अब शायद ये भी न हो पाए मुझसे। अगर तुम व्यस्त हो, तो मैं तुमसे ज्यादा व्यस्त हूं। मेरी जीवनी में तुम एक ऐसा चरित्र बन बैठे थे, जो मुझे हमेशा कमज़ोर करता रहा। अपनी इसी कमज़ोरी से निपटने का उपाय ढूंढ लिया है मैने। जाओ चले जाओ कहीं दूर, जहां से न मैं तुम्हारी आवाज़ सुन सकूं, और न ही तुम्हें देख ही सकूं। तुम एक बेरहम कातिल हो, तुमने मेरे शरीर का कत्ल तो नहीं किया। लेकिन मेरी आत्मा और मेरे अहसासों को हलाल जरुर कर दिया। अब वो अहसास कभी जीवित न होंगे। जाओ किसी कण में अब तुम्हारी शक्ल मुझे दिख जाए न कहीं। मेरी कसक की हलाली करने वाले ऐ दोस्त तुम्हारी गुमशुदगी अब कभी तलाश न हो सकेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-6689284218954098471?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/6689284218954098471/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=6689284218954098471' title='16 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6689284218954098471'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6689284218954098471'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='हलाल हो गई कसक'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3140141043503890853</id><published>2010-05-19T23:55:00.000-07:00</published><updated>2010-05-19T23:56:21.986-07:00</updated><title type='text'>तीन मिनट की ‘लोन व्यवस्था’</title><content type='html'>भारत एक कृषि प्रधान देश है, साथ ही तुर्रमखाओं का देश भी है। यहां तुर्रमखाओं ने अपनी तुर्रमई की बदौलत पड़ोसियों को जलने-कुढ़ने पर मजबूर कर दिया है, ‘पड़ोसियों की जलन आपकी शान’ सभी को याद होगा। कि किस तरह से एक कंपनी की टीवी खरीदने से दूसरों के जलन की व्यवस्था हो जाती है। यहां हमारी शान से कोई मतलब नहीं विशेष प्रायोजन तो दूसरे की जलन से है। नब्बे के दशक में विलासकारी वस्तुओं की खासी कीमत हुआ करती थी। इन वस्तुओं को घर में सजाने के लिए पहले योजनाबद्ध होना पड़ता था, उसके बाद अगर योजना अमल में आ जाती थी, तो घर में अच्छे पकवानों के साथ उस योजना का शुभारंभ भी हो जाता था। मसलन बीस हजार रुपए में अगर रंगीन टेलीविजन बाज़ार में बिक रहा है, तो तुर्रमखां को कम से कम बीस बार सोचना पड़ता था, उसके बाद कहीं जा कर जोड़-जुगाड़ भिड़ा कर रंगीन स्क्रीन टीवी घर पर आ पाता था। और यहीं से शुरु हो जाती थी, पड़ोसी के जलने की व्यवस्था।&lt;br /&gt;    उस वक्त विलासकारी समस्त वस्तुओं के दाम इतने ज्यादा हुआ करते थे, कि सरकारी नौकरी करने वालों के बस के बाहर की बात थी, कि वो हर सुविधा का लुत्फ उठा सकें। जिस तरह से जब ताकत तानाशाह बन जाती है तो विनाश की बू आने लगती है। ठीक वैसी ही कहानी है  भारत में लोन व्यवस्था की, यहां धन संपन्न होना समाज में पैठ है, ख्याति है, डूड है, हंक है, एलीट है, और न जाने क्या क्या, लेकिन अगर आप धन संपन्न नहीं हैं तो, आप नाकारा हैं, काहिल हैं, मजबूर हैं, गरीब हैं, सस्ते हैं, निरीह हैं, हैरान हैं, परेशान हैं, और न जाने क्या क्या। &lt;br /&gt;                    चलिए शुरु करते हैं लोनिंग व्यवस्था के बारे में। ये आज के युग में सभी के लिए ठीक वैसे ही जरुरी है, जैसे एकाउंट्स में व्यापार आरंभ करने की जर्नल एंट्री। अमीर हो तो लोन, गरीब हो तो लोन, कहीं के नहीं हो तो भी लोन। लोन यूनिवर्सल है, तुर्रमखां ने लिया लोन और बनवा ली कोठी, खरीद ली कार, लगवा लिया एसी, और बन गए एलीट, ब्याज चुकाए पड़े हैं, नौबत ये आ गई है कि जो खरीदा था वो धीरे धीरे बेंचना पड़ रहा है। यही तो कर्ज की माया है, और कर्जदार का दुर्भाग्य।&lt;br /&gt;                    बड़ी पुरानी कहावत है, किसान कर्ज में जन्म लेता है, और कर्ज में मर जाता है। लेकिन फिर भी कर्ज लेता है, ले भी क्यों न,  कृषि प्रधान देश है तो क्या, यहां किसानों की इज्जत करने वाले न तो हम हैं और न सरकार । हालांकि सरकार ने तो इस बार ऋण माफ कर दिया, लेकिन साहूकार कोई मर थोड़े ही गए हैं, किसान उनसे और लोन लेंगे, और साहूकार उनसे और ब्याज लेंगे। नतीजा ये निकलेगा कि बेचारे की लुटिया डूब जाएगी। उसकी ज़मीन पर सामंतवाद का अंगूठा लगा दिया जाएगा । और किसान फिर मजबूर हो जाएगा कर्ज में मरने को। &lt;br /&gt;                 लोन की बात चली रही है तो एक साइन बोर्ड पर आपकी नज़र ले जाता हूं, जो कहता फिरता है कि “तीन मिनट में लोन” । ये तीन तिगाड़ा जहां भी होता है काम बिगाड़ता ही है। लेकिन किसी रचनात्मक व्यक्ति द्वारा रखी गई ये पंच लाइन, बड़ी सफाई से चूतिया बना रही है। पहले तो ये सुनें कि तीन मिनट में कर्जदार बनाने वाली कंपनिया, तीस चक्कर कटवाती हैं, उसके बाद कहीं जाकर इंसान को कर्ज में डुबा दिया जाता है। औद्योगिक क्रांति है, सभी को कर्ज चाहिए किसी को  इनकम टैक्स से बचने के लिए तो किसी को पड़ोसियों की जलन के लिए, तो किसी को दो जून के लिए। ऐसे में तीन मिनट की लोन व्यवस्था बड़ी आसान नज़र आती है।&lt;br /&gt;                 ये तीन मिनट की लोन व्यवस्था दूर का ढोल है जरा उनसे पूछिएगा जो इस सुविधा का कथित तौर पर आनंद उठा चुके हैं। उनके लिए आज का आनंद कल का रोग बन चुका है। हायर परचेज़िंग और इंस्टॉलमेंट सिस्टम ने सिस्टम खराब कर दिया है। ये व्यवस्था, उदारवादी युग में साझीदार बन चुकी है। एक ऐसा साझीदार जो सिर्फ सुख का साथी है, दुखों के दौर में वो मौत बनकर प्रकट हो जाता है। लोन लेने से पहले विचारना ये कर्जदार की फितरत नहीं, यही कारण है कि बाद में उसे कई बार लोन माफियाओं के लट्ठ खाने पड़ते हैं। लोनिंग के पीछे बैठी लोन माफियाओं की ताकत कर्जदारों की नींद हराम कर देती है। ये इतने ताकतवर होते हैं कि अगर आपने अपनी किश्त वक्त पर नहीं जमा की तो ये आपका आने वाला वक्त खराब कर सकते हैं। लठैतों को ट्रेंड करने वाली ये निजी कर्ज संस्थाएं बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह फैली जा रही हैं। एक कर्जदार के पीछे चार लठैत नियुक्त किए जाते हैं। जो किश्त वक्त पर नहीं भर पाता उसे घर से उठवाने का माद्दा भी रखते हैं ये। प्रशासन इनकी दौलत और रसूख के सामने खुद को बौना साबित कर लेता है। यही कारण है कि कर्ज का कैंसर लाइलाज बीमारी बनने की कोशिश करने लगा है।  &lt;br /&gt;               खैर तुर्रमखां अब लोन लेंगे, इस बात का तो पता नहीं, लेकिन वो लोनिंग प्रक्रिया के परिणामों को नहीं भूलेंगे। कई बार ऐसा होता है कि दूसरों को जलाने के चक्कर में हम खुद जल जाते हैं। जलन बड़ी महान है, दूसरों को हो जाए तो समझिये हमारे लिए सबसे बड़ा सुख । तो कवि कहता है कि लोन लेकर तुर्रमखां न बनिए। दूसरे आपके सुखों से जलेंगे, ये मत सोचिए। बस ये सोचिए कि अब कर्ज नहीं लेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3140141043503890853?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3140141043503890853/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3140141043503890853' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3140141043503890853'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3140141043503890853'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/05/blog-post_19.html' title='तीन मिनट की ‘लोन व्यवस्था’'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-9047732303691641753</id><published>2010-05-12T07:25:00.000-07:00</published><updated>2010-05-12T07:29:00.494-07:00</updated><title type='text'>सीख, सरीखत और विनाशकारी विचार</title><content type='html'>वक्त इतना नहीं बीता कि, अभी सब कुछ ठीक न हो सके। सबकुछ समेटा जा सकता है। बहुआयामी विकास के जिस चेहरे और मोहरे को गढ़ने के चलते हमने बहुत कुछ खो दिया है। वो हम फिर से पा सकते है। भारत की विकास दर पर भले ही हल्ला होता है । लेकिन विकास की आड़ में बढ़ती विनाश दर ने ज़िंदगी के मायने ही बदल दिए हैं।&lt;br /&gt;कंकड़ों के जंगल से लेकर हरी घास के मैदानों तक भारत थोथे विकास का एक ऐसा जामा ओढ़े हुए है। जिसका भविष्य सिर्फ शून्य है। विकास की अंधी में विनाश का चेहरा बड़ा भयावह हो जाता है। और यही हमारी समझ में नहीं आता । या यूं कहें बुद्धिजीवी होते हुए भी समझने की चेष्ठा नहीं करते। यही हमारा दुर्भाग्य भी है। &lt;br /&gt;      विकास के भोथरे चाकू के बल पर हम सरीखत कर लेते हैं। लेकिन ये सरीखत बंदर की खौं-खौं से कुछ ज्यादा नहीं है।                                                          सरीखत करने की इसी परंपरा ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है। जिसका नतीजा है कि हम आज हम उदीयमान भारत की ब्लर तस्वीर देख पा रहे हैं। लेकिन कहते फिरते हैं, कि हम एलीट हो चुके हैं। सच क्या है, ये जानते हैं, फिर भी खीसें नपोरते हैं। विडंबना यही है विकास की आड़ में विनाश को ढोने के तरीके ईजाद किए जाने लगे है। &lt;br /&gt;                                      यहां एक चीज़ पर ध्यान दें। कि सरीखत और सीख में बड़ा अंतर होता है। सरीखत इंसान में बेवजह की होड़ पैदा करती है। जबकि सीख उद्देश्यपरक होती है। लेकिन हम सरीखत करते हैं। सीखते कहां हैं ? उदाहरण के तौर पर हम नकस्ली आंदोलन को ले सकते हैं। जिसको पांच दशक होने को हैं। और लाल सलाम बेगुनाहों के शोणित से सना जा रहा है। यहां भी बात विकास की ही थी। विचारों के विकास की ! साठ का दशक खत्म होने को था। और कुछ युवा बंदूक उठाकर विचारों की आजादी चाहने की फिराक में थे। सोचिए कि क्या बंदूक की नोक किसी के विचारों को आजाद करा सकती है। नहीं कतई नहीं। शायद इस आदिवासी आंदोलन को इस बात का मलाल है कि उन्हें आज़ादी के आंदोलन में शामिल नहीं किया गया। या उनकी सक्रियता को नज़र अंदाज़ कर दिया गया । यहीं हमें सीखने की जरुरत है सरीखत की नहीं। इटली एक बड़ा उदारण बन सकता है। 1861 में इटली के एकीकरण की शुरुआत थी। उनके भी आंदोलन का रंग लाल था। और नक्सली विचारधारा भी लाल रंग को मानती है। लाल रंग या तो इनके मायनों में विरोध का ज़रिया थी। या फिर रक्त को इंगित करने वाला विरोध था। इटली के एकीकरण के दौरान गैरीबाल्डी का बड़ा योगदान माना जाता है। ठीक वैसे ही चारु मजूमदार और कानू सान्याल को भी नक्सली आंदोलन की शुरुआत के लिए जाना जाता है। लेकिन यहां अंतर है विचारधारा के भटकने का । जहां इटली के एकीकरण में लाल कुर्ती वालों ने बेहतरीन भूमिका निभाई। वहीं नक्सली आंदोलन बंदूक की नोक के बल पर सियासत को जीतने वाली जंग बन गई।  &lt;br /&gt;एक तरफ भटकाव था। तो दूसरी तरफ सही राह पर चलने वाले आंदोलन कारी। जो लोग सही रास्ते पर चल निकले उनके हालात कभी हमसे कहीं बुरे थे। लेकिन विचारों में भटकाव को उन्होंने वक्त रहते समझ लिया और हम नहीं समझ पाए। यही वजह है कि आंतरिक आतंकवाद बन चुका नक्सलवाद भारत के कई राज्यों में अपनी पकड़ और मजबूत कर चुका है। भारत के कई राज्य अब लाल स्याही से चिन्हित हो चुके हैं। जिनके निशां मिटा पाना इतना आसान नहीं रहा जितना हम समझ रहे हैं। &lt;br /&gt;                                 छत्तीसगढ़ सरकार ने सलवा जुडूम की शुरुआत की, लेकिन रमन सिंह की नादानी ने और ज्यादा बेगुनाहों को हत्यारा बना दिया। सलवा जुडूम में आम नागरिकों को अपनी रक्षा के लिए हथियार मुहैया कराए गए। लेकिन नक्सलियों को ये बात नागवार गुजरी और उन्होंने बंदूक की नाल का मुंह और खोल दिया। रोजाना बह रहा खून इस आंदोलन की भद पहले ही पीट चुका था। और अब सरकार की अजीब नीतियां नक्सलियों को और ज्यादा खूंखार बना रही है। &lt;br /&gt;                                                      विकास की राहों पर ये भारत का विनाशकारी चेहरा है। जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे हालात पैदा कर देता है। इस इस समस्या से क्या नहीं निपटा जा सकता ? निपटा जा सकता है। लेकिन ठोस उपायों के साथ, सरीखत से नहीं, सीख से, बंदूक से नहीं, भटकाव से नहीं। सोचिए विनाशकारी विचारों से बचने के बारे में, जो हमें बरबस ही जान लेने और जान गंवाने पर मजबूर कर रहे हैं। इन विचारों का जल्द ही अंत होना चाहिए। नहीं तो लाशों का सौदा ही इस आंदोलन की विचारधारा बन जाएगा। वक्त रहते संभल जाइये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-9047732303691641753?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/9047732303691641753/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=9047732303691641753' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/9047732303691641753'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/9047732303691641753'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/05/blog-post_12.html' title='सीख, सरीखत और विनाशकारी विचार'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-1114931908145181629</id><published>2010-05-10T07:05:00.000-07:00</published><updated>2010-05-28T07:40:48.491-07:00</updated><title type='text'>दुखती रग</title><content type='html'>रोम-रोम&lt;br /&gt;हर रग-रग पर&lt;br /&gt;दुखती हर नस&lt;br /&gt;जब रह-रह कर&lt;br /&gt;जलते ज़ख्मों &lt;br /&gt;पर वार करे&lt;br /&gt;कष्टों की बंदिश पार करे&lt;br /&gt;द्रवित ह्रदय&lt;br /&gt;कुछ यादों में&lt;br /&gt;सिमटे, बिखरे जज्बातों में&lt;br /&gt;ओझल आंचल के ख्वाबों में&lt;br /&gt;दुखती है रग&lt;br /&gt;चीत्कार सी करती है&lt;br /&gt;कहती है&lt;br /&gt;उनको मिले सज़ा &lt;br /&gt;जो मिली&lt;br /&gt;कभी न &lt;br /&gt;कहीं किसे&lt;br /&gt;क्यों बांटी तब &lt;br /&gt;मौत उन्होंने &lt;br /&gt;क्यों छीन लिया &lt;br /&gt;एक आंचल&lt;br /&gt;क्या रिश्ते &lt;br /&gt;समझ नहीं पाते वो&lt;br /&gt;बस ढोते हैं वहशीपन को&lt;br /&gt;मौत बांटते फिरते हैं&lt;br /&gt;लाशों का सौदा करते हैं&lt;br /&gt;क्यों सवाल बाकी हैं उनके&lt;br /&gt;जिनकी राहों में&lt;br /&gt;रक्त बहा&lt;br /&gt;अब नहीं चाहिए&lt;br /&gt;बहता शोणित&lt;br /&gt;अब नहीं चाहता &lt;br /&gt;दुखती रग&lt;br /&gt;अब नहीं चाहता &lt;br /&gt;दुखती रग...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-1114931908145181629?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/1114931908145181629/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=1114931908145181629' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/1114931908145181629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/1114931908145181629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/05/blog-post_10.html' title='दुखती रग'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-4509158093292436154</id><published>2010-05-07T07:28:00.001-07:00</published><updated>2010-05-07T07:29:40.038-07:00</updated><title type='text'>'गुण' माता के दूध में...</title><content type='html'>प्रश्न पूछते क्लास में,&lt;br /&gt;मास्टर वेंकट राव, &lt;br /&gt;गुण माता के दूध में,&lt;br /&gt;क्या-क्या हैं बतलाओ, &lt;br /&gt;क्या क्या हैं बतलाओ,&lt;br /&gt;तभी एक बोला बच्चा,&lt;br /&gt;बिना उबाले पी सकते हैं, &lt;br /&gt;इसको कच्चा,&lt;br /&gt;अदर दूध से मदर दूध,&lt;br /&gt;होता पॉवरफुल,&lt;br /&gt;इसमें चीनी नहीं,&lt;br /&gt;डालनी पड़ती बिल्कुल,&lt;br /&gt;हाथ खड़ेकर सोनू बोला,&lt;br /&gt;लाख विटामिन मइया में, &lt;br /&gt;गिरा न देना चइया (चाय) में&lt;br /&gt;इतने में एक बोली लड़की लिल्ली,&lt;br /&gt;मम्मी जी का दूध, &lt;br /&gt;नहीं पी सकती बिल्ली,&lt;br /&gt;पॉवरफुल इस दुद्धू का,&lt;br /&gt;अपमान कभी न करना,&lt;br /&gt;माता जी के चरणों में,&lt;br /&gt;अपने को अर्पण करना ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-4509158093292436154?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/4509158093292436154/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=4509158093292436154' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/4509158093292436154'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/4509158093292436154'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/05/blog-post_07.html' title='&apos;गुण&apos; माता के दूध में...'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3173745997824600563</id><published>2010-04-18T06:04:00.000-07:00</published><updated>2010-04-18T06:06:41.103-07:00</updated><title type='text'>मृग-नयनी</title><content type='html'>सूनी गलियों में उनका आना&lt;br /&gt;कुछ ऐसा लगता है&lt;br /&gt;ज्यों बदन तपाती गर्मी में&lt;br /&gt;शीत हवाओं का सहलाना&lt;br /&gt;हिम सी सुंदर उसकी छवि में&lt;br /&gt;थोड़ी गर्माहट घुल जाना&lt;br /&gt;मृग-नयनी सी जंगल में वो&lt;br /&gt;है ढूंढ रही कस्तूरी को&lt;br /&gt;नहीं जानती, वो नादां है&lt;br /&gt;वो खुशबू उसमें ही है&lt;br /&gt;मोम सी नाजुक वो गुड़िया है&lt;br /&gt;मखमल के अहसासों सी&lt;br /&gt;मादक उसकी इतनी काया&lt;br /&gt;है मर्तबान में हाला सी&lt;br /&gt;बालों के रेशम को सुलझाती &lt;br /&gt;है जैसे उलझ तसब्बुर में&lt;br /&gt;याद किसी की रह रह आती&lt;br /&gt;न जाने कौन बसा मन में&lt;br /&gt;छणिक कपट क्या उसके मन में&lt;br /&gt;नहीं बताती वो कुछ भी&lt;br /&gt;मेरी उलझन को सुलझा दे&lt;br /&gt;बस बात बता दे वो कुछ भी&lt;br /&gt;सखियों से कहती है कुछ वो&lt;br /&gt;न सीधे मुझसे कह पाई&lt;br /&gt;न प्यार करे, मंजूर मुझे&lt;br /&gt;है नफरत ऐसी क्यों पाई&lt;br /&gt;पता नहीं क्यों उम्मीद बड़ी है &lt;br /&gt;उसके वापस आने की&lt;br /&gt;मेरे सूने आसमान पर &lt;br /&gt;फिर बादल सी छा जाने की&lt;br /&gt;मेरे सूने आसमान पर &lt;br /&gt;फिर बादल सी छा जाने की...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3173745997824600563?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3173745997824600563/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3173745997824600563' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3173745997824600563'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3173745997824600563'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/04/blog-post_18.html' title='मृग-नयनी'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-4431110989476929236</id><published>2010-04-04T04:28:00.000-07:00</published><updated>2010-04-04T04:30:53.010-07:00</updated><title type='text'>सफलता की आतिश</title><content type='html'>अद्भुत, अदम्य, साहस की परिभाषा&lt;br /&gt;जिससे दूर रहे हमेशा निराशा&lt;br /&gt;घुंघरुओं की तरह बजने की आदत&lt;br /&gt;एक इत्तेफाक़, एक इबादत&lt;br /&gt;हर किसी को कायल कर देना&lt;br /&gt;बगैर तीर के घायल कर देना&lt;br /&gt;लूट ले बगैर कुछ होते हुए भी&lt;br /&gt;पा जाए बहुत कुछ न कुछ होते हुए भी&lt;br /&gt;ज़िंदगी को मिसाल बनाकर&lt;br /&gt;हर लम्हे को तराश कर&lt;br /&gt;जीने की बड़ी चाह&lt;br /&gt;कुछ पाने की की उससे भी बड़ी चाह&lt;br /&gt;औरों से हटकर&lt;br /&gt;देती है जवाब पलटकर&lt;br /&gt;श्याम वर्ण चेहरे पर&lt;br /&gt;अजब सी मुस्कुराहट&lt;br /&gt;बेबाक, बैलौस&lt;br /&gt;उसकी बातों के घुंघरुओं की &lt;br /&gt;बजने की आहट &lt;br /&gt;सतत् बढ़ते कदम सफलता की ओर&lt;br /&gt;छूना चाहते हैं हिमालय का हर पोर&lt;br /&gt;सच और झूठ में उलझते कदम&lt;br /&gt;हर कुछ हासिल करने का दम&lt;br /&gt;विविध उलझनों से जूझती&lt;br /&gt;निरंतर प्रयत्न करती&lt;br /&gt;हाला सी कशिश चेहरे पर&lt;br /&gt;मदहोशी है उसकी निगाहों पर&lt;br /&gt;अंधेरे में जलती लौ सी प्रकाशित&lt;br /&gt;जैसे वो है कोई &lt;br /&gt;सफलता की आतिश, सफलता की आतिश...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-4431110989476929236?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/4431110989476929236/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=4431110989476929236' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/4431110989476929236'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/4431110989476929236'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='सफलता की आतिश'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-8399110898231928303</id><published>2010-03-29T00:27:00.000-07:00</published><updated>2010-03-29T00:28:18.743-07:00</updated><title type='text'>महामना लंपटेश्वर चमचा, सर्वत्र व्याप्तये</title><content type='html'>चमचों का इतिहास कलिकाल से चला आ रहा है। सबने अपने अपने चमचे बनाए। और चमचे थे कि बनते चले गए। कलिकाल की परंपराओं को जीवत रखना वर्तमान का ठेका है। इस लिहाज़ से हर कोई परंपराओं का ठेकेदार है। चमचैली परंपरा इन्हीं कारणों से जीवित है। सभी इसको जीवित रखना चाहते हैं। क्योंकि बगैर चमचा आज के युग में कोई कार्य नहीं हो सकता। चमचा बनना मिसाल है, ताकत है, बुद्धि है, विज्ञान है, जुगाड़ है, और मजबूरी भी है। जिसके पास ऊंचा ओहदा है। उसके पास चमचों की कमी नहीं। या यूं समझें, चमचे उसी के पास होंगे जो ऊंचे ओहदे पर विराजमान होगा। कुलयोग किया जाए तो चमचा सूक्ति कुछ इस प्रकार बनती है। ‘महामना लंपटेश्वर चमचा, सर्वत्र व्याप्तये’। &lt;br /&gt;       गौर कीजिएगा, कि कांग्रेस वाली बड़ी मैडम के पास खूब चमचे हैं। उत्तर प्रदेश वाली बहन जी के पास खूब चमचे हैं। बीजेपी के नवीन अध्यक्ष के कई चमचे बन गए हैं। ठीक उसी प्रकार से एक मैडम और भी हैं। जिनके खूब चमचे हैं। इन चमचों के पास बुद्धि है, विवेक है, चालाकी है, मिथ्या है, और है पटाने का ढंग। जो एक कुशल चमचे के लिए बेहद जरुरी है। ऐसे भी कह सकते हैं। कि इतने सारे गुणों से लबरेज़ इंसान ही एक सफल चमचा हो सकता है। मैडम के इर्दगिर्द व्याप्त चमचे हमेशा ही बिलबिलाते रहते हैं। कभी बिजली के बिल के लिए। कभी स्टेशनरी के बिल के लिए, कभी फोन के बिल के लिए, कभी किसी के लिए। बस मैडम पटाऊ तकनीक हमेशा ढूंढते रहते हैं। और ऐसी तकनीकों की इनके पास कमी भी नहीं रहती । पिछले कई दिनों से चमचों ने संगठन में विकास मेरा आशय विनाश से है, की ऐसी बयार बहाई है कि गुलाब की खुशबू भी अब जुलाब के बाद का रिजल्ट हो चुकी है।&lt;br /&gt;    महामना लंपटेश्वर समुदाय पिछले कई दिनों से प्रगति पर है। और जो लंपट नहीं हैं। वो विकासशील भी नहीं हैं। यानि लंपट और विकास का भी सीधा संबंध होता है। लंपट हो तो विकास है। लंपट नहीं हो। तो विकास भी नहीं है। लगता है विकास की आधुनिक परिभाषा भी लंपटों के हाथों से ही लिखी जाएगी। और टुटपुंजिए धरे के धरे रह जाएंगे। &lt;br /&gt;वैसे एक बात तो है कि टुटपुंजिए अपनी गैरविकास तकनीकों को लंपटों पर मढ़ देते हैं। क्योंकि वो विकास कर नहीं पाते । और लंपटों के विकास से ईष्या होती है। बेचारे टुटपुंजिए आज भी विकास की राहें गढ़ने को सड़कें खोदे पर पड़े हैं। और लंपट हैं कि जोर-जुगाड़ से सड़क बनाने का क्रेडिट खुद ले लेते हैं। बाप बड़ा न भइया, सबसे बड़े लंपट भइया। बड़े इसलिए कि वो जानते हैं कि विकास किस विधि करना है। &lt;br /&gt;         कुछ रोज की बात है । एक लंपट चमचा बड़ा उदासीन नजर आ रहा था। वो मैडम की चमचई से आजिज आ चुका था। क्योंकि उसकी चमचागिरी का पारिश्रमिक उसे नहीं मिल पा रहा था। कुछ ऐसा भी था। कि बड़े चमचे छोटे चमचे पर हावी हो चले थे। जो उसका पारितोषिक मार रहे थे। मैने उसके मजनू छाप चेहरे को देखकर उससे कुछ पूछा तो नहीं। लेकिन उसने खुद ही बता दिया । कि भइया, मैडम बड़ी हराम हो गई है। जो कुछ अच्छी जुगाड़ चल रही थी। वो अब नहीं हो पा रही है। मैने कहा, भइया देखो गलती मैडम की नहीं । गलती तुम्हारी है। तुम चमचागिरी का प्रमोशन नहीं ले पाए। और दूसरे तुमसे बड़े कम समय में बड़े चमचे बन बैठे। तुम्हारे पास तो चमचागिरी का पांच साल का अनुभव था। लेकिन तुम अनुभव का फायदा ही नहीं उठा पाए। जरा उन्हें देखो पांच महीनों में ही चमचागिरी के मैनेजिंग एडिटर हो गए हैं। मैडम की सारी व्यवस्थाएं देख रहे है। आलम ये है प्यास मैडम को लगती है। तो पानी वो पी लेते हैं। दिसा मैडम को लगती है। तो मैदान वो हो लेते हैं। सिग्नेचर मैडम के होने होते हैं। कर वो देते हैं। वाकई मैडम ने बड़ी जल्दी प्रमोशन दे दिया उसे। और तुम हो कि। हुंह धिक्कार है तुम्हारी चमचागिरी पर। &lt;br /&gt;                                                        इतना सुनने के बाद हैरान परेशान छोटा चमचा बोला यार क्या बताऊं मेरी मजबूरी थी। जो मैडम के साथ हो लिया। ईमान-धर्म सबकी बलि देकर उनका कार्य निपटाता रहा । लेकिन ढपोरशंखों ने मेरी पीठ में ही छुरा घोंप दिया। मुझसे ही चमचई के सारे गुण सीखे और मेरे ऊपर ही उनका प्रयोग भी कर दिया। मैने कहा, तो अब भुगतो। ओखली में सिर दिया था। और मूसलों के वार से चोट लगती है।  &lt;br /&gt;              बेचारे चमचा जूनियर की हालत खस्ता थी। और मैं उसे ऐसे सुना रहा था। जैसे वो मेरा कोई दुश्मन हो। उसके दुख और दर्द की सीमाओं का कोई ओर छोर नहीं था। वो कुत्सित हो चुकी व्यवस्था से त्रस्त था। लेकिन ये बीज उसी के बोए हुए थे। जो अब फल के रुप में उसके सामने आ रहे थे। चूल्हे में अगर कंडे डालो तो धुआं होता ही है। उस धुएं से आंखों में जलन भी होती है। चमचा जूनियर भी कुछ ऐसा ही कर बैठे थे। आधुनिकता के दौर में चूल्हा जलाया और उसमें कंडे ठेल दिए । अब बगैर धुएं आग की गुजारिश कर रहे हैं। जो फिलहाल संभव नहीं। धुएं का कष्ट तो झेलना ही पड़ेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-8399110898231928303?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/8399110898231928303/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=8399110898231928303' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/8399110898231928303'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/8399110898231928303'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/03/blog-post_29.html' title='महामना लंपटेश्वर चमचा, सर्वत्र व्याप्तये'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3012717330026130658</id><published>2010-03-23T03:33:00.000-07:00</published><updated>2010-03-23T03:34:20.442-07:00</updated><title type='text'>गर्म-आहट</title><content type='html'>सिकुड़ती रात&lt;br /&gt;बाहें फैलाता दिनकर&lt;br /&gt;सर्द हवाओं पर &lt;br /&gt;अब अधिकार जताती &lt;br /&gt;गर्महवा&lt;br /&gt;सच ही है &lt;br /&gt;वक्त से पहले दस्तक दे चुकी है&lt;br /&gt;गर्म-आहट&lt;br /&gt;बदन पर चिपचिपा पसीना&lt;br /&gt;गले में पानी की कमी से&lt;br /&gt;चुभते शूल&lt;br /&gt;शुष्क हवा के साथ &lt;br /&gt;उड़ती धूल&lt;br /&gt;फाग में मुरझा चले हैं&lt;br /&gt;धरती पर कुछ निरीह फूल&lt;br /&gt;ऊपर अंबर &lt;br /&gt;नीचे धरती की बढ़ती बेचैनी&lt;br /&gt;जीव धरा के व्याकुल से हैं&lt;br /&gt;और हवा में पंछी&lt;br /&gt;निडर आसमां&lt;br /&gt;में घबराहट&lt;br /&gt;और घबराहट है गंगा में&lt;br /&gt;छांव मांगता पीपल अपना&lt;br /&gt;उस बैरागी सी यमुना में&lt;br /&gt;अब घुलती जाती गर्माहट&lt;br /&gt;अब घुलती जाती गर्माहट&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3012717330026130658?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3012717330026130658/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3012717330026130658' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3012717330026130658'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3012717330026130658'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/03/blog-post_23.html' title='गर्म-आहट'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-5083422643909472829</id><published>2010-03-18T03:55:00.000-07:00</published><updated>2010-03-18T03:57:04.498-07:00</updated><title type='text'>मइय्यत से पेज थ्री तक ‘मेकअप वाली भठियारन’</title><content type='html'>(मैडम को भठियारन का टाइटिल इसलिए दिया जा रहा है। क्योंकि एक रसूख युक्त खानदान में जन्म लेने के बाद भी वो अपने जीवन में सिर्फ भाड़ ही झोंक पाईं थी। वो इंसान का रक्त चूस कर उस रक्त को भाड़ में घासलेट की तरह इस्तेमाल किया करती थीं।)    &lt;br /&gt;मइय्यत थी, तो याद आया मैडम भठियारन को। कि आज सफेद साड़ी पहननी है। लाली नहीं लगानी है। नाखूनी(एलीट रुप में नेल पॉलिश) नहीं लगानी है। बाल ड्रायर से नहीं सुखाने हैं। गले में हार-जीत नहीं पहननी है। नाभी में नथ नहीं डालनी। कानन-कुंडल नहीं डालने। हाथ में काली जुराब नहीं पहननी। चेहरे पर फाउंडेशन नहीं लगानी । इत्र फुलेल से कोसों दूर रहना है। और एक शरीफ ढोंगी की तरह दिखना है। जनाज़े वाला घर किसी दुख प्रदर्शन वाली पार्टी का घर होता है। ऐसा भठियारन मानती थी। जहां पहले से ही कई ढोंगी अपने विभिन्न स्वांग का प्रदर्शन कर रहे होंगे । वे ऐसा ही सोच कर किसी की मइय्यत में जाती थी। कुल कर मिलाकर आलम जो बनता था। वो ये था कि हंसनी इस बार कौवे की चाल चलने को मजबूर हो रही थी। वो आज से पहले हंसनी ही थी। वो ही ऐसा मानती थी। हमारी नजरों में तो वो कौवा ही थी। &lt;br /&gt;                                                                                 मैडम अब अपनी फुर्र-फुर्र फरारी से मइय्यत वाले घर को निकल चुकी थीं। मन ही मन उन विधियों के बारे में सोच रही थीं। कि कैसे लोगों को चूतिया बनाना है। यानि संवेदनशील होने का ढोंग किस विधि से  करना है। हालांकि ये कोई पहला मौका नहीं था जब पेज थ्री वाली मैडम को किसी की मइय्यत में जाने का मौका मिला हो। इससे पहले भी वो कई बार वो लोगों को बड़ी सफाई से बेवकूफ बना चुकी थीं। लेकिन हर बार रचनात्मक विचारों के साथ भी चूतिया बनाना होता है। इसलिए वो फुर्र फुर्र फरारी में कुछ सोच रहीं थीं। मैडम की सोच पर  कलियुगी तुलसीदास की कुछ पंक्तियां याद आती हैं ‘केहि विधि नाथ बनावऊं चुतिया तोरा’। &lt;br /&gt;     करीब एक सौ तीस किलो मीटर प्रतिघंटा की चाल से मैडम दुख मानने पहुंच चुकी है। उस घर में जहां कोई परालौकिक हो चुका है। माहौल पुरानी फिल्मों में प्रेमिका के पुरुष मित्र की मृत्यु सरीखा दिखाई पड़ रहा है। बैक ग्राउंड में चल रही सैड धुन माहौल को करुणामई बना रही है। घर में मौजूद सौ डेढ़ सौ लोग दुख प्रकट करने को पिले हुए हैं। कुछ ढोंगी हैं तो कुछ वास्तव में दुख प्रदर्शित करने को आए हुए हैं। तभी फुर्र फुर्र फरारी वाली मैडम घर में प्रविष्ट होकर माहौल का जायज़ा लेती है। देख रही हैं। कि कौन-कौन किस-किस विधि से दुखी दिखने की कोशिश कर रहा है। मैडम को पता नहीं क्यों इस अपने आप को दुखी जैसा प्रकट करना किसी चुनौती जैसा लग रहा है। शायद वो लेट पहुंची थीं इसलिए। &lt;br /&gt;                   लगभग पंद्रह मिनट तक माहौल का जायज़ा लेने के बाद। घड़ियाल (एलीट मैडम) की आंखों में आंसू दिखाई देने लगे। करुणा का सागर आंखों से छलक रहा था। और लोग बरबस ही चूतिया बने जा रहे थे। मैडम अपने मकसद में कामयाब हो चली थीं। और अब जो आंसू दिखाई दे रहे थे। वो दुख के नहीं बल्कि खुशी के थे। क्योंकि वो कई लोगों से आगे निकल चुकी थीं। दुख प्रदर्शन के मामले में। दुख की बेला में खुशी के आंसू। नज़ारा कैसा होगा। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। इस बीच जब वो अपने रेशमी रुमाल से चेहरे पर पोछा लगातीं। तो इस बात का भी ध्यान रखा जाता कि उनके गालों की झुर्रियां दिखाई न दें। यानि चेहरे पर रुमाल रुई के किसी फाय की तरह इस्तेमाल में लाया जा रहा था। &lt;br /&gt;                       कई लोग अब एलीट मैडम के चेहरे पर तनाव देखकर उनसे मिलने आने लगे थे। सभी को पता था कि मैडम रसूख युक्त हैं। इसलिए ज्यादातर लोग उनसे इसी लिए मिल रहे थे क्योंकि मैडम कई संगठनों की मालकिन थीं। और इस खास मौके पर मेल मिलाप भावी जुगाड़वाद में तब्दील हो सकता था। कई लोग अब उस परिवार का दुख छोड़ मैडम के व्यक्तिगत दुख में शरीक हो चले थे। लेकिन कुछ लोग बीच-बीच में ये कहना नहीं भूल रहे थे। बड़े अच्छे इंसान थे। चले गए। अभी उम्र ही क्या थी। हालांकि जिसकी मौत हुई थी। वो 95 साल का था। और बड़ी ही शालीन मौत मरा था। लेकिन फर्जी लोग। फर्जी बातें। फर्जी संवेदनाएं उस दुख भरी महफिल में चलन में आ चुकी थीं। मैडम को मइय्यत में आए एक घंटा हो चुका था। और इन साठ मिनटों में मैडम, ढोंग के सिर्फ तीस आंसू ही गिरा पाईं थीं शायद। इस बात का उन्हें अफसोस भी था। वो चाहती थीं। कि उनके आंसू उस महफिल में दुख की सुनामी का कारण बन जाएं। लेकिन वो ऐसा कर न सकीं। &lt;br /&gt;                        समय बीतता जा रहा था। और मैडम अब ऊब रही थीं। शायद उन्हें कहीं जाना था या किसी का इंतज़ार था। क्योंकि वो बार-बार अपनी नाजुक कलाइयों पर बंधी घड़ी को घूर रही थीं। निसंदेह पहली वाली बात ही सही होगी क्योंकि मइय्यत में और दुखियारों का इंतज़ार करना उनकी बर्दाश्त से बाहर की बात थी। यानि अब उन्हें कहीं तिड़ी होना था। शायद किसी पार्टी में। या फिर कहीं और। यहां भी पहली वाली बात ही सही निकली । क्योंकि अब वास्तव उन्हे कोई पेज थ्री वाली पार्टी भी निपटानी थी। लिहाज़ा वो सबसे और सब उनसे विदा लेकर निकल लिए। अपने-अपने गंतव्य की ओर। फुर्र-फुर्र फरारी अब सीधे उनके निजी सौंदर्यालय (ब्यूटी पार्लर) की ओर रुख कर चुकी थी। ये ब्यूटी पार्लर मैडम के इमरजेंसी पीरियड में काम आता था। जैसे जब वो अपने घर से बन संवर कर न निकल सकीं हों। तो वो रास्ते में अपने निजी सौंदर्यालय में जाकर बन ठन लें। मैडम की उम्र जरुर पचास की थी। लेकिन सौंदर्य प्रसाधनों के गजब के इस्तेमाल ने उनकी रुप रेखा को आज भी जीवित रखा था। सही मायने में तो ये कहें कि जितना सुंदर वो मेकअप के बाद खुद को समझतीं थी। वास्तव में उतनी थीं नहीं। क्योंकि उम्र के पड़ाव पर कोई मेकअप काम नहीं आता। आखिर कब तक छिपातीं अपनी ढलती उम्र को। वो तो भला हो आधुनिक सौंदर्य प्रसाधनों का जो इस पंच लाइन के साथ बाज़ार में उतरती हैं। कि ‘आप की त्वचा से तो आप की उम्र का पता ही नहीं चलता’। लेकिन मैडम की त्वचा का पता जैसे तैसे चल ही जाता था। फिर भले ही वो कितना रंग रोगन ही क्यों न कर लें। &lt;br /&gt;     अब मेकअप वाली भठियारन सज धज कर पेज थ्री वाली पार्टी की ओर रुख कर चुकीं थी। यहां मैडम ने उन सारे सौंदर्य प्रसाधनों  इस्तेमाल किया था। जिनका इस्तेमाल उन्होंने मइय्यत वाली कथित पार्टी में नहीं किया था। पचास की उम्र में ताजे मेकअप ने उन्हें पैंतिस का बना दिया था। इससे वो खुश भी थीं। उनकी खुशी इस बात से पता चलती थी। कि गाड़ी में बैठकर महज दो किलोमीटर की दूरी में ही वो बीस बार आइना निहार चुकीं थी। बेशर्म आइना अगर कुछ बोल सकता तो उन्हें उनकी औकात बता ही देता। &lt;br /&gt;   मैडम पार्टी में पहुंच चुकी हैं। पार्टी में बिल्डर, फिल्मकार, कलाकार, पत्रकार इत्यादि इत्यादि मौजूद हैं। सभी बड़े प्रोजेक्ट की चर्चाओं में मशगूल हैं। कई लोग मइय्यत से ही बगैर किसी चेंज के पार्टी में पहुंचे थे। लेकिन मैडम फुल चेंज थीं। उनका बदला बदला सा नूर नज़र आता था। बालों में खिजाब, मुंह पर मेकअप का लेप नज़र आता था। सभी की नजरें अकस्मात् ही मैडम पर टिक जाती हैं। और पुन: उन्हें ठीक वैसे ही घेर लिया जाता है। जैसे कई सारे कुत्ते कातिक के महीने में एक कुतिया को घेर लेते हैं। और उस अकेली कुतिया पर अपना अधिकार जताने की कोशिश करते हैं। यहां भी मैडम अपनी टीआरपी से खुश थीं। उनके हम उम्र कई लोग उन पर लाइन मारने को उतारु थे। लाइन मारने की सभी की अलग-अलग अदा थी। &lt;br /&gt;       इस पार्टी में जो बात चर्चा का विषय थी। वो ये थी कि हाल ही में मैडम ने एक गैर जिम्मेदार संगठन खोला है। मेरा मतलब गैर सरकारी संगठन से है। कई लोगों को साथ लेकर इस संगठन की स्थापना की गई है। लिखित रुप में इस संगठन का मकसद गरीब और बेसहारा लोगों की मदद करना है। लेकिन किताबी बातें किताबी ही होती हैं। संगठन का असल मकसद लोगों का असामाजिक कार्यों से ध्यान बंटा कर उस गैर सरकारी संगठन की ओर ध्यान केंद्रित करना था। जो गैर जिम्मेदार था। मैडम के दूसरे संगठनों में कार्यरत सभी मजदूर इस बात को जानते थे। लेकिन चुप रहते थे। नौकरी चली जाने का डर था। &lt;br /&gt;                                                                                          अपवाद स्वरुप किसी बड़े लेखक ने ठीक ही कहा था। कि औरत के हाथ में सत्ता और शासन का जाना वैसे ही खतरनाक होता है। जैसे जंगल में किसी शेर के सामने बकरी को खड़ा कर देना। बकरी की शामत आनी ही है। ठीक वैसा ही डर मैडम के मजदूरों के मन में भी था। बहरहाल पार्टी में गैर जिम्मेदार संगठन को लेकर चर्चा जारी थी। मैडम उपलब्धियों को उंगली पर गिनाए जा रहीं थीं। सच भी यही था कि उनकी उपलब्धियां उंगलियों पर ही गनाई जा सकतीं थी। लेकिन उनके चुतियापे भरे कारनामों के लिए हजार पेज की डायरी भी कम पड़ेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-5083422643909472829?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/5083422643909472829/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=5083422643909472829' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5083422643909472829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5083422643909472829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/03/blog-post_18.html' title='मइय्यत से पेज थ्री तक ‘मेकअप वाली भठियारन’'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-5233817023890333402</id><published>2010-03-08T09:37:00.000-08:00</published><updated>2010-03-08T09:38:31.003-08:00</updated><title type='text'>वैचारिक चुतियापा, और “मन भठिया चित्त भुसौरी”</title><content type='html'>वो विचारशील भी थे। और चूतिया भी। कहने में भी उतना ही अंतर था। जितना करने में। कभी किसी की सुनी नहीं। हमेशा अपना हाथ जगन्नाथ समझा। फिर भले ही हाथ में कोढ़ ही क्यों न हो गया हो। वो जो कर रहे हैं, जिन हाथों से कर रहे हैं, बस कर रहे हैं। किसी से कोई मतलब नहीं। गर्दभ राज की तरह उनकी ढेंचू-ढेंचू लोग सुनें। इसलिए वो हमेशा ही कुछ न कुछ ऐसा ही करते थे। जो जनमानस के विरुद्ध हो। यानि उनके अनुकूल हों।&lt;br /&gt;ये मुक्तसर सा कैरीकुलम है दक्ष कुमार का। दक्षप्रजापति का नहीं। जैसा कि इनके नाम से ही इंगित होता है कि ये हर मामले में बड़े ही प्रवीण होंगे, वास्तव में प्रवीण हैं भी। इनके नाम के मुताबिक ही इनके काम बड़ी ही दक्षता के साथ निपटाए जाते हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी दक्ष झुमरी तलैया के निवासी हैं। और रेडियो नहीं सुनने के लिए भी जाने जाते हैं। संज्ञान में कि झुमरी तलैया से काफी रेडियो श्रोता पैदा हुए हैं। और शायद होते भी रहेंगे। लेकिन दक्ष कुमार को जो पसंद था वो कुछ इस प्रकार है। बतौर ऑलराउंडर वो हर काम करना चाहते हैं। सिवाए किताब पढ़ने के। उनके ज्ञान का शिला लेख महज़ के कंकड़ के जितना ही छोटा है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि किसी की शक्ल देखकर उसके ज्ञान का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता । वैसा ही दक्ष कुमार के साथ भी था। काम के सिलसिले में हमेशा उनके चेहरे पर बारह बजे रहते हैं। और वो सड़कों पर किसी न किसी काम की तलाश में हमेशा फंटियाते रहते है। और सबसे बड़ी बात ये है कि उनका अनुकूलन वहीं से शुरु होता है, जहां से लोगों को उनकी कार्यप्रणाली पर विरोध होता है। ये विरोध कैसे होता है। खुद ही देखिए। &lt;br /&gt;झुमरी तलैया में बत्ती ज्यादातर गुल रहती है। कहीं फेस आता है, तो कहीं नहीं आता। दृश्य कुछ ऐसा बनता है कि आपके घर बिजली नहीं होगी । और बीस मीटर पर बल्ब जलता दिख जाएगा। ऐसी विडंम्बनाओं से दो चार होने का नाम ही है दक्ष कुमार। समस्या जहां से शुरु होती है, वहां दक्ष पाए जाते हैं। और समस्या जहां खत्म होकर फिर शुरु होती है। वहां भी दक्ष पाए जाते हैं। खैर गुल बिजली से घरों को रोशन करने का जिम्मा दक्ष कुमार के ही कंधों पर है। सरकारी मुलाजिम देर से सीढी लेकर आते हैं। लेकिन फुर्तीले दक्ष महज एक रस्सी के माध्यम से किसी बंदर के मानिंद खंबों पर लटक जाते हैं। और इधर की कटिया उधर करते हैं। उधर की कटिया इधर । और एक आवाज़ लगाते हैं। कि देखऊ नंदू भइया का बिजली आई। हां आई गई भइया। इस बीच चार पांच लोगों के घर बिजली चली जाती है। तो दक्ष को खंबे पर चढ़ा देख मुहल्ले वाले गरियाने लगते हैं। ए ग्रेड गालियों के आदी हो चुके दक्ष के लिए ये कोई मुश्किल वक्त नहीं था। कि कोई उन्हें गरिया रहा हो। और ऐसे समय पर जब वे बिजली के खंबे पर बंदर की तरह लटके हों। मर्दमराठा बीवी से गालियां सुनते-सुनते उनके कान मुहल्ले वालों की गालियां सुनने के भी आदी हो चुके थे। और अब उन्हें किसी की गाली का कोई फर्क नहीं पड़ता । चालीसा पार कर चुके दक्ष जिस तार को दिन में लगाते थे। उसी तार को रात में जरुरत पड़ने पर काट भी लिया करते थे। ये उनका निजी विचार होता था। &lt;br /&gt;ऊलजलूलू विचारों के धनी दक्ष के लिए किसी की साइकिल पर हाथ साफ करना और उसे पांच मिनट से पहले ठिकाने तक पहुंचा देना कोई बड़ी बात नहीं थी। मुहल्ले में सफाई का ठेका हो, तो दक्ष आगे । किसी की पिटाई का ठेका हो, तो दक्ष आगे। वाह रे दक्ष। हर काम खुराफाती अंजाम के साथ निपटाना उनकी एक अच्छी आदत है। खुद उनके अनुसार। क्योंकि जब से उन्होंने होश संभाला, तब से कई लोग उनके कष्टकारी कदमों से अपने होश खो बैठे थे।&lt;br /&gt;एक रोज़ की बात है जब मुहल्ले में एक बंदर मर गया थ। उसे ठिकाने लगाने का ज़िम्मा भी उन्हीं के सिर था। यहां कहेंगे कि मन भठिया चित्त भुसौरी । वो ऐसे कि उनका एक मन ये कहता था। कि वो बंदर की अर्थी बाइज्जत शमशान तक पहुंचाएं। दूसरा मन कहता था। कि उस बंदर की लाश पर एकत्रित चंदे को अपने निजी इस्तेमाल में लाकर बंदर को बोरे में बंद कर नदी में प्रवाहित कर दें। निसंदेह दूसरा आईडिया ही उन पर फबता था। और बस ऐसा ही हुआ। बंदर की मइय्यत पर एकत्रित चंदा उनके निजी इस्तेमाल में ही प्रयोग किया गया । मुहल्ले वालों को हवा भी लगी, कि एकत्रित चंदा दक्ष के निजी हितों में इस्तेमाल किया गया । लेकिन सभी दक्ष के विचारों से वाकिफ थे। बोलना मुंह पिटवाने जैसा था। दक्ष भला कैसे बाज आते। दक्ष को ऐसे कामों के लिए मन भठिया नाम दिया जा सकता है। जो भाड़ झोंकने में माहिर कहे जाते हैं। फिर भाड़ में चाहें कोएला हो या न हो।     &lt;br /&gt;उनकी वैचारिक चुतियापे की एक निजी कहानी ये भी है। कि दक्ष ने कुछ न सीखा हो। लेकिन अपनों के ठिए में आग लगाना खूब जानते थे। त्यौहारी मौसम हो, साहलक हो, या उनके घर में निजी फंक्शन, चोरी की आदत को एक विचार मानकर हर जगह हाथ की सफाई दिखा दिया करते हैं। और अगले दिन मुहल्ले में खबर को आग की तरह फैलाकर अपने आप को गौरवशाली महसूस करते हैं। &lt;br /&gt;ये दक्ष कुमार की कुछ विधाएं हैं। जिनके बल पर उन्होंने मुहल्ले में अपने कार्यों का लोहा मनवाया है। निसंदेह उनके इस लोहे में जंग की बहुतायात है। लेकिन वो इस जंग को दूर करने के लिए मिट्टी के तेल का इस्तेमाल कतई नहीं करना चाहेंगे। क्योंकि यही लोहा उनके लिए तरक्की के नए आयाम खोजता है। तो कहिए जय दक्ष कुमार की।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-5233817023890333402?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/5233817023890333402/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=5233817023890333402' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5233817023890333402'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5233817023890333402'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='वैचारिक चुतियापा, और “मन भठिया चित्त भुसौरी”'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-5850913681115359983</id><published>2010-01-30T00:00:00.000-08:00</published><updated>2010-01-30T00:02:20.518-08:00</updated><title type='text'>उनकी आज़ादी का कारण थी संडास-ए-नाजी</title><content type='html'>काम जो बेहतर लगे। वो करो। ऐसा कतई न करो जो दूसरे के मन का हो। या यूं कहें कि जो हमने सोचा वही बेहतर है। अपनी बेहतरी से गद्दारी न करो। दरअसल नाजियों की जिस सेना ने यहूदियों समेत कइयों को अपने अत्याचार का शिकार बनाया । उस सेना को कई यहूदियों ने अपनी बेहतरी साबित करके ठेंगा दिखाया । और इसका अहसास उन्हें कतई नहीं हुआ। कुछ यहूदी उनके बंदी तो थे। लेकिन उनके अत्याचारों से मुक्त थे। ये उनके दिमाग का ही कौशल था। कि हिटलर की सेना उनका तियां पांचा नहीं कर पाई। क्यों और कैसे ये सवाल आपके दिमाग में जरुर आरती कर रहा होगा। &lt;br /&gt;                    तो सुनिए अत्याचारी होने की सुरती खा बैठे हिटलर ने बंदी खाने में सैकड़ों संडासों का गठन कराया था। उन संडासों के लिए कई कर्मचारियों की नियुक्ति की गई थी। ये नियुक्ति गुलाम लोगों में से ही की गई थी। करे कोई भरे कोई की तर्ज पर हिटलर चाहता था। कि उसकी और उसकी सेना की करनी का खामियाजा कोई और ही भुगते। यानि उनके बंदी। उस सामूहिकत संडास में कई बंदियों को अलग-अलग काम सौंपा गया था। जैसे किसी को बटोरने का। किसी को पानी डालने का तो किसी को राख डालने का। उन संडासों को जो आकार दिया गया था। वो प्राचीन कमोड का एहसास कराता था।&lt;br /&gt;        सीमेंट की बैंचों में पिछवाड़े के आकारानुसार होल हुआ करते थे। कई फिट लंबी बैंचों में कई सारे होल। जिन पर कई लोग एक साथ अपना पिछवाड़ा टिका सकते थे। इस बगैर पैसे की नौकरी का शुरुआती दौर ही था। कुछ लोगों को काम में मजा आया तो कुछ को नहीं। जिन लोगों को काम पसंद नहीं आया । उन्होंने नाजियों के संगठन में दूसरी बिन पैसे की नौकरी ढूंढ ली। जैसे बाल साफ करने की । बढ़ई गिरी की । बंदूक के लिए कारतूस तैयार करने की। लेकिन जिन बेचारों ने अपना डिपार्टमेंट चेंज किया। उन्हें दिनभर एक गलती के लिए दस कोड़ों की सजा दी जाती थी। ऐसे में मौज उनकी थी। जो बदबू सूंघ कर भी अपने कार्य को तल्लीनता से किया करते थे। हिटलर उन्हें कोई सजा नहीं देता था। जो संडास साफ किया करते थे। फिर चाहे वो अपने काम को सफाई से करें या नहीं। संडास साफ करते-करते। इस दौरान एक जमादार यूनियन का गठन भी हो गया। जिसका आभास हिटलर के कानों तक नहीं पहुंचा। वो सामूहिक संडास विरोध के विचारों का अड्डा बन गई। क्योंकि जो लोग दूसरे डिपार्टमेंट में नौकरीशुदा थे। उन्हें हिटलर के हंटरों से ही फुरसत नहीं मिल पाती थी। जबकि जो संडास की सफाई करते थे। उनके पास अपने कार्य को निपटाने के बाद काफी समय बच जाता था। &lt;br /&gt;                          क्रांतिकारी विचार ही किसी मुल्क की आज़ादी का सबब बनते हैं। और लाखों का हत्यारा हिटलर इस बात को महसूस नहीं कर पाया। संडास में विचारों का पनपना जारी रहा। और एक समय वो आया जब हिटलर की योजनाओं के खिलाफ जमादार यूनियन एक ताकत बनकर उभरी। उस यूनियन के कई बुद्धिजीवियों ने प्रतिस्पर्धा के एक युग की शुरुआत कर दी। तानाशाही के माहौल में ये कदम वैचारिक आज़ादी से कम न था। ज़रा सोचिए ये विचार उन लोगों के दिमाग में कौंधे । जो पेशे से संडास की सफाई करते थे। उनका काम जरुर गंदा था। लेकिन विचार उनकी ताकत थे। इससे ये बात भी चरितार्थ होती है, कि कमल दलदल में ही खिलता है। खैर हिटलर के उस जेलखाने में अब लोग संडास की नौकरी को ही तरजीह देने लगे। और धीरे धीरे संडास के सफाई कर्मियों की तादात भी अच्छी खासी हो गई। जैसे-जैसे लोगों की तादात बढ़ती गई वैसे-वैसे योजनाओं का विस्तार भी होने लगा। विचारों का विस्तार भी उज्ज्वल भविष्य की ओर ही संकेत करता था। &lt;br /&gt;                       इस बीच हेयर कटिंग डिपार्टमेंट से कई लोगों ने अपना ट्रांसफर घूस को आधार बनाकर संडास डिपार्डमेंट में करा लिया था। ये लोग उन लोगों की चांद मूड़ा करते थे जिन्हें हिटलर मार दिया करता था। हिटलर दूरदर्शी था। वो उन बालों का इस्तेमाल कपड़ों इत्यादि की बुनाई में करवाता था। लेकिन उसकी दूरदर्शिता इतनी नहीं थी। कि इस आधार पर विश्व विजेता बन जाता । अगर ऐसा होता तो महज संडास में पैदा होने वाली क्रांतिकारी योजनाएं। उसकी हार का कारण न बनतीं। और यही हुआ भी। एक रोज़ उस जेल खाने में विद्रोह की ऐसी आग फूटी जिसके सामने हिटलर बेबस हो गया। और संडास-ए-नाजी से निकल आया उनकी आज़ादी का रास्ता। ये संडास में पैदा हुए बेहतर विचारों का ही नतीजा था। ये वो विचार थे जो उनके अपने थे। यानि संडास में काम करो तो सजा नहीं मिलेगी। सजा नहीं मिलेगी। तो वक्त मिलेगा क्रांतिकारी विचारों का। और जब विचारों में क्रांति आएगी तो आज़ादी मिलेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-5850913681115359983?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/5850913681115359983/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=5850913681115359983' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5850913681115359983'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5850913681115359983'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/01/blog-post_30.html' title='उनकी आज़ादी का कारण थी संडास-ए-नाजी'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3945039152225610190</id><published>2010-01-10T00:50:00.000-08:00</published><updated>2010-01-10T00:52:07.674-08:00</updated><title type='text'>हवा हो लिए फौजी बाबा</title><content type='html'>उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िले की बात है। कभी मां फूलमती, बाबा चौकसी नाथ के मंदिर के करीब एक फौजी का निवास हुआ करता था। निवास के नाम पर कोई सरकारी आवास नहीं था। बल्कि एक 16 फुट लंबे और दस फिट चौड़ा कमरा ही उनके नाम आवंटित था। सरकार की रिहायश उनसे मुंह फेरे थी। ये भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि सच यही था कि नाम फौजी होने से कोई फौजी नहीं होता। इस बात का न तो उन्हें मलाल ही था। और न ही मुगालता भी। क्योंकि न तो उन्होंने कभी बंदूक ही उठाई। न समाज के खिलाफ आवाज़। और न ही किसी सीमा की पहरेदारी की। आतंकियों से मुठभेड़ भी उनके लिए दूर की ही कौड़ी थी। लेकिन चौक में आने वाले लोगों के लिए वो फौजी ही थे। इस बात पर वो भी इतराया करते।&lt;br /&gt;                काम नहीं नाम ही सही की तर्ज पर फौजी बाबा को मैने कोई काम नहीं करते देखा। ऐसा नहीं था कि वो किसी सरकारी बाबू की तरह काम नहीं करना चाहते थे। असमर्थ थे बेचारे। शारीरिक मजबूरी कहें । या बूढ़ी हो चुकी हड्डियों में कैल्सियम की कमी । जो उनकी शारीरिक अक्षमता उनके कर्मशील व्यक्तित्व पर हावी होती रही। मैं लगभग तीस बसंत देखने वाला हूं। चूंकि मैं बचपन से लेकर और युवावस्था तक मोहल्ला चौकसी में ही भड़ैंती फाने था। इसलिए फौजी बाबा के बारे में अच्छा खासा शोध कर चुका था।&lt;br /&gt;                     विश्व पटल पर फौजियों की तस्वीर लड़ाकों के साथ-साथ, खाने पीने की रही है। लेकिन फौजी बाबा को न मदिरा का शौक। न सिगरेट का । न गुटखे का । शौक था तो बस, संगीत और खाने का । छप्पन प्रकार के भोगों के लिए खास लालायित रहते थे फौजी बाबा। ऐसा नहीं था, कि उनके सोलह बाई दस के दड़बे में एक सुंदर किचन था। जिसमें वो अपने शौक पूरे कर सकते। उनके लिए तो लोगों की व्यवस्था ही रसोई थी। दिन भर कमरे के सामने वाले चबूतरे पर बैठकर वो लोगों का गीत-संगीत से मनोरंजन किया करते । और जब उदर छुदा लगती, तो जहांपना लोगों को एक आदेश जारी किया करते । ये आदेश भोजन की अभिलाषा में होता। कुछ लोग तो उनके आदेश आने से पहले ही नित नए व्यंजन मौका-ए-वारदात पर पहुंचा देते । तो कुछ उनके आदेश का इंतज़ार किया करते। और ऐसे ही रोज़ाना बाबा के सामने दस तरीके के पकवानों की थाली होती। चूंकि उनकी उम्र, उनकी उदर छुदा पर हावी थी। इसलिए वो उन दस तरीके के पकवानों से अच्छे माल का चुनाव भी करते थे। चुनाव का तरीका बेहद आसान था। बारी बारी से सारे पकवानों का जायजा नाक के माध्यम और जीभ के अग्र भाग से लिया जाता। जो पसंद आया वो साइड में, और जो न पसंद आया वो भी साइड में। ये सब उनकी दिनचर्या का ही हिस्सा था। &lt;br /&gt;                     शाम के वक्त बाबा के लिए दड़बे से बाहर निकलने का होता। जैसा कि सभी जानते हैं, कि मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। वैसे ही लोग ये भी जानते थे। कि फौजी बाबा दिहाड़ी मजदूरी पर तय किए गए रिक्शे के माध्यम से चौक क्षेत्र की सर्राफा मार्केट जाने की तैयारी में हैं। रिक्शा इसलिए किया जाता था। क्योंकि टांगें काफी सालों पहले से ही जवाब दे चुकी थीं। रही बात सर्राफा बाज़ार से उनके लगाव की । तो कुछ बड़े व्यापारियों दुकाने ही उनका अड्डा थी। जहां वो गप्पें लड़ाया करते थे। अपनों से । और जो अपने नहीं थे उनसे भी। आते जाते लोगों से पैसे का एकतरफा विनिमय करना भी उनकी आदत का ही एक हिस्सा था। सबको पता था। कि फौजी बाबा एक समय के धनाड्य हुआ करते थे। लेकिन समय के बदलते स्वरुप के साथ ही उनका पैसा भी तेल लेने चला गया। वो कंगाली में, बदहाली में ज़िंदगी गुजारने को मजबूर थे। हालांकि मांगने की आदत ने उनका खूंट इतना तो गरम कर ही दिया था। कि वो अपना खर्च भर चला सकते थे।&lt;br /&gt;               अपने आदेश और आदतों की वजह से फौजी बाबा को चौक से लेकर घंटाघर तक काफी रसूखदार लोग जानते थे। उनका सम्मान करते थे। और कभी भी उनकी किसी भी फरमाइश को मना नहीं किया जाता था। मना करते तो उनकी सुनते ! उनकी आदतों में एक और आदत भी थी। मंदिर पर मिलने वाले प्रसाद को इकट्ठा करने की। खास कर मंगलवार का दिन उनके लिए बेहद मंगलकारी होता। इस दिन उन्हें सब कुछ बिन मांगे ही मिल जाया करता था। खासकर प्रसाद। महिलाएं हों, बच्चे हों, बूढे़ हों, जवान हों, कोई हो । उनके सामने जो आ जाता वो बगैर झिझक, एक आदेश के माध्यम से प्रसाद मांग लिया करते। उनका ये रुप देखकर ऐसा लगता था। कि अगर ओबामा भी आ जाए तो वो उन्हें भी डपट कर प्रसाद हासिल कर लें। ये व्यक्तित्व बताता था कि जवानी के दिनों में उन्होंने किसी की नहीं सुनी होगी। &lt;br /&gt;                            उम्र बीत चुकी थी। लेकिन रंग नहीं ढला था। उजली काया उस समय भी उजली ही थी। ये अनुमान लगाना कठिन न था। कि जवानी के दिनों में बाबा मैदा की भेंड़ रहे होंगे। वो अपने शरीर को ज्यादा संजो नहीं सके । लेकिन उनका रंग चीख चीख कर इस बात की गवाही देता था। कि उन्हें कभी फेयर एंड लवली की जरुरत नहीं पढ़ी। बढ़ी हुई दाढ़ी जब यदा कदा शहीद हो जाती । तो उनके चेहरे का कंट्रास्ट और ब्राइटनेस देखते ही बनती थी। &lt;br /&gt;              मंदिर में आरती के घंटे बजने के बाद ही उनका सोने का समय होता। वो बगैर भगवान को सुलाए कभी नहीं सोए। उनका सोने का वक्त तकरीबन दस से साढ़े दस बजे का रहता होगा। उनके दड़बे में पढ़ी चारपाई में एक होल हुआ करता था। जो हुआ नहीं था। बल्कि किया गया था। किसी खास प्रायोजन के लिए। ये प्रायोजन था जब कभी हाजमें की मुसीबत हो, और हाजमें का हूटर बजने वाला हो। तो बाबा को कहीं जाने की जरुरत न पढ़े। उस होल को आधुनिक कमोड का आकार दे दिया गया था। लेकिन निसंदेह ये बाबा की मजबूरी थी। उनकी काहिलता नहीं। क्योंकि उनके साथ कोई अपना नहीं था। जो कभी अपने थे। उनके रिश्ते अब भारत और पाकिस्तान सरीखे थे। &lt;br /&gt;         लेकिन एक बात का मुझे हमेशा अफसोस रहेगा। मेरा घर उनके दड़बे से चंद कदम की दूरी पर था। लेकिन जब वो सदा के लिए हवा हुए, तो मुझे हवा तक न लगी। पता तब चला जब वे शमशान पहुंच चुके थे। किसी ने बताया कि अभी-अभी जिसका राम नाम सत्य हुआ है। वो और कोई नहीं मुहल्ले के फौजी बाबा थे। जो अब नहीं रहे। अब जहां भी रहें। अच्छे रहें। स्वस्थ रहें। चंगे रहें। भले रहें। लेकिन ऐसे न रहें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3945039152225610190?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3945039152225610190/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3945039152225610190' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3945039152225610190'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3945039152225610190'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='हवा हो लिए फौजी बाबा'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-5842992118422740924</id><published>2009-12-27T02:26:00.001-08:00</published><updated>2009-12-27T02:26:57.536-08:00</updated><title type='text'>ठोकर लाएगी रंगत</title><content type='html'>मुझे उम्मीद है।&lt;br /&gt;एक रोज़,&lt;br /&gt;ठोकर लाएगी रंगत।&lt;br /&gt;उसका रंग उस दिन, &lt;br /&gt;उस खूं सा लाल नहीं होगा।&lt;br /&gt;जो खूं जमा हुआ है, &lt;br /&gt;कुछ ठोकरों की बदौलत।&lt;br /&gt;गिरेबां में झांककर देखूंगा उस दिन, &lt;br /&gt;कि ठोकर क्यों लगी थी।&lt;br /&gt;लेकिन अब तक, &lt;br /&gt;हर ठोकर जवाब सवाल पूछती है मुझसे? &lt;br /&gt;कि क्यों मुझे हर बार,&lt;br /&gt;इसी पैर में लगना था।&lt;br /&gt;मैं उस सवाल की उलझन में इतना उलझा जाता हूं।&lt;br /&gt;कि अक्सर खुद सवाल करता हूं?&lt;br /&gt;कि क्यों मेरा पैर पत्थर से टकराता है?&lt;br /&gt;मैं कोई राम तो नहीं!&lt;br /&gt;जो अहिल्या मेरी ठोकर से आएगी।&lt;br /&gt;लेकिन उम्मीद है मुझे।&lt;br /&gt;हर ठोकर रंग लाएगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-5842992118422740924?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/5842992118422740924/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=5842992118422740924' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5842992118422740924'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5842992118422740924'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/12/blog-post_27.html' title='ठोकर लाएगी रंगत'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-5860071570059046495</id><published>2009-12-05T07:49:00.000-08:00</published><updated>2009-12-07T09:04:41.257-08:00</updated><title type='text'>गुटखा नॉट अलाउड</title><content type='html'>हाल ही की बात है हमारे खबरनबीसों के दफ्तर में गुटखा, पान, सुपारी खाने पर पाबंदी लगा दी गई है। यानि कार्यालय परिसर में जो गुटखा खाता दिखाई दिया उस पर औकातानुसार कार्यवाही की जाएगी। दफ्तर में अंदर से लेकर बाहर तक इस हिदायती फरमान की चिट्ठियों को चिपकाया गया है। लेकिन इतिहास गवाही देता है कि जब-जब क्रांतिकारियों के खिलाफ तुगलगी फरमान जारी किए गए । वो और आगबबूला हो गए। एक बार फिर वैसा ही हुआ और किसी ने दफ्तरी प्रशासन को ललकार लगाते हुए उस नोटिस पर ही गुटखे की पीक से फाइन आर्ट बना दी ।&lt;br /&gt;            ये बताना जरुरी है कि ये फरमान आखिर क्यों दफ्तर में जारी किया गया। दरअसल हमारे ऑफिस में गुटखोरों की खासी तादात है । ज्यादातर के मुंह में गुटखा दबा ही रहता है। अगर इस दौरान कोई उनसे बात करता है तो ये उनके दिन का सबसे बुरा वक्त होता है। क्योंकि बात करने के लिए या तो उन्हें गुटखा थूकना पड़ता है। या फिर लीलना पड़ता है। और अगर थूकना पड़ता तो जाते कहां? या तो दफ्तर के शौचालय में या किसी कोने को शिकार बनाना पड़ता । शौचालय तो बेचारा वैसे ही लोगों की शूशू का शिकार बनता है अब उस पर पीक मार- मार कर लोगों ने और दुर्दशा कर दी थी। रही बात कोने-छातर की तो उस पर लोगों की कुछ ज्यादा ही कृपा रहती थी। खास कर वहां पर जहां सीढ़ी से चढ़ते हुए न्यूज़ रुम में दाखिल हुआ जाता है। उस कोने पर तो जैसे लोगों को प्राइमरी अधिकार मिला हुआ था कि न्यूज़ रुम में घुसने से पहले यहां पर एक बार पिच्च-पिच्च जरुर करें। पीक के कीर्तिमान स्थापित करता दीवार का वो कोना गुटखोरों का शिकार बन चुका था। पीक की दिन-ब-दिन बढ़ती परतें तमाम पेंट कंपनियों को मुंह चिढ़ाती सी नज़र आती थी। क्योंकि अब वहां से पेंट नदारद था। और रंगीन मिजाज गुटखा दीवार के उस हिस्से को अपने आगोश में ले चुका था। गुटखे की आड़ में छिपती दीवार अब दफ्तरी प्रशासन के लिए भी चुनौती बन चुकी थी। लिहाज़ा गुटखा नॉट अलाउट इन ऑफिस प्रीमिसेस नाम का बोर्ड जरुरी हो चला था।&lt;br /&gt;          ऑफिस का ये फरमान तमाम गुटखोरों के लिए एक बड़ी परेशानी का सबब था। क्योंकि कई लोगों को दिल और दिमाग की बत्ती इसी के बल पर जलती है। अब भला जब दिल और दिमाग में ही अंधेरा होगा तो काम क्या होगा खाक ! चूंकि मैं गुटखा नहीं खाता इसलिए इसका आनंद भी नहीं बखान कर सकता । इसलिए इस विषय पर शोध हेतु मैने कुछ लोगों की जाने-अनजाने बाइट ली। तो लोगों का कुछ यूं कहना था।&lt;br /&gt;        सबसे पहले पीसीआर में ऑनलाइन ग्राफिक्स डिपार्टमेंट ले चलते हैं। जहां मौजूद एक किशोर से मैने बात की तो उनका कहना था। कि जब तक ससुरा ई (गुटखा) मूं में न भरा हो सब ऑनलाइन ऑफलाइन नज़र आता है। दिल ही नहीं लगता है भाई। दिन पूरा गुम सुम सा बीतता है। हमारा तो सुसरा जीना ही हराम हो गया। एकाग्रता ही नहीं बनती है क्या करें ? पीसीआर के किशोर से बात करने के बाद रुख करते हैं न्यूज़ रुम का, जहां गुटखोरों का असली जमावड़ा लगता है। ट्रेनी से लेकर अधिकारी वर्ग सभी गुटखे के बेहद शौकीन हैं। लोगों की कॉपी पर कैंची चलाने वाले एक एडिटर महोदय का इस मामले में दर्शन ही अलग नज़र आया। हनुमान सरीखा मुंह लिए बैठे एडिटर महोदय अपनी बाइट देने से पहले दो तीन बार सोचते नज़र आए कि बोला जाए या नहीं । हालांकि बाइट ऑफ द कैमरा थी इसलिए कोई दिक्कत भी नहीं थी। लेकिन गुटखा जो मुंह में था। और थूकने कहीं जा नहीं सकते। खैर सारी खुशी लीलते हुए बोले भई ये जो गुटखा है न कमाल का आइटम है। दो रुपए में जन्नत की सैर से कम नहीं। जब गुटखा हो मुंह में तो कमाल का हाथ चलता है कीबोर्ड पर। गुटखा खाने में चौदह साल का अनुभव रखे एक जनाब(जो सीएनबीसी आवाज़ से जुड़े हैं) भी इसके बगैर सबकुछ अधूरा सा महसूस करते हैं। महोदय अर्थजगत से जुड़ी खबरें देखते हैं। और गुटखे की करामात से सेंसेक्स को उठाते गिराते है। हालांकि बाज़ार दो दिन बंद रहता है। लेकिन इनका मुंह गुटखा खाने के लिए सातों दिन खुला रहता है।&lt;br /&gt;       अब मिलवाते हैं आजाद न्यूज़ के अनोखे राम ड्रैगन शर्मा से । अपने जीवन का ज्यादातर समय इन्होंने गुटखा खाने और पीकने में व्यतीत किया है । इसलिए इनका अनुभव मेरे लिए मायने रखता है। वैसे तो ये बेहद गुस्सैल प्रवर्ति के हैं जैसा कि नाम से पता लग रहा होगा। लेकिन जब ये गुटखा खाते हैं तो काफी घंटों तक न्यूज़ रुम में शांति होती है। इस दौरान इन्हें किसी का खलल पसंद नहीं। इन्होंने भी ऊपर वालों की ही तरह गुटखे की अद्भुत महिमा का विशद वर्णन किया। लेकिन इन्होंने एक ऐसे व्यक्ति के बारे में भी बताया, जो गुटखा खाने के मामले में लौहपुरुष है। ड्रैगन के मुताबिक अमुक शख्स ने कभी गुटखा थूका ही नहीं। हाजमा इतना दुरुस्त की कि बगैर हाजमोला ईंट तक चबा जाएं। शर्मा जी ने मुझे नाम तो बताया लेकिन ये भी हिदायत दी कि इनके नाम का इश्तेहार न किया जाए। यही कारण रहा कि मैने इन महान विभूति के नाम का ज़िक्र नहीं किया। &lt;br /&gt;    खैर विदाउट गुटखा लोग हलकान हैं। लेकिन मैं पहले ही कह चुका हूं गुटखे की क्रांति लाने वालों को कब तक रोकोगे। मौका लगते ही वो आंदोलन कर देंगे। बंदिश-ए- थूथ कब तक चलेगी। और वैसे भी लोगों ने सुस्त प्रशासन की तरह पुराने ढर्रे पर चलना शुरु कर दिया है। अब दफ्तरी प्रशासन के लिए एक और चुनौती है। छुपे हुए आंदोलन कारियों से निपटने की ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-5860071570059046495?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/5860071570059046495/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=5860071570059046495' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5860071570059046495'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5860071570059046495'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='गुटखा नॉट अलाउड'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-9044370777433800203</id><published>2009-11-14T01:23:00.000-08:00</published><updated>2009-11-14T01:26:36.328-08:00</updated><title type='text'>बुढ़ापे की संवेदना</title><content type='html'>बूढ़ा होता है हर कोई&lt;br /&gt;ढलती हुई उम्र के साथ&lt;br /&gt;ऐसा बूढ़ा न हो कोई &lt;br /&gt;उस बूढ़े, बुढ़िया के जैसा&lt;br /&gt;न खाना है &lt;br /&gt;न दाना है &lt;br /&gt;साथ नहीं है अपनों का &lt;br /&gt;एक सहारा बस बाकी है&lt;br /&gt;लाठी और अकेलेपन का &lt;br /&gt;सावन भी अब बूढ़ा सा है&lt;br /&gt;पतझड़ से सारे मौसम हैं&lt;br /&gt;एक अकेली कोंपल को &lt;br /&gt;बस तरसे विचलित सा उनका मन है&lt;br /&gt;बचपन को पाल बुढ़ापे में &lt;br /&gt;सब छोड़ चले अब उनको&lt;br /&gt;उम्मीदों की बुझती लौ &lt;br /&gt;तरस रहे तिनके-तिनके को &lt;br /&gt;तन की सिलवट&lt;br /&gt;सिमट रही है &lt;br /&gt;कलयुग के उजियारे में&lt;br /&gt;जीवन अपना काट रहे बस&lt;br /&gt;थोड़े से अंधियारे में&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-9044370777433800203?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/9044370777433800203/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=9044370777433800203' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/9044370777433800203'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/9044370777433800203'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/11/blog-post_14.html' title='बुढ़ापे की संवेदना'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-9182533762734080195</id><published>2009-11-09T23:32:00.000-08:00</published><updated>2009-11-10T23:28:48.721-08:00</updated><title type='text'>कचरा-कचरा “यम की बहना”</title><content type='html'>ज़रा विचारिए कि जब हमारे सामने यमराज की खौफजदा कल्पना होती है। तो चित्र में भैंसे पर सवार एक बेहद ही बेडौल और खाए-पिए खानदान से ताल्लुक रखने वाले मनुष्य की छवि अकस्मात ही सामने आ जाती है। हाथ में कांटेदार गदा और अपने मन में मौत सरीखा भय लिए यमराज की ये तस्वीर बेहद भयावह है। लेकिन इस बार जब नोएडा से कालिंदी कुंज होते हुए जब मैं दिल्ली जा रहा था। तो मेरी मुलाकात यमराज की बहना से हो गई। फेस-टू-फेस तो नहीं, लेकिन कल्पनाओं के घोड़े दौड़े तो एक छवि उनकी भी मैने उकेर ही ली। इन बहना रानी का स्कूल का नाम उनके पिताजी ने यमुना रखा था । बड़े ही लाड़ और प्यार से पाला गया था यमुना जी को। पश्चिमी हिमालय पर एक फ्लैट भी यमुना जी को दिया गया। जहां से निकल कर निश्चित मार्गों से होकर वे कहीं भी सैरसपाटा कर सकती है। अब यमुना जी की तो चांदी ही चांदी थी। और हां एक बात और समझाई गई थी यमुना जी को, कि आपकी दो सहेलियां गंगा और सरस्वती आपको इलाहाबाद में मिलेंगी। जिनसे मिलकर आपका नाम भारत में बड़ी श्रद्धा से लिया जाएगा। अपने पिता की असीम अनुकंपा से यमुना रानी निकल पड़ीं सैर सपाटे को । शायद ऐसा ही सफरनाम रहा होगा अपनी यम की बहना का।&lt;br /&gt;पुराणों की मानें तो यमुना जी को बेहद पवित्र और कई संस्कृतियों से सराबोर माना गया। लेकिन यहां तो मैने यमुना का उस दिन दूसरा ही चेहरा देखा। अब तक तो लोगों के मुंह से ही सुना था। कि अपने अंदर जीवन दायिनी जल समेटे यमुना अब मैली हो चुकी है। और उस दिन देख भी लिया। कालिंदी कुंज के करीब से बहने वाली यमुना  फैक्ट्रियों से निकले रसायन की बदौलत साबुन सरीखी झाग से नहा रही थी। वो झाग इतनी सफेद थी कि मुझे अलास्का की बर्फ याद आ गई । सोचा कि वाह यमुना जी के तो वारे-न्यारे हो गए। बड़ा ही सुंदर स्नान कर रही हैं मैडम। और कमाल की बात तो ये यमुना को भी नहाने की जरुरत पड़ गई। दरअसल वो अलास्का की बर्फ मेरा भ्रम थी। मेरे साथ में ही मौजूद जब मेरे एक मित्र कलीम खान जी ने मुझे प्रदूषण की परिभाषा समझाई तो समझ आया, कि ये डव की झाग नहीं, बल्कि फैक्ट्रियो से निकला वो रसायन है, जो यमुना के जल को जहरीला बना रहा। खैर अब भ्रम का टाटी उड़ चुकी थी। और हकीकत सामने थी। यमुना जी का जल जलजला बन चुका था। ऐसा लग रहा था मानों हजारों मछलियों की मौत का टेण्डर यमुना जी ने ले लिया हो। यमुना जी का पुश्तैनी धंधा एक बार फिर फलीभूत होता जान पड़ रहा था। खैर कसैली गंध लिए यम की बहना का रंग भी उस झाग के नीचे अब काला पड़ चुका था। जिस सूर्य पुत्री यमुना की कल्पना मैं सुंदर कर बैठा था। वो निहायत ही बदसूरत हो चुकी है। अगर मैं कुछ कर सकता तो शायद फेयर-एंड-लवली मुहैया करा सकता था। जिससे वो सात दिनों में ही निखर जातीं। लेकिन फेयर-एंड-लवली से काम न होने वाला था। क्योंकि हजारों कुंटल के मेरे पास तो पैसे भी नहीं थे।                            बेचारी कचरा-कचरा “यम की बहना” का वो बेनूर चेहरा वाकई आघात पहुंचा रहा था।&lt;br /&gt;जिसके शरीर पर गहनों की कल्पना मैने की थी। उसका शरीर फैक्ट्रियों और मिलों की गंदगी, अधजली लाशों, मरे हुए जानवरों, की गंदगी से सराबोर था। वाकई यम की बहना दुर्दशा के दौर से गुजर रही है। मेरे बस में उसका कोई उपचार नहीं था। शायद सरकार के पास हो। अगर है तो जल्द कुछ करे। वरना ये यम की बहना जीते जी कालकल्वित हो जाएगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-9182533762734080195?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/9182533762734080195/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=9182533762734080195' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/9182533762734080195'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/9182533762734080195'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/11/blog-post_09.html' title='कचरा-कचरा “यम की बहना”'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-2112285514991949767</id><published>2009-11-03T02:05:00.000-08:00</published><updated>2009-11-03T02:06:13.479-08:00</updated><title type='text'>घासीराम का आतंक</title><content type='html'>(बीबीसी हिंदी डॉट काम की खबर से प्रेरित होकर लिखा गया है, जिसमें ये कहा गया था कि हाल ही में एक भारतीय टिड्डा ब्रिटेन जा पहुंचा है।)&lt;br /&gt;यूं तो हमारे एक मित्रवर हैं जिनका राशि का नाम घासीराम है। लेकिन न तो वो आतंकी हैं। और न ही घासखोर। उनके अंदर कोई भी ऐसी आदत नहीं कि वो दिन में भोजन करते हों, और रात को समाज की नज़रों से बचकर घास ही चरते हों। लेकिन फिर भी वो घासीराम है। हालांकि उनका शुभनाम कुछ और ही है। खैर यहां हम उनकी किसी कला का वर्णन नहीं कर रहे हम तो आज आपको एक नए घासीराम से मिलवाना चाहते हैं। जो घासखोर भी हैं। और एक प्रशिक्षित आतंकी भी। विलायती लोगों की भाषा में उन्हे ग्रासहोपर कहा जाता है तो हिंदी में उसे घासखोर की संज्ञा दी जा सकती है। कमाल के ढांचाबदर ये घासखोर अपने रंगीन बदन के लिए भी जाने जाते हैं। सतरंगी छटाओं से लैस इनके बदन हर एक पार्ट खुदा की नियामत से बड़े ही अजीबो-गरीब ढंग से सजाया गया है। इनको देखकर ऐसा लगता है कि बड़ा ही गुमान होगा इन्हें अपनी इस विस्मय काया पर। और जब ये घासखोर महाराज उड़ान पर निकलते हैं तो ऐसा लगता है कि कोई अमेरिकी ड्रोन विमान शिकार पर निकला हो। लेकिन इनके लिए एक बात मैने बहुत पहले पढ़ी थी The Ant and the Grasshopper नामक अध्याय में। पाठ इनके चरित्र को बखूबी बयां करता था। कि एडम और ईव के समय की पैदाइश ये घासखोर निहायत ही हरामखोर प्रवर्ति के हैं। पाठ में हमें बताया गया था कि ये घासखोर टिड्डे के नाम से जाना जाता है। लेकिन यहां इनका एक और चरित्र भी आज मैंने खोजा है। वो है बगैर वीसा और पासपोर्ट के विदेश यात्रा करने का। यानि ये घासखोर कबूतरबाजी में भी माहिर हैं। फर्जीवाड़ा करके ये विदेशों की सैर भी कर लेते हैं। हाल ही में ये भारत से चलकर ब्रिटेन के दौरे पर हैं। राजनेताओं की तरह इनके इस गुपचुप दौरे को लेकर ब्रिटेन का खाद्य एवं पर्यावरण संस्थान यानी फ़ेरा हलकान है। सबसे पहले इसी संस्था को पता चला कि इनके देश में कोई घासीराम नाम का घुसपैठिया घुस आया है। न तो उसके पास वीसा है और न ही पासपोर्ट। ब्रिटेन की भी चिंता वाजिव है, क्योंकि घासीराम घास खाने में पारंगत हैं। इन्हें हरियाली कतई बर्दाश्त नहीं। इस मामले में इनके पेटूपन का भी कोई सानी नहीं । जहां इन्हें अपने मन का खाना दिखता है। वहीं इनका आतंक शुरु हो जाता है। और पल भर में ये हजारों एकड़ फसल अपने मासूम से उदर में पचा लेते हैं। नियति का खेल तो देखिए हमारी नुमाइंदगी करने वाले कुछ लोग इन्हीं से प्रेरित जान पड़ते हैं। और कई एकड़ घास घोटाला उनके खाते में चढ़ चुका है। टिड्डा एक कीट है लेकिन वो एक इंसान हैं। लेकिन मैने कई बार सुना है कि इंसान के जीवन में कोई भी उसका आदर्श बन सकता है। पर पहली बार ये सुना है कि कोई इंसान किसी कीट को अपना आदर्श मानता हो। खैर टिड्डे की इसी महामाया ने इसको तालिबानी लड़ाकों जैसा बना दिया है। कई बार ये आत्मघाती का काम करते हैं। क्योंकि इनकी ज्यादातर मौत स्वाभाविक नहीं बल्कि अपनी उदर छुदा मिटाने की खातिर होती है। मतलब साफ है ये जान हथेली पर लेकर शिकार को निकलते हैं। भारत से लेकर पाकिस्तान तक घासीराम का आतंक कई बार देखा गया। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि कुछ छोटे देशों की फसल चट कर इन्होंने वहां की अर्थव्यवस्था का सूरत ए हाल ही बिगाड़ दिया। बचपन से ही उड़ान में दक्ष इनकी सेना का हर सिपाही एक कुशल पायलट और कुशल आतंकी है। क्योंकि इनको मारने के सारे प्रयास धरे के धरे रह चुके हैं। और इस बार ये घासखोर ब्रिटेन पहुंच चुका है। इस पर फ़ेरा के कीटविज्ञानी क्रिस मैलंफ़ी ने कहा, “ये सैलानी टिड्डा इतना पेटू है कि जब इसे अलग ले जाकर प्रयोगशाला में रखा गया तो इसने बंदगोभी पर ऐसा हमला बोला कि उसे खाते हुए बंदगोभी के अंदर पहुंच गया.” देखा आपने कितना भयावह दृश्य रहा होगा। घासी राम हैं या ड्रिलमशीन। ऐसा लगता है ये कहीं भी सेंध लगा सकते है। हालांकि ब्रिटेन की फेरा संस्था इस बात से ज्यादा चिंतित नहीं है कि कोई घुसपैठिया उनके दर पर आ चुका है। क्योंकि ब्रिटेन ऐसा मानता है कि मौसम उसके माकूल नहीं है लिहाज़ा वो यहां पर अपनी पलाटून पैदा नहीं कर पाएगा । इसलिए घबराने की जरुरत नहीं। लेकिन आतंकी तो आतंकी होता है। और फिर जब वो एशियाई देश से आया हो । तो मुसीबत का सबब होता ही है। लिहाज़ा घासीराम के आतंक से सावधान। क्योंकि पिछले कई बर्षों से इन्होंने हमारा जीना हराम कर रखा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-2112285514991949767?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/2112285514991949767/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=2112285514991949767' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/2112285514991949767'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/2112285514991949767'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='घासीराम का आतंक'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=8508924060094200347' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/8508924060094200347'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/8508924060094200347'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='इंदिरा अम्मा'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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था&lt;br /&gt;कई रोज़ से&lt;br /&gt;और वैसी ही भूखी उसकी दादी&lt;br /&gt;एक कोने में बैठे वो लोग&lt;br /&gt;किसी के इंतजार में थे &lt;br /&gt;शायद किसी अपने के&lt;br /&gt;लेकिन अब जो मैने देखा&lt;br /&gt;वो विचलित कर सकता था &lt;br /&gt;किसी को भी&lt;br /&gt;उस नवजात के शरीर से खून रिस रहा था&lt;br /&gt;उसकी दादी बार-बार&lt;br /&gt;अपने चीथड़ों से&lt;br /&gt;उसके ज़ख्मों को पोछ रही थी&lt;br /&gt;शरीर पर उसके कपड़ा सिर्फ इतना था&lt;br /&gt;कि बमुश्किल ही&lt;br /&gt;अपनी लज्जा को आड़ दे पा रही थी&lt;br /&gt;लेकिन किसी बच्चे को इतना लाड़&lt;br /&gt;शायद मैने पहली बार देखा था।&lt;br /&gt;वो बच्चा तो सिर्फ &lt;br /&gt;चीख ही रहा था&lt;br /&gt;दर्द की कराहट&lt;br /&gt;उसके पेट में मौजूद पानी को भी सोख चुकी थी&lt;br /&gt;अब उसके जख्मों की आवाज़&lt;br /&gt;भरभरा उठी थी&lt;br /&gt;मैं मजबूर था, बेबस था।&lt;br /&gt;क्योंकि न तो मेरे पास इतना पैसा ही था&lt;br /&gt;और न ही इतना ररुख&lt;br /&gt;कि अनजान शहर में &lt;br /&gt;काश, मैं उसके ज़ख्मों को खरीद पाता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3843114862881166629?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3843114862881166629/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3843114862881166629' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3843114862881166629'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3843114862881166629'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/08/blog-post_25.html' title='काश, मैं जख्मों को खरीद सकता'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-7286056151799118427</id><published>2009-08-16T03:05:00.000-07:00</published><updated>2009-08-16T03:08:18.557-07:00</updated><title type='text'>अनोखा सफर और वो हाइटेक बाबा</title><content type='html'>कुछ ही दिन पहले की बात है। नोएडा से गृहनगर लौट रहा था । चुनावों में सारी बसें लगी होने के कारण ट्रेन में काफी भीड़ चल रही थी बीते दिनों। मैं लखनऊ मेल में गाजियाबाद से बैठा। उस दिन भी ट्रेन में भयंकर भीड़ थी। लेकिन एक डिब्बा खाली था। दरअसल ये वो वाला डिब्बा था, जिसमें सामान वगैरा रखा जाता है। वो डिब्बा बंद था । मैने खटखटाया, तो अंदर बैठे एक बाबा ने खोला । वो बाबा अकेले ही उस डिब्बे में सवार हो लिए थे । ऐसा मालूम होता था। क्योंकि अंदर से बंद करने का मतलब तो यही जान पड़ता था कि वो किसी औऱ को जगह नहीं देना चाहते थे। मेरा उस दिन भाग्य अच्छा था जो बाबा ने अंदर से दरवाजा खोल दिया। वरना उस दिन तो मेरी ट्रेन छूट ही जाती । क्योंकि इतनी भीड़ में किसी डिब्बे घुसना युद्ध करने के समान था। खैर मैं उस सामान वाले डिब्बे में बैठ गया। और दरवाजा बंद कर लिया। क्योंकि बाबा ने कहा, बेटा दरवाजा बंद कर लो वरना और लोग घुस आएंगे। ट्रेन जैसे ही स्टेशन पार करेगी तब दरवाजा खोल लेना। महज दो मिनट ठहरने के बाद ट्रेन को हरी बत्ती का इशारा मिला । और वो चल दी, मेरे गंतव्य की ओर। धीमे धीमे ट्रेन रफ्तार पकड़ रही थी। मैने स्टेशन पार होते ही दरवाजा खोल दिया । ठंडी हवा अंदर आ रही थी। मैने बैग से निकाल कर चादर बिछा ली। और लेट गया । ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी।&lt;br /&gt;                    और यहीं से शुरु होती है, उस बाबा की कहानी। बाबा मेरे पास ही बैठे थे। लेकिन पहले बाबा की काया का वर्णन करना जरुरी है। उम्र लगभग 75 की रही होगी। कद करीब 5 फुट 11 इंच। बाल जैसे कपास की खेती। माथा बिना प्रेस का कपड़ा। और दोनो गाल स्रंग गर्त से नज़र आते थे। मुंह में दो दांत ही थे शायद, जो उनकी बत्तीसी के इतिहास की गवाही चीख चीख कर दे रहे थे। वो दांत अब शायद खाने के भी थे और दिखाने के भी। बदन को ढंकने के लिए एक सूती कुर्ता था। लगता था उस कुर्ते ने काफी दिनों से निरमा नहीं खाया होगा। लेकिन जो धोती उन्होंने पहन रखी थी वो काफी उजली थी। लगता था उसे रिन सुप्रीम का भोग लगाया गया हो।&lt;br /&gt;खैर ये तो था बाबा की हैल्थ का एक छोटा सा परिचय। अब कुछ दिलचस्प बातें। कुछ देर बाद बाबा ने अपनी जेब से दूरभाष यंत्र निकाला। लग रहा था किसी से बात करने के मूड में हैं। लेकिन मजा तो तब आया जब बाबा ने उस बड़े से दिख रहे मोबाइल को चलाने के लिए स्टिक का प्रयोग किया। अब आप ही अनुमान लगाइये कि सीन क्या रहा होगा। बाबा बैठे हैं ट्रेन में और मिला रहे हैं किसी अपने का नंबर।वो भी स्टिक से। इस बीच मुझे ये पता लगा कि बाबा के पास जो मोबाइल था वो एचटीसी का था। लेकिन बाबा तो जैसे उस मोबाइल से बड़े फैमिलियर थे। &lt;br /&gt;             अब वो नंबर मिल चुका था जिससे बाबा बात करना चाहते हैं। पहली दुआ सलाम से ये पता लग चुका था कि डायल्ड नंबर उनके घर का है। बात शुरु होती है। हैलो के उच्चारण के साथ । उधर से पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिलने के बाद बाबा ने हा बहू हम ट्रेन मा बैइठि गए हैं। औ सुबह तक शइजहांपुर पहुंचि जइहीं। बाबा अपनी लोकल लैंग्वैज में बात कर रहे थे। बात जारी है फोन पर। हाल चाल लिए जा रहे हैं। ऐसा लग रहा था कि काफी दिनों बाद घर वापस जा रहे है। बहू जा बताबऊ कि छुट्टन की तबियत हरी भइ की नाई। अभी नाई पिता जी । शायद कुछ ऐसा ही जवाब आया था बहू की तरफ से । क्योंकि बाबा के चेहरे पर छुट्टन की तवियत को लेकर उदासी के भाव थे। इस बीच फोन बहू ने किसी और को दे दिया। उधर से मर्दानी ध्वनि सुनाई दे रही थी। पाइं लागूं पिता जी । जीते रहऊ बाबा की तरफ से आशीर्वाद के रुप में। दुकान ठीक चलि रही हअइ कि नाइ। हां ठीकइ चलि रई हइ। पिता जी कब लऊ आइ रए। भुरारे पहुंचि जइहीं, बाबा का जवाब था ये बेटे के पूछे जाने पर। बात करते करते 20 मिनट हो चले थे। लेकिन बाबा तो लगता फुल चार्ज थे । फोन रखने का नाम ही नहीं ले रहे थे। लेकिन इस बीच ये फोन रखने की नौबत तब आई जब सिगनल चले गए । और फोन अचानक ही कट गया । बाबा का चेहरा देखने वाला था उस समय दूरभाष मिनिस्ट्री को सैकड़ों खरी खोटी सुना दी। ससुरे पता नाइ का करत हइं। पइसा निरो लइ लेत सरकार से अऊ टाबर कहूं नाइ लगाउत। बात ससुरी बीचइ मा कटि जात। खैर इस बीच सिगनल फिर आ जाते  हैं। और उनका बेटा उधर से ही फोन मिला देता है। उनके फोन पर जो गाना बज रहा था। वो था ‘आए हो मेरी जिंदगी में तुम बहार बनके’। मेरी हंसी चरम पर थी। भइ कमाल के बाबा हैं। क्या गाना लगा रखा है। कब्र में पैर लटके हैं और अभी भी किसी के इंतजार में जवान बने रहने की चाहत है। &lt;br /&gt;बाबा और बेटे की बात फिर शुरु हो जाती है। लेकिन अभी भी वही हाल चाल पर ही बात हो रही है। बातचीत का ये सिलसिला दस मिनट तक चला होगा। बाबा बोले अइसो करऊ अब रक्खि देऊ फोन। रोमिंग लगि रही हइ। हमारो भी कटि रहो। और तुम्हारो भी पइसा कटि रहो। फायदा कोई नाइ। इस बीच एक बार फिर बाबा ने दूरभाष मंत्रालय को गरिया दिया। फोन पर बाबा ने इतिश्री कर दी।&lt;br /&gt;अब चालू होता है फोन से फोटो लेने का सिलसिला। मन ही मन हंसी आ रही थी मुझे। बाबा के हाथ उस स्टिक से इतने फैमिलियर थे कि पूछिए मत। धड़ाधड़ फ्रेम बनाकर बाबा ने बीस पच्चिस फोटो खींच डालीं। साथ ही बना डाली रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनों की वीडियो भी। फोटो खींचते-खींचते और वीडियो बनाते-बनाते बाबा बोर हो चुके थे, तो अब बारी थी । गाने सुनने की। बाबा ने मीडिया प्लेयर खोला और कइ सारे गानों को एक साथ उस स्टिक के माध्यम से सेव कर लिया। मैने सोचा बाबा पुराने जमाने के हैं। तो कुछ पुराने गाने ही सुनेंगे। लेकिन जो गाने उन्होंने सुने वो उनकी जवानी का इतिहास बताने के लिए काफी थे। कि बाबा ने अपनी जवानी के समय खूब गुल खिलाए होंगे। जो गाने मैने उनके मोबाइल पर सुने वो थे। फूलों सा चेहरा तेरा कलियों से मुस्कान है, परदेसी परदेसी जाना नहीं मुझे छोड़ के, दिल धड़के मेरा दिल धड़के कोई नहीं जाने बाबा क्यों धड़के (बाबा सहगल की अलबम वाला गाना था ये), कुल मिलाकर जो भी गाने बजाए जा रहे थे, वो प्यार मोहब्बत से लबरेज़ थे। और ये चित्रहार का सिलसिला अगले तीन घंटे तक चलता रहा । ट्रेन भी बरेली पहुंचने वाली थी। जहां से मेरा घर शाहजहांपुर मजह 70 किलोमीटर ही था।   &lt;br /&gt;चूंकि बाबा जानी को हमारे ही डेश्टिनेशन पर उतरना था। सो बस अब दोनो को शायद इसी बात का इंतजार था कि कब शाहजहांपुर आए। सुबह के पांच बजने वाले थे, उस दिन लखनऊ मेल कुछ धीमी थी, शायद तभी पांच बजे तक बरेली ही पहुंची थी। लेकिन बतोलेबाज बाबा के चक्कर में सफर का पता ही नहीं चला । सचमुच मेरे लिए ये सफर अनोखा था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-7286056151799118427?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/7286056151799118427/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=7286056151799118427' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7286056151799118427'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7286056151799118427'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/08/blog-post_16.html' title='अनोखा सफर और वो हाइटेक बाबा'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-5627986116158228928</id><published>2009-08-15T09:15:00.000-07:00</published><updated>2009-08-15T09:16:09.716-07:00</updated><title type='text'>मैं हिंदुस्तान हूं</title><content type='html'>मैं हिंदुस्तान हूं&lt;br /&gt;हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई&lt;br /&gt;इन सबकी शान हूं&lt;br /&gt;मैं हिंदुस्तान हूं&lt;br /&gt;मेरी धरा ही, मेरी मां है&lt;br /&gt;मेरी अपनी भारत मां&lt;br /&gt;खून से सींची इस धरती पर&lt;br /&gt;नाज़ मुझे हर दम रहता&lt;br /&gt;इस मिट्टी में जन्मे जो &lt;br /&gt;है गर्व उसे हर पल रहता&lt;br /&gt;एक टीस मुझे जब-तब रहती&lt;br /&gt;जब गुलाम भारत था मैं&lt;br /&gt;उखड़ी सांसे&lt;br /&gt;मां की तड़पन&lt;br /&gt;और तड़प, हिंदुस्तां की&lt;br /&gt;याद रहेगी हर पल मुझको&lt;br /&gt;उनकी उस कुर्बानी की &lt;br /&gt;दगती तोप, चली थी गोली&lt;br /&gt;भारत मां की छाती पर&lt;br /&gt;सिसक, सिसक &lt;br /&gt;हर कोई रोता&lt;br /&gt;अपनी मां के आंचल पर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-5627986116158228928?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/5627986116158228928/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=5627986116158228928' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5627986116158228928'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5627986116158228928'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/08/blog-post_15.html' title='मैं हिंदुस्तान हूं'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-4390691888372781659</id><published>2009-08-04T00:45:00.000-07:00</published><updated>2009-08-04T00:47:37.898-07:00</updated><title type='text'>सफ़र</title><content type='html'>उस आने वाली बारिश की बूंदो ने&lt;br /&gt;हवा को, श्रंगार का अहसास कराया।&lt;br /&gt;घर की कुछ यादों का,&lt;br /&gt;दोस्तों की चटपटी बातों का,&lt;br /&gt;और मां के दुलार का,&lt;br /&gt;मन को बहुत कुछ याद आया,&lt;br /&gt;उस सफ़र में।&lt;br /&gt;छुक-छुक दौड़ रही थी गाड़ी&lt;br /&gt;मेरे घर की ओर। &lt;br /&gt;खेतों को सहलाती पवन,&lt;br /&gt;खेल रही थी,&lt;br /&gt;खेल कुछ और।&lt;br /&gt;काली घटाओं से,&lt;br /&gt;आच्छादित था अंबर,&lt;br /&gt;शायद बारिश ही आने वाली थी।&lt;br /&gt;वो शीतल समीर, &lt;br /&gt;तन के हर हिस्से पर,&lt;br /&gt;मरहम लगा रही थी।&lt;br /&gt;मरहम, उस अकेलेपन पर,&lt;br /&gt;जो उस सफ़र में,&lt;br /&gt;दर्द बनकर कचोट रहा था।&lt;br /&gt;याद दिला रहा था,&lt;br /&gt;बीते हुए वक्त को   &lt;br /&gt;गोधुली बेला में, धूल के गुबार,&lt;br /&gt;शांत पड़ने लगे थे,&lt;br /&gt;रिमझिम फुहार सी, गिरने जो लगी थी,&lt;br /&gt;आंचल फैलाई बारिश&lt;br /&gt;सोंधी मिट्टी की खुशबू को&lt;br /&gt;आगोश में लेने लगी थी।&lt;br /&gt;खेतों के किनारे&lt;br /&gt;उस माटी की मढ़इया से&lt;br /&gt;कुछ आंखें, आकाश की ओर, निहार रहीं थीं&lt;br /&gt;इस आस में, &lt;br /&gt;कि और बारिश हो।&lt;br /&gt;और बारिश होती भी रही&lt;br /&gt;उस पूरे सफ़र भर।&lt;br /&gt;लेकिन प्रकृति की माया अजीब है&lt;br /&gt;कहीं धरा प्यासी है &lt;br /&gt;तो कही जलजला है&lt;br /&gt;नियति का खेल ही ऐसा है&lt;br /&gt;कि ज़िदगी के सफ़र में&lt;br /&gt;हर ख्वाहिश अधूरी है&lt;br /&gt;और हर अधूरी, ख्वाहिश&lt;br /&gt;जहां खुशी है&lt;br /&gt;वहीं गम भी&lt;br /&gt;और इनको जीने वाला&lt;br /&gt;एक अच्छा हमसफ़र है...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-4390691888372781659?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/4390691888372781659/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=4390691888372781659' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/4390691888372781659'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/4390691888372781659'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='सफ़र'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-6195573231218202142</id><published>2009-07-04T01:43:00.000-07:00</published><updated>2009-07-04T01:48:15.951-07:00</updated><title type='text'>वाह रे “वरुण पुराण”</title><content type='html'>गरुड़ पुराण के बारे में तो सबने सुन रखा होगा। ये 19 हजार श्लोकों का एक ऐसा पुलिंदा, जिसकी जरुरत तब पड़ती है। जब किसी की मृत्यु हो जाती है। तथाकथित जिस व्यक्ति की मृत्यु होती होती है, उसकी आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए इस पुथन्ने का पाठ किया जाता है। घर के सभी सदस्यों के बीच कदाचित् राधे महाराज जैसे ही कुछ ज्ञाता इसका पाठ पढ़ते हैं। &lt;br /&gt;ये तो रही बात गरुड़ पुराण की, लेकिन हाल ही में लॉंच हुआ वरुण पुराण बीजेपी का एक ऐसा एडीशन है, जिसकी प्रति आम चुनावों से पहले बेतरतीब बिकी। खूब ढोल बजा पुराण-ए-वरुण का। युवा पीढी़ को लीड करने वाले जवां गांधी की कारगुजारी खूब पसंद की जा रही थी। और पार्टी के आला अफसर भी उस जश्न में शामिल थे। सबको विश्वास था कि चुनाव बाद वरुण पुराण पार्टी की आत्मा को शांति देगा। यानि पार्टी, सबको चित कर विजय श्री हासिल करेगी। लेकिन क्या हुआ इसका ज़िक्र कुछ देर बाद किया जाए तो बेहतर होगा। उससे पहले ये जान लेना जरूरी है कि आखिर ये गरुड़ ....मेरा मतलब है वरुण पुराण है क्या ?&lt;br /&gt;             सात मार्च 2009 की ही बात है। जब पीलीभीत में आम जनता को संबोधित करते हुए वरुण गांधी के मुंह से ऐसे श्लोक निकले जो वरुण पुराण के लिए पहला पन्ना बने, इसके  के बाद आठ मार्च को भी ऐसा ही हुआ। यहां भी पीलीभीत के बरखेड़ा गांव में वरुण आग उगलते नज़र आए। और ये आग थी वरुण पुराण का बाकी हिस्सा पूरा करने के लिए।&lt;br /&gt;              सबसे पहले पढ़वाते हैं पुराण के कुछ अंश। अगर कोई हिंदुओं की ओर हाथ बढ़ाता है, या फिर ये सोचता हो कि हिंदू नेतृत्वविहीन हैं, तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूँ, कि मैं उस हाथ को काट डालूंगा."। इन संवादों की आत्मा फिल्मों से प्रेरित है। ऐसा जान पड़ता है। क्योंकि अगर किसी सिनेमा में ये संवाद बोले जाते, तो ताबड़तोड़ तालियां पीटी जातीं। और गदर एक प्रेम कथा याद आ जाती। &lt;br /&gt;अब कुछ अगले पन्नों के अंश। अपना लिखित वक्तव्य पढ़ते हुए उन्होंने कहा, "मैं एक गांधी हूँ और एक भारतीय हूँ और समान रुप से एक हिंदू हूँ." "मुझे अपने हिंदू होने पर गर्व है."राजनीतिक षड्यंत्र का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा, "यह मुझे सांप्रदायिक साबित करने की दुर्भावनापूर्ण कोशिश है." उन्होंने कहा, "मैं किसी संप्रदाय के ख़िलाफ़ नहीं हूँ.", "मैंने जो कुछ कहा उसका उद्देश्य किसी को भड़काना नहीं था. मेरे किसी भी संप्रदाय के ख़िलाफ़ होने का सवाल ही नहीं है. मेरी कोशिश एक ऐसे समुदाय के भीतर आत्मविश्वास पैदा करने की थी जो यह महसूस करती है कि वह अपने ही देश में बंधक है." &lt;br /&gt;ये थे वरुण पुराण में लिखे गए लीपा-पोती के कुछ अंश । जो सबको बखूबी याद है। है कमाल की बात तो ये है की जिस गरुड़ पुराण की जरुरत हम सबको हमारी मौत के बाद पड़नी है उसका एक भी श्लोक हमें याद नहीं। लेकिन वरुण पुराण का हर एक श्लोक आत्मा तक में बस गया है। और वरुण पुराण की टीआरपी के तो क्या कहने । सारे चैनल पांच में से पांच सितारे ही दे रहे थे । इस फायरब्रांड युवा को । यानि एक दम मसाला पुराण बन गया था वरुण पुराण।&lt;br /&gt;कुछ ऐसे भी थे जो बीजेपी के इस एडीशन के विरोध में थे । जाहिर सी बात है पहला नाम या तो बहिन जी का होता या कांग्रेस का । सो बहिन जी ने इस पुराण को सेंसर्ड कर दिया । पुराण को ए ग्रेड का सर्टिफिकेट गिफ्ट किया गया। यानि रासुका लगवा दी । पुराण को बक्से में बंद करवा दिया। मतलब वरुण को मखमल के बिस्तर से एटा जेल के दर्शन करवा दिए। जो अब तक शाही पनीर और कड़ाही पनीर खाते थे अब लौकी तोरई खाने को मजबूर थे। भई अब जेल के मोहनभोग तो ऐसे ही होते हैं।  और ऐसे ही बहिन जी ने अपनी सारी खुन्नस निकाल ली। तो वहीं लालटेन के लाल बोले कि मैं इस पुराण रचयिता पर बुल्डोजर ही चलवा देता। &lt;br /&gt;पुराण के विरोध जारी थे । लेकिन वरुण की टीआरपी नंबर बना रही थी। और बीजेपी को इसी पुराण की रचना के साथ ही मिला था। एक ऐसा नेता जो मोदी पुराण माना जा सकता था । जिसे संज्ञा भी दे डाली गई जूनियर मोदी पुराण की। बीजेपी के लिए तो ये भागते भूत की लंगोटी से कम न थी। आस थी की शायद यही लंगोटी यमुना पार लगा दे। सबको भरोसा था उस भड़काऊ पुराण पर, कि हमारे कुंवर साब खुद तो जीतेंगे ही, साथ साथ ही पार्टी की भी नैया पार लगा देंगे।&lt;br /&gt;चुनाव से ठीक पहले वरुण को जमानत मिली। तो उनकी और जय-जय कार होने लगी। चहुंओर सिर्फ एक ही एक ही गूंज ही वरुण पुराण की। लेकिन पुराण रचयिता के मामा जो पीलीभीत में अच्छा खासा रसूख रखते थे। इस बार भी पुराने ढर्रे पर थे। मतलब उनका चुनावी बिगुल वरुण पुराण के खिलाफ फूंका गया था।  &lt;br /&gt;रिजल्ट आ गए। कोई जीता, कोई हारा। यहां भी वरुण बाबा की जीत हुई लेकिन वरुण पुराण हार गया । जिस सोच को लेकर इस पुराण को रचा गया । वो पार्टी के लिए एक छद्म साबित हुआ। और बीजेपी औंधे मुंह धड़ाम हो गई। अब सबके निशाने पर एक बार फिर वरुण पुराण ही था। कहा गया इसकी रचना ही गलत हुई। चुनाव से ठीक पहले जो बीजेपी के इस एडीशन को कंठस्य कर लेना चाहते थे, वही अब वरुण पुराण पर लाठी भांजने को उतारू थे। लेकिन कुछ भी हो पार्टी भले ही यमुना पार न लग पाई। लेकिन वरुण पहली बार संसद पहुंच कर अपने पुराण के लीड हीरो जरुर बन गई। वाह रे “वरुण पुराण” बीजेपी की आत्मा को कष्ट पहुंचाने के लिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-6195573231218202142?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/6195573231218202142/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=6195573231218202142' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6195573231218202142'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/6195573231218202142'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='वाह रे “वरुण पुराण”'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3595228904626722661</id><published>2009-06-24T03:14:00.000-07:00</published><updated>2009-06-24T03:24:52.112-07:00</updated><title type='text'>शराबनामा और दवानामा</title><content type='html'>दवा और दारु का संग बड़ा पुराना है। ज्यादा सुरा पान के बाद दवा पान की ही जरुरत पड़ती है। जिसने मधुपान नहीं किया वो जीवन के एक सुख से वंचित रह गया। ऐसा मैं नहीं कहता, पीने वाले खिलाड़ापीर कहते है। आरजू बानो कहती है कि पीना बहुत ज़रूरी है जीने के वास्ते। बचपन की कच्ची माटी में ये दर्शन गहरे पैठ बना बैठा। और बस, तब से ये सिलसिला बरबस ही जारी है, उनका। उनके लिए तो बस पीना बहुत जरुरी है जीने के वास्ते। &lt;br /&gt;इस बार सूर्य देवता काफी कोपित नज़र आ रहे हैं। सो कोपभाजन हमें और आप को ही सहना पड़ रहा है। ऑफिस निकलने से पहले दस बार सोचना पड़ता है। और सोचते सोचते दोपहर 2 बजे की शिफ्ट में कब शाम के पांच बज जाते हैं। पता ही नहीं चलता। लेकिन उस समय भी नोएडा समेत पूरे एनसीआर में धूप दहाड़ें मारती नज़र आती है। किसी सिंह की तरह। अब शरीर के वो अंग काले पड़ चुके हैं। जिनपर कपड़ालत्ता नहीं होता। बेचारे इस भरी दोपहर में छिपकली से हो गए हैं। &lt;br /&gt;लगभग पिछले सात आठ महिनों से एक ही रुट से ऑफिस जाना हो रहा है। सो जाहिर सी बात है जाने पहचाने चेहरे ही दीदार के लिए मिलते हैं। ऐसे ही कुछ मिलते हैं वो जिनके लिए पीना बहुत जरुरी है जीने के वास्ते। फिर चाहे गर्मी हो या सर्दी उन्हें तो एक घूंट में डकारनी है। बगैर डकार मारे। यानि मदिरा पान के लिए उनके मध्यप्रदेश (उदर) में काफी जगह है। साइड डिश के नाम पर वे हाजमोला से ही काम चला लेते हैं। एक हाजमोला में कब बोतल खत्म हो जाती है पता ही नहीं चलता । उसके बाद इस बदन जलाऊ गर्मी में वो जहां के तहां पड़े रहते हैं। न किसी के आने का पता न किसी के जाने का पता। बस अपनी ही धुन में रमें हैं। &lt;br /&gt;चलिए अब आप को एक और जगह लेकर चलते हैं। ये वो जगह है जिसने मुझे ये ब्लॉग लिखने को प्रेरित किया। दिल्ली में एक जगह है जिसका नाम है कोंडली। मुझे एटीएम से गांधी बाबा निकालने थे सो वहां रुकना पड़ा। टेलर मशीन पर काफी संख्या में लोग मौजूद थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर बैंक ऑफ बड़ौदा के एटीएम पर इतनी भीड़ कैसे । क्या दिल्ली के सारे एटीएम रिक्त हो चले हैं। खैर मैं इधर-उधर फंटियाने लगा और अपनी बारी का इंतजार करने लगा। &lt;br /&gt;एटीएम के ठीक पीछे जाने पर पता चलता है। कि मदिरालय के ठीक बगल में औषधालय है। अकस्तमात् ही मुख उवाच् उठा। बहुत सुंदर। मतलब एक तरफ दवा तो दूसरी तरफ दारु। वाह भई वाह । मदिरालय भी भरा हुआ। औषधालय भी ।  दोनो दुकानों पर भीड़ जबरदस्त थी। लोग दारु की दुकान से चवन्नी, अठन्नी खरीदते और फौरन औषधालय पहुंच जाते । दरअसल वो दवा की दुकान अब बन चुकी थी। दारु के बाद का सामान। प्लास्टिक के ग्लास, कुरकुरे, भुजिया, चिप्स, सिगरेट सब कुछ मौजूद था उस दुकान पर। ये तो सब मिल ही रहा था। साथ ही मिल रहा था। पीने वालों के दर्द दूर करने का सामान। यानि आफ्टर ड्रिंक। ताकि वहां से टल्ली होने के बाद लोग सही सलामत घर पहुंच सकें। कुछ लोग उस दुकान से वो दवाएं भी ले रहे थे जिससे उल्टी, सीधी हो जाए। यानि उल्टी निवारक दवा। देखते ही देखते भीड़ बढ़ने लगी। क्योंकि जैसे जैसे रात के दस बज रहे थे लोगों के मन में मदिरालय जाने का भूत कुलबुलाने लगता। वरना नोएडा से महंगी शराब जो खरीदनी पड़ती। इस होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। साम, दाम, दंड, भेद सबका इस्तेमाल करके लोग मैदान मार कर ही औषधालय तक पहुंचते।&lt;br /&gt;मन ही मन बुजुर्गों का वो संवाद याद आ रहा था। कि यदा कदा लोग कह दिया करते थे। कि और भई दवा दारु सब ठीक चल रहा है न। और मैं भी कह देता था। सब कुशल मंगल। हाए री संजीवनी बूटी की वो दुकान। अगर बजरंग बली होते तो बड़ा गुस्सा करते। लेकिन मुझे तो सब कुछ कॉमेडी ही लग रहा था । इसलिए लिख दिया। अगर आपको भी शराबनामे से दवानामे तक का ये निराला सफर तय करना है तो एक बार बॉब के उस एटीएम तक जरुर जाएं। आशा करता हूं सब कुछ वैसा ही होगा जैसा मैने देखा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3595228904626722661?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3595228904626722661/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3595228904626722661' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3595228904626722661'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3595228904626722661'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/06/blog-post_24.html' title='शराबनामा और दवानामा'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3195242648044900810</id><published>2009-06-05T04:06:00.000-07:00</published><updated>2009-06-05T04:07:43.995-07:00</updated><title type='text'>मत काटो मेरे यौवन को</title><content type='html'>मैं हूं एक वृक्ष&lt;br /&gt;देता हूं लोगों को छांव&lt;br /&gt;मुझपर बसते हैं पंछी&lt;br /&gt;बनाकर अपना गांव &lt;br /&gt;चाह नहीं मेरी कुछ भी है&lt;br /&gt;सिर्फ चाहता हरियाली&lt;br /&gt;सर्दी, गर्मी हर मौसम में &lt;br /&gt;मेरा जीवन खुशहाली&lt;br /&gt;लेकिन एक दर्द है मुझको&lt;br /&gt;मत काटो मेरे यौवन को&lt;br /&gt;इतना अहसान करो मुझ पर भी&lt;br /&gt;बख्शो मेरे जीवन को&lt;br /&gt;(पर्यावरण दिवस पर समर्पित ये चंद पंक्तियां, वृक्षों को बचाने की एक पहल है, इस मुहिम में सभी का स्वागत है)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3195242648044900810?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3195242648044900810/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3195242648044900810' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3195242648044900810'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3195242648044900810'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='मत काटो मेरे यौवन को'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-5107355395040932288</id><published>2009-05-26T08:08:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T08:10:06.795-07:00</updated><title type='text'>वो चीफ प्रॉक्टर और वो चचेरा भाई</title><content type='html'>एक बार चीफ प्रॉक्टर ने विद्यालय में लगाया राउंड&lt;br /&gt;लंबा था ग्राउंड &lt;br /&gt;हाथ में डंडा &lt;br /&gt;शक्ल से पंडा &lt;br /&gt;रोबीला चेहरा देखकर &lt;br /&gt;बच्चे सकपकाए&lt;br /&gt;दौड़कर अपनी कक्षाओं में आए&lt;br /&gt;किसी कक्षा में &lt;br /&gt;कुछ बच्चे शोर कर रहे थे &lt;br /&gt;और गालियों से अलंकृत कर रहे थे &lt;br /&gt;चीफ प्रॉक्टर को गुस्सा आया &lt;br /&gt;डंडा हिलाते हुए धमकाया&lt;br /&gt;कि बोलो ये कुर्सियां किसने तोड़ीं &lt;br /&gt;इस लड़के की खोपड़ी किसने फोड़ी&lt;br /&gt;एक लड़का सीट पर तमतमा कर खड़ा हुआ&lt;br /&gt;और बोला&lt;br /&gt;गरुजी, डोनेशन चुकाया है&lt;br /&gt;सीट पर बैठूंगा&lt;br /&gt;अभी तो सर ही तोड़ा है&lt;br /&gt;हाथ पैर तोड़ूगां&lt;br /&gt;उस लड़के की उद्दंडता के पीछे कुछ राज़ था?&lt;br /&gt;शायद किसी टीचर्स का ग्रुप उसके साथ था?&lt;br /&gt;सभी टीचर्स चीफ प्रॉक्टर से खिन्न थे &lt;br /&gt;उस छात्र की विलक्षण प्रतिभा के आगे प्रश्नचिन्ह थे?&lt;br /&gt;एक बार चीफ प्रॉक्टर ने उस लड़के को &lt;br /&gt;अपने ऑफिस में बुलाया &lt;br /&gt;डंडा हिलाते हुए धमकाया&lt;br /&gt;कि इस डंडे से सभी घबराते हैं&lt;br /&gt;और प्रधानाचार्य जी थर्राते हैं&lt;br /&gt;कि इस डंडे से सभी घबराते हैं&lt;br /&gt;प्रधानाचार्य जी थर्राते हैं&lt;br /&gt;लड़के ने हिम्मत दिखाई&lt;br /&gt;ऑफिस में गोली चलाई &lt;br /&gt;फायर हवाई था&lt;br /&gt;वो और कोई नहीं&lt;br /&gt;प्रधानाचार्य जी का चचेरा भाई था....&lt;br /&gt;(नोट –ये कविता सत्य घटनाओं पर आधारित है)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-5107355395040932288?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/5107355395040932288/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=5107355395040932288' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5107355395040932288'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/5107355395040932288'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html' title='वो चीफ प्रॉक्टर और वो चचेरा भाई'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-7065777948341680563</id><published>2009-05-01T06:49:00.000-07:00</published><updated>2009-05-01T06:51:01.555-07:00</updated><title type='text'>सत्यानासी काशी निवासी</title><content type='html'>प्रस्तुत होने वाली पंक्तियां मेरे पड़ोसी बर्बाद गुलिस्तां की पंडिताई से अवतरित हैं(नोट-बर्बाद गुलिस्तां माने पंडित का घर)। ये कहानी श्री-श्री 108 कदाचित् तामलोट लोटन प्रसाद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधेश्याम उपाध्याय की करतूतों से प्ररित होकर लिखी जा रही है। अपने आप को किसी की प्रेरणा का पात्र बनाने के लिए पंडित जी ने पूरे 60 बर्षों का कठोर तप किया है। किसी वन वगैरा में जाकर नहीं, बल्कि लोगों के घर में शादी से लेकर गरुण पुराण तक का इंतजाम कराने तक । कमाल के मैनेजर हैं पंडित जी। और वैसा ही कमाल की उनकी तोंद। जो उनकी पंडिताई के इतिहास की वीर गाथांएं सुनाती है। पेट का लंबा चौंड़ा घाट, कि जिस पर, बिछा लीजिए खाट। कुछ ऐसी ही सुंदर छवि है राधे महाराज की । नाम बेहद लंबा था पंडित जी का सो लोग उन्हें निकनेम से ही पुकारते हैं, जय हो राधे महाराज कहकर। अगर किसी को ज़ुबान दे दी तो कभी वापस नहीं ली, महाराज ने। बस पहुंच जाते हैं समय से एक घंटा पहले छप्पन भोग चटोरने। और अपने ज्ञान की गंगा बहाने। इस बार मैं उनसे पूरे एक साल बाद मिल रहा था। थोड़ा मैं भी बदल गया था । लेकिन वो कुछ ज्यादा ही बदल गए थे। इसलिए उनकी काया में थोड़ा संशोधन करके बता रहा हूं। पेट का लंबा चौंड़ा घाट कि जिस पर बिछा लीजिए एक बड़ी खाट। यानि पंडित जी की तोंद का साइज दिनों दिन तरक्की पर था। मंदी के दौर में जहां कॉरपोरेट जगत में पींगे लड़ाने वालों के गाल सूख चुके थे, वहीं पंडित जी के चेहरे पर बहार नज़र आ रही थी। पांच फिट सवा दो इंच लंबाई लिए पंडित जी जब फर्जी ज्ञान की गंगा बहाते । तो लोग उस बदबूमई गंगा स्नान करने से ना चूकते और तारीफों के पुल बांधने लगते   और इस पल को देखते ही मेरा मन हमेशा की तरह बांकेलाल स्टाइल हो जाता(नोट-बाकेंलाल यानि कॉमेडी किंग, कॉमिक कैरेक्टर)। हाल ही की बात है एक विवाह समारोह में शिरकत करने आगरा गया था। फैमिली पंडित जी भी मौजूद थे। बरात चढ़ने से एक दिन पहले का समय था । दोपहर के 12 बजे होंगे। धूप उबाल मार रही थी। पसीना जलधारा बनकर निकल रहा था। इतने में शादी वाले घर पर राधे महाराज के कदम पड़ते हैं। अब पंडित जी पहले से ढाई गुना ज्यादा मोटे हो चुके थे और उनकी तोंद हमेशा की तरह गौरवमई इतिहास की गवाही दे रही थी। क्योंकि दरवाजे से अंदर जब वो आ रहे थे तो वो तो बाद में आए लेकिन उनका तोंद पहले घर में घुसकर अपनी प्रेजेंटेशन का अहसास करा चुकी थी।&lt;br /&gt;जय हो राधे महाराज के संबोधन के साथ मैने उनका अभिवादन किया। जवाब भी मिला लेकिन अंजाना सा। शायद भूल चुके थे पंडित जी मुझ जैसे खुराफाती कैरेक्टर को । लेकिन मेरा ये सोचना गलत हो गया जब पंडित जी ने मुझे मेरे निकनेम से संबोधित कर कहा कि और नंदू भइया कइसे हौ ? कुशल मंगल महाराज। कुछ चाय पानी हो जाए क्या पंडित जी । मैने तो औपचारिकता मात्र पूछा था। लेकिन पंडित जी तो जैसे थाली चाटने को बेताब थे। बोले, भइया एक लोटा शीतल दूध ले आओ रुहआफजा डालकर। ओफ्फो आज तो लगता है आत्मा तृप्त करके ही दम लेंगे राधे महाराज। दूध प्रस्तुत किया गया । एक सांस में गटक गए पूरा एक लीटर दूध। ये तो शुरुआत थी क्योंकि अब तो भोजन भक्षण का खौफनाक आगाज होने वाला था। अरे ओ बड़े की बहू तनिक भोजन वोजन भी हो जाए। क्या लेंगे महाराज ? कुछ हल्का फुल्का जो बना हो वो ले आएं तो आनंदमंगल हो जाए। जी महाराज। भोजन के आते ही जुट पड़े राधे महाराज, ऐसा लग रहा था न जाने कितने जन्मों से भूखे हैं। जब खाने से छक गए तो अब बारी थी तोंद को तर करने की। पानी से कहां मानने वाले थे महाराज। कहा, बेटी अगर कुछ खीर जैसा बनाया हो तो दो वरना कोई बात नहीं। दरअसल पंडित जी को पूरा विश्वास था कि खीर बनी होगी। क्योंकि उनके पड़ोस में जो छोटा बच्चा खड़ा था उसका मुंह खीर की उपस्थिति की गवाही दे रहा था। और पंडित जी वो इतिहास पढ़ चुके थे। खैर उनकी वो मंशा भी पूरी हुई। और खीर से गले को तर किया गया। खाना खा चुके थे पंडित जी। अब बारी थी फलाहार की । मैं सोच रहा था कमाल की तोंद है इनकी कुछ पता ही नहीं चलता पता नहीं इतना खाना किस कोने में पहुंच गया। माया थी उनकी पंडिताई की जो बचपन से ही उनका पेट ज्यादा खाने की प्रैक्टिस में पारंगत था। इसी बीच फलाहार भी हुआ। बारी थी पूजा पाठ की जिसके लिए उन्हें अर्जेंट बुलाया गया था। वर पक्ष से दूल्हा तैयार था रस्मो रिवाज को। घर के आंगन में गड़े खंब के एक तरफ से राधे तो दूसरी तरफ थे भावी दूल्हा महाराज। और इन दोनो को घेरे हुए बैठी थी पूरी रिश्तेदार मंडली। पूजा पाठ आरंभ होता है (नोट-ये सारी रस्में शादी से एक दिन पहले की हैं) दूल्हे को प्रीपेयर करने के लिए पंडित जी पूरी तरह तैयार थे।&lt;br /&gt;मंत्रोच्चार आरंभ होता है। ओइम गराणांत्वा गणपतिगोंगवा महे प्रियाणांत्वा प्रिय पति गोंगवा महे निधिनांत्वा निधिपति गोंगवा महे स्वाहा(स्पेलिंग मिस्टेक हो सकती है लेकिन मैं जैसा सुन रहा था वैसा ही लिख रहा हूं) । कलश के चारो ओर पान से जल प्रवाहित करें। दूल्हे से बोले राधे महाराज। और एक सौ एक रुपए भगवान के नाम चढा़ दें। दूल्हे की थाली में रखे हुए पैसों की ओर इशारा करते हुए हुए पंडित जी बोले । ओइम मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुणध्वजा, मंगलम पुंण्डरिकाछं, मंगलाय तर्णोहरि(स्पेलिंग मिस्टेक्स मे बी वो भी टू मच)। पुन: पैसे से भरी थाली की ओर इशारा करते हुए राधे महाराज ने 251 भगवान के नाम पर चढ़वा लिए। जैसे जैसे पंडित जी के वही रटे रटाए मंत्र बढ़ रहे थे। वैसे वैसे उनके ईश्वर अमीर होते जा रहे थे। लगभग बीस मिनट तक चले उस फर्जी मंत्रोच्चार ने भगवान को हजार पति तो बना ही दिया था। लेकिन दूल्हे महाराज बेफिक्र थे दनादन पैसों की बारिश कर रहे थे। आखिर जन्नत की सैर जो करने वाले थे कुछ ही घंटों बाद। उधर राधे महाराज पूजा समाप्त कर घर वापसी की तैयारी में थे। लेकिन उस बीस मिनट के पूजा सेशन में पंडित जी का पेट कुछ हल्का हो गया था। सो एक गिलास लस्सी की दरकार थी पंडित जी को। लस्सी का भी स्वाद चखा गया। और अब बारी थी पंडित जी की विदाई की । विदाई रस्म के अनुसार 501रु की तो बनती ही है। 501 रु लेकर ही माने काशीनिवासी राधे महाराज। &lt;br /&gt;बारात वाला दिन। घर पर भीड़ बढ़ चुकी थी रिश्तेदारों की संख्या में ढ़ाई गुना इज़ाफा, घर पर तकरीबन अस्सी रिश्तेदार मौजूद थे। हर चीज़ के लिए अपनी बारी का इंतजार करना पड़ रहा था। चाहे बात फ्रेश ब्रश करने की हो, या फिर चाय नाश्ते की ही क्यों न हो। माहौल काफी कंजस्टेड हो चुका था। धीरे धीरे शाम हो चली थी। और बारात चढ़ने का समय करीब था। &lt;br /&gt;मौका पाकर चौका मारने पंडित जी पधार चुके थे। इतने सारे रिश्तेदार देखकर पंडित जी की बांछें खिल गईं। मन ही मन जेब गरम करने के तरीके सोच रहे थे पंडित जी। आते ही आते रिश्ते में मेरे एक अंकल के हाथ टटोलने लगे। क्योंकि पिछली दफा उन्हीं अंकल से काशीनिवासी को बोनी हुई थी। मंशा इस बार भी कुछ ही थी । अरे जजमान इस बार तो आपके हाथ में एक नई रेखा जन्मी है। जो आने वाले 20 सालों तक आपके हाथ में राजयोग दिखा रही है। अंकल उनकी चालाकी से अंजान किंतु बेहद खुश। विदेश जाने का भी योग अतिशीघ्र बन रहा है। अंकल और खुश। पिछले 30 सालों से विदेश जाने की ही रट लगाए थे। हरबार पासपोर्ट और वीसा की दुहाई दिया करते थे। लेकिन इस बार तो पंडित जी ने उस पर हामी भी भर दी थी। और इस तरह पंडित जी की दिन की शुरुआत 251 रु से हो गई। देखा देखी में कई और लोग हाथ बढ़ाने लगे, फिर पंडित जी का वही पुराना प्रपंच शुरु हो जाता। मालूम हो कि कदाचित तामलोट महाराज लग्न मंडप में बैठने से पहले ही अपनी धोती काफी गरम कर चुके थे। जेब तो थी नहीं धोती में खूंट बांधकर पैसे रख रहे थे। खैर पुजापे का समय फिर चालू होता है। फर्जी ज्ञान के अंधकार में दिया जलाए बैठे पंडित जी पाल्थी मारकर मंडप में विराजमान होते हैं। वर-वधू तैयार हैं एक सात फेरे लेने के लिए और एक दूसरे को माला पहनाने के लिए। इतने में दूल्हे राजा के कानों में कुछ बुदबुदाने लगे पंडित जी। मैं समझ न पाया । लेकिन कुछ समय बाद दूल्हे के पिता की जेब से जो दान दक्षिणा बाहर आ रही थी। वो इस बात को चरितार्थ कर रही थी कि राधे महाराज ने क्या कहा होगा दूल्हे के कान में। कार्यक्रम आगे बढ़ता है। और वही पुराने मंत्रोच्चार जो एक दिन पहले मैं सुन चुका था । उन्ही की सीडी एक बार फिर रिपीट अवस्था में सुन रहा था। कई बार तो ऐसा होता कि न तो दूल्हे को मंत्र समझ आ रहे होते और न ही मुझे। पता नहीं कौन सी किताब पढ़ रहे हैं पंडित जी। सवालिया निशान तो बहुत सारे थे ।लेकिन टोकना उचित नहीं समझा। आखिर रिश्तेदार की शादी थी । गुस्से में कहीं उल्टे मंत्र पढ़ दिए तो पता नहीं क्या गजब हो जाए। और फिर दूल्हा ही जब इंटरफियर नहीं कर रहा तो मैं क्यों भांजी मारता। और हां एक बात तो बताना भूल ही गया इस बीच पंडित जी की करतूत जारी थी । वही बढ़ते मंत्र और बढ़ता पैसा। समय बीतता गया । पंडित जी का खूंट गर्म होता गया। अब तक तो लंबी चपत लगा चुके थे, सत्यानासी महाराज। &lt;br /&gt;फेरों का कार्यक्रम समाप्त होता है। लेकिन पंडित जी का नहीं । वो वैसे ही जजमान नाम के एटीएम से गांधी जी बाहर निकालते रहे। &lt;br /&gt;कहते हैं लालच बुरी बला है। लेकिन शायद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधेश्याम उपाध्याय के घर का नाम बर्बाद गुलिस्तां ऐसे ही थोड़े ही रखा था मैंने। क्योंकि उनके हालात भले ही सही हों लेकिन लोगों की हाय ले चुके महाराज की फैमिली में ऐसा कोई नहीं था जो समाज की ठेकेदारी न करता हो। सब एक से बढ़कर एक खुराफाती । पंडित जी कमाते थे और बीवी-बच्चे लुटाते थे। दूसरों को नोच-नोच कर प्लॉट बनाने वाले पंडित जी पता नहीं कब सुधरेंगे। ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन ये जरुर कहा जा सकता है। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाए।&lt;br /&gt;जो इतिहास काली स्याही से लिख दिया गया हो वो भला कैसे मिट सकता है। पंडित जी के साथ भी कुछ ऐसा ही था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-7065777948341680563?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/7065777948341680563/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=7065777948341680563' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7065777948341680563'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7065777948341680563'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='सत्यानासी काशी निवासी'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-759158450980374977</id><published>2009-04-15T06:31:00.000-07:00</published><updated>2009-04-15T06:41:06.353-07:00</updated><title type='text'>दइया रे दइया ‘बदल गई वो’</title><content type='html'>छरहरी काया, इठलाता बदन, बिल्कुल हिरणी के जैसा। आंखों में तीर सा चुभने वाला शार्प सा काजल, होंठों पर गुलाब की झलक। एक दम मादक सी हंसी। और उस पर गालों में पड़ने वाला भंवर। ओफ्फो एक अनूठी याद थी वो। लगता था कुदरत ने सारी फुरसत उसी पर उड़ेल दी हो। उसके बदन का हर एक पार्ट बड़े करीने से सजाया था खुदा ने। उस हूर का नूर कुछ ऐसा ही था। बस जहां से निकल जाए। हाएतौबा मच जाए। मार ही डालोगी, मर जांवा गुड़ खाके, मेरी दुकान पे आना मेरी जान, जैसे कमेंट उसे मिला करते थे । लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। पता नहीं कौन सी मिट्टी से बनी थी। सबको कतार में ही रखती थी। किसी की सीट कंफर्म ना की उसने । और एक दिन न जाने कौन लंगूर उसे ले उड़ा। किसी को हवा तक न लगी। क्योंकि जिन गलियों से वो निकलती वहां से अब उसके बदन पर लगे इत्र की सुगंध भी न आती थी। कई दिन हो गए । लोग इंतज़ार करते करते थक गए। कि न जाने वो लाल दुपट्टे वाली कहां चली गई। उसी की राह तकते तकते छोटे की सात आठ चाय हो जाया करती थीं। लेकिन अब तो छोटे की दुकान भी सूनी सूनी रहती है। सब ऐसे उदास रहते जैसे उनकी अर्धांगिनी उन्हे किसी पराये मर्द के साथ भाग गई हो। पप्पू भइया तो उसके ग़म में ऐसे दीवाने हुए कि रामप्यारी का सेवन करने लगे। रात को जब उसका इंतजार करके घर लौट रहे होते तो कभी कभी हम लोग मिल जाया करते थे । बस शुरु हो जाती थी फ्रस्ट्रेटेड लवर की फ्रस्ट्रेटेड लव स्टोरी। यार वो चली गई। उसका इंतजार करते करते मेरे घर का बजट बिगड़ गया और वो है कि बिना बताए चली गई। हाय री बेवफा सनम। पप्पू की हालत देख कर एक जुमला बिल्कुल फिट बैठ रहा था। कि ‘पुतलियां पथरा गईं , और गर्क चहरा हो गया, डाल दो मुंह पर कफन, कह दो कि पर्दा हो गया’ । बेहद बुरे दौर से गुजर रहा था पप्पू। खैर रात गई बात गई। होली के आसपास की बात है। वो दिन हम सभी मित्रों को हमेशा याद रहेगा । सब रंग खेल रहे थे । छोटे की दुकान पर एक बार फिर जा पहुंचे । यादों को ताजा करने क्योंकि फिछली होली मैं भी घर नहीं जा पाया था। सो इस बार हम सब फिर साथ थे । पप्पू भी मौजूद थे। सब बेहद खुश थे। पुरानी यादें ताजा कर रहे थे। कि अचानक पड़ोस वाले मकान पर नज़र गई। उस मकान की छत पर लोग काफी लोग मौजूद थे। और उनके बीच मौजूद थी वो हुस्न ए बहार। शादी के बाद पता नहीं कब वापस आई। किसी को न पता चल पाया। सबकी निगाहें ऊपर ही थीं । टकटकी लगाए बस सारे के सारे छैला बिहारी निहारे चले जा रहे थे। इतने में वो नीचे उतर आई अपनी पुरानी सखियों के साथ। लेकिन जैसे ही वो नीचे आई। सबको झटका लगा। क्योंकि जिस हुस्न ने गली के 20 नौजवानों को मजनू बना दिया वो वो हूर कुछ और ही हो गया था। और अनायास ही पप्पू के मुंह से प्रस्फुटित हुआ ‘दइया रे दइया बदल गई वो’ । जिसकी जवानी के चर्चे चहुंओर से । वो शादी के बाद क्या हो गई। न तो वो छरहरी काया ही रही । न वो काजल । न वो गुलाब सी हंसी । सबकुछ मुरझाया सा लग रहा था। सब चकित थे । और एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे। क्योंकि पहले तो उसकी त्वचा से उसकी उम्र का पता ही न चलता था । और अब है कि उम्र ही उम्र नज़र आती है। मेरा तो मन मान ही न रहा था । कभी मैदा की भेंड़ रही उस मनचली का रंग भी डाउन हो गया था। चूंकि पप्पू तो नशे में चूर था । और सब जानते हैं नशे में आदमी शेर होता है । किसी बात का डर नहीं होता। रोक ही लिया लड़की से आंटी हो चुकी श्रीमती जी को। एक ही सांस में सैकड़ों सवाल दाग डाले। और ये भी कह डाला हम से ही सेट हो जातीं तो क्या बिगड़ जाता । चली गईं लंगूर के पास। अब भला लंगूर की सोहबत में कोई इंसान रह सकता है क्या ? हीहीही....रामप्यारी का जोरदार भभका और फिर ये हंसी। और अचानक एक जोरदार साउंड। चांटा जड़ने का । बेचारे पप्पू का गाल हरे से गुलाबी हो गया। सब तितर-बितर हो गए उस एक विस्फोटक चांटे की बदौलत। लेकिन जिस चांटे का कहर पप्पू पर पड़ा। वो टस से मस न हुआ। नो डाउट ही वाज़ ए ब्रेब पर्सनालिटी। और फिर गिरते हैं शह सवार ही मैदान ए जंग में। लेकिन कुछ देर के लिए वातावरण शून्य हो गया था। लेकिन पप्पू की बात में वाकई सच था । उसकी ज़ुबान से उस दिन निकला एक एक शब्द उसकी उस व्यथा को बता रहे थे। जो उसने विरहा में बिताए थे। आज अचानक उसे देख मन का सारा गुब्बार सामने आया । जिसका रिज़ल्ट चांटे के रुप में पप्पू के गालों पर साफ दिखाई दे रहा था। खैर जो भी हो । वो वाकई अब वैसी नहीं रही थी । जिसकी बदौलत छोटे चाय कार्नर की का लाभ कभी-कभी 9000 रु प्रति माह को पार कर जाता था। उसके इंतजार में लोग चाय की रेलमपेल जो मचा देते थे। लेकिन फिर वही बात अब वो दिन कैसे लौटेंगें। अब लोग उसका इंतज़ार बिल्कुल नहीं करेंगे। क्योंकि ज़माने लद गये, जब पसीना गुलाब था, अब मलते हैं इत्र, पर बदबू नहीं जाती। और उसकी काया वाकई बदल गई है। सोच कर हैरत सी होती है। और लगता है अब किसी और का इंतज़ार करना पड़ेगा। लेकिन दुआ भी करनी होगी कि अब दइया रे दइया न हो। औऱ पप्पू की कोई घरवाली हो जाए। &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-759158450980374977?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/759158450980374977/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=759158450980374977' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/759158450980374977'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/759158450980374977'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/04/blog-post_15.html' title='दइया रे दइया ‘बदल गई वो’'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-8340062000145471509</id><published>2009-04-10T04:37:00.000-07:00</published><updated>2009-04-10T04:39:41.084-07:00</updated><title type='text'>मिडिल क्लास भगवान</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;बारि मथे घृत होई, सिकता ते बरु तेल,।&lt;br /&gt;बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धांत अपेल ।।&lt;br /&gt;महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस के उत्तर कांड में इन पंक्तियों का ज़िक्र किया है। जिसका अर्थ है कि हवा को मथने से घी बन सकता है, और रेत से तेल निकल सकता है, लेकिन बिना ईश्वर को याद किए इंसान इस भवसागर रुपी संसार को पार नहीं कर सकता। यानि ईश्वर ही सब कुछ है। इसके बगैर इंसान कुछ नहीं। लेकिन बदला ज़माना, बदला परिवेश, बदले चेहरे, और बदल गया चरित्र । अब भवसागर पार करने के लिए भगवान की नहीं, दो घूंट बाटली की जरूरत होती । औऱ खुद आदमजात खुदा हो जाता है। इस खुदा को अगरबत्ती नहीं सिर्फ चार कश श्वेत दंडिका के चाहिए वो भी सुबह सुबह। अर्ली मॉर्निंग। आखिर प्रेशर का सवाल है। ये खुदा अब तकिया छोड़ अखबार पढ़ने को बेताब है। जल्दी जल्दी सारी ख़बरें चाट लेंते हैं, न जाने कितने चटोरे हैं भगवान। और इसी बीच चाय समोसे हो जाएं फिर तो समझो भगवान की लॉटरी लग गई। ओए होए मजा ही आ गया (ये भगवान की फीलिंग है मेरी नहीं) । मजे की बात ये भगवान मिडिल क्लास हैं। मतलब जिनकी मार कभी कभी राक्षस भी लगा जाते है। तो छोटे मोटे राक्षसों पर विजय पाकर ये भगवान अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं। इन भगवान की एक धर्मध्वजा भी हैं। वो और देवियों की तरह शर्मीली सी नहीं दिखतीं कैलेंडर में। वो बेहद आधुनिक हॉट एंड सेक्सी दिखने की होड़ में कभी कभी मार्केट चली जाती हैं। तो बेचारे भगवान की दो जून की बाटली पर ही बन आती है। मिडिल क्लास भगवान की मिडिल क्साल धर्मध्वजा। वैसे भगवान की फैमली का ये छोटा सा लेखा जोखा था। खैर अब चाय समोसा हो चुका । टाइम है आवारागर्दी करने का । एक बात और इन दिनों ये मिडिल क्लास भगवान भी मंदी की चपेट में हैं। सो स्वर्ग लोक से धक्का देकर इन्हे कहीं और ही भेज दिया गया है। इस समय खाली हैं। जिन कपोलों पर कभी लालिमा सी हुआ करती थी । वो कपोल अब रामचंदर सूखे के गालों की तरह गर्त में जा चुके हैं( रामचंदर एक बहुत ही सूखा सींक सा व्यक्ति, ये व्यक्ति सिर्फ हमारे शाहजहांपुर में ही पाया जाता है ) । चूंकि दौरे आवारागर्दी है। लेकिन भगवान हैं। इज्जत का सवाल है। लोग टोंकेंगे कि कैसे भगवान हो खाली रहते हो। बस इन्ही सब वजहों से आजकल साइडबिजनेस और लोगों पर फर्जीवाड़े का रौब झाड़ने के लिए बमपुलिस की जमादारी का टेंडर हाथ में ले लिया है। छोटे मोटों को हड़का कर दाम कमा लेते हैं। और हाफटाइम ही काम करके घर लौटने की चिंता सताने लगती है। इस हाफटाइम में भी पूरी हरामखोरी रहती है। खैर भगवान का अब घर लौटने का समय हो चुका है । बेहद कम पैसे लेकर लौटे भगवान को इस बात का ज़रा भी इल्म ना था कि आज उनकी बेलन से मार होने वाली है (ध्यान रहे, कि भगवान कभी अंतर्यामी थे, उन पर कोई संकट आने वाला होता तो उन्हें पहले से ख़बर लग जाती, लेकिन मंदी के दौर में हाइकमान ने उनसे ये ताकत भी छीन ली, जिसके चलते उनकी अंतर्यामी होने की ताकत जाती रही)।और वो ख़तरे को भांप ही न सके जो उन पर आने वाला था। घर के दरवाजे खुलते हैं। आवारागर्दी के दौरान कुकर्म किए वो मुंह से महक के रुप में वापस आ रहे थे । घर में घुसे ही थे कि गालियों की बौछार से कैलेंडर वाली माता ने उनका स्वागत किया। आ गए पीके। कुत्ते, कमीने हरामजादे। घर में नहीं खाने को, और अम्मा चलीं भुनाने को । घर में ढेला नहीं है और तुमने दारु की अती कर रखी है। कम्बखत कहीं के । बड़े आए भगवान बनने । इसी दौरान एक बेलन भी फेंक कर मार दिया। जैसे तैसे खोपड़ी झुकाकर बच पाए मिडिल क्लास भगवान। दौर ए अब्यूज़ जारी है। कैलेंडर वाली माता कहती हैं, हमें तो एक साड़ी कभी न लाकर दी। खूंटी देवी पर तो बड़े मेहरबान होते हो। सारी ख़बर मुझे पता चल चुकी है। दिन में कहीं और रात में कहीं और । तुम्हारे सारे कुलच्छनों का चिट्ठा मेरे पास है। अगर आइंदा से मेरी सौतन के पास गए तो तुम्हारे प्राण हर लूंगी (मालूम हो कि स्वर्ग में भी महिलाओं की तरह देवियों को आरक्षण दिया गया है, इस आरक्षण की वजह से कैलेंडर वाली माता की सारी दिव्य शक्तियां अभी तक बरकरार है, यही कारण है कि उन्होंने भगवान से प्राण हरने वाली बात कही) । खैर जैसे-तैसे प्राणों की प्यासी कैलेंडर वाली माता से छुटकारा मिला । अगेन गम गलत करने ठेका कच्ची शराब की दुकान पर जा पहुंचे। एक पाउच में ही टल्ली हो गए। पहले से जो पी रखी थी। कैलेंडर वाली माता के सदमे से उबरने के लिए और दिल की भड़ास निकालने के लिए, लोगों को गलियाने लगे । पब्लिक प्लेस पर दारू और ऊपर से गलियाना किसी बडी़ मुसीबत को दावत देने जैसा ही था। एक बार फिर याद दिला दें कि ये भगवान अपनी सारी शक्तियां खो चुके हैं, जिसके चलते उन्हें ये अंदेसा ही नहीं रहा कि वो किस मुसीबत में फंसने वाले है। पुलिस आई और बजाए चार पांच बेंत पिछवाड़े पर। अब भगवान लगे गिड़गिड़ाने। कैलेंडर वाली माता की दुहाई देने लगे। रिश्वतखोरों ने कुछ ले देकर छोड़ दिया। भगवान सोच रहे थे । आज ससुरा कुछ दिन ही अच्छा नहीं है। पहले धर्मध्वजा से पिटा और अब पुलिस से। अभी भी मानने को तैयार नहीं एक बीड़ी का बंडल खरीद ही लिया। घर के बाहर खड़े होकर आसमान में देखने लगे । सोच रहे थे कि शायद हाइकमान से बुलाबा आ जाए और मेरी स्वर्ग में फिर से बहाली हो जाए। इतने में उनके पुराने दोस्त रहे मान न मान मैं तेरा मेहमानाचार्य ऋषी टपक पड़े। कष्ट से घिरे भगवान को देखकर दारुण हो उठे। बोले भगवन अगर आप कहें तो में दुश्कर्मा जी से बात करुं वो ही आपकी बात ऊपर तक पहुंचा सकते हैं ( आपको पता होना चाहिए कि गर्मी के मौसम में मान न मान मैं तेरा मेहमानाचार्य ऋषी हमेशा छुट्टी पर निकलते हैं, इसी दौरान घूमते हुए उन्हे उनके पुराने मित्र मिले,&amp;shy; ऋषी काफी सोर्स फुल हैं, अपनी पंडिताई के बल पर इन्होंने परलोक में एक नया फ्लैट लिया है वो भी कैश इन हैंड देकर) । उधर मिडिल क्लास भगवान पर कृपादृष्टि करने को आतुर ऋषी ने इतनी देर में कई सुझाव दे डाले। लेकिन उन्हे कोई रास न आया । उन्हे तो बस एक ही धुन थी। कि कैसे भी उनकी वो ताकतें वापस आ जाएं। जो खो चुकी थीं। लेकिन मंदी से त्रस्त स्वर्ग लोक उनका नाम रजिस्टर में लिखने को तैयार ही न था। क्योंकि भगवान की लतों के बारे में सब जानते थे । उनका खर्चा कौन संभालता। जब स्वर्ग लोक में थे तो बिल्कुल कुंवर साहब बनकर रहते थे उस समय कपोल भी लाल-लाल टमाटर से थे। एक दम हस्ठ पुष्ठ। मिडिल क्लास भगवान। अब कोई सुनवाई को तैयार न था बेचारे कुंवरसाब की कहने का मतलब है भगवान की सुनवाई को कोई तैयार नहीं था। अपनों में बेगाने से नज़र आते थे। हर कोई दुश्मन लगता था। लेकिन समझने वाली बात ये है वो तो भगवान थे । लेकिन हम तो आम हैं ऐसे में हमारी क्या दुर्दशा होती। जब भगवान ने भगवान को न छोड़ा तो हमारी क्या औकात। इसलिए ज़रा संभल कर भगवान बनने की कोशिश करें। नहीं तो खुदा के फेर में ज़िंदगी से जुदा न होना पड़ जाए। जय बजरंग बली।      &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-8340062000145471509?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/8340062000145471509/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=8340062000145471509' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/8340062000145471509'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/8340062000145471509'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/04/blog-post_10.html' title='मिडिल क्लास भगवान'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-712848448640230924</id><published>2009-04-08T01:19:00.000-07:00</published><updated>2009-04-09T01:46:52.016-07:00</updated><title type='text'>भाषा तो ऐसी होती है  (शाहजहांपुर के गंवार से दिल्ली की ‘खड़ी बोली’तक)</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;सतत्, निरंतर, लगातार, यही परिभाषा है समय की। जो न कभी थकता है, न किसी का इंतज़ार करता है, और न ही किसी का मोहताज है। सबको इसी के हिसाब से चलना पड़ता है। मिट्टी की खुशबू हमेशा ज़हन में बसी रहती है सो आज भी वही सुगंध एक बार फिर हिलोरें मारने लगी। और खुशनुमा मौसम ने उस सुगंध और भी महक उड़ेल दी है। कुछ लिखने का मन करने लगा, सोचा बदलते मौसम के साथ, “भाषा और बदलते परिवेश” पर ही लिख दूं। ये सफर शाहजहांपुर से दिल्ली तक की कहानी बयां करता है। कि दिल्ली आया एक युवा समय के बदलाव का कैसे शिकार हुआ। चलिए पहले आपको शाहजहांपुर लिए चलते हैं। दिल्ली से 330 किलोमीटर दूर ये शहर मुगल कालीन सभ्यता का परिचायक शहर रहा है। इस शहर को क्रांतिकारियों का शहर भी कहा जाता है। रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह और अशफाक उल्ला जैसे क्रांतिकारियों की कर्मभूमि रही है शाहजहांपुर की मिट्टी। भाषा भी बेहद निराली है यहां की । अगर बड़े बूढ़ों के बीच बैठ जाएं तो जो गंवई अंदाज़ ए बयां होता है। वो वाकई अनूठा अहसास कराता है। और यदि शहर से सटे गांव चले जाएं तो और भी आनंदमंगल । गांव के एक स्कूल में एक बहनजी (बीएड-बीटीसी मार्का) बच्चो को पढ़ा रही हैं। अब सुनिए शहर की बहन जी और गांव के बच्चों के बीच संवाद। हाजरी का समय है। सारे बच्चे अपने नाम का इंतज़ार कर रहे हैं। कुछ कपड़े पहने हैं तो कुछ बिचारे नंगे पुंगे हैं, बिना नहाए धोए स्कूल में बिछी टाट पर आकर बैठ जाते है। हाजरी शुरु होती है। रामलाल, जी बहिनजी। कल्लू, जी बहिन जी। कलट्टर, आए हैं बहिन जी कहूं गए हैं ( कलट्टर की गैरमौजूदगी में संतरा बोलीं) । संतरा एक लड़की का नाम। हाजरी जारी है। दरोगा, जी मदम ( अंग्रेजी बोलने की पुरजोर कोशिश की दरोगा ने फिर भी मैडम को मदम ही बोल पाया) । कथा, जी बहिन जी। रुमाली, जी बहिन जी। हाजरी लगती रही। इसी बीच कलट्टर आ गए जो हाजरी के दौरान गायब थे। बहिन जी ने पूछा कहां रई गए थे( कहां रह गए थे)। कहूं नाई बहिन जी हमारे गोरु कहूं भाजि गए थे(कहीं नहीं हमारे जानवर कहीं भाग गए थे) । उन्हई का पठऊन गए थे घरई ( उन्हे घर भेजने गए थे) । गोरू चरइयू कि पढ़ियऊ भी ( जानवर ही चराते रहोगे या पढ़ोगे भी) । बहिन जी बप्पा नाई मान्त का करईं ( बहिन जी बाप नहीं मानते क्या करें)। भोर होत से बहिरार भेजि देत, हम घास छोरईं की पढ़ईं, तुमई बताबऊ (सुबह होते ही मुझे घास छीलने के लिए खेत पर जाना होता है तुम ही बताओ घास छीलूं की पढूं)। सो ता हइय ( बहिन जी ने सिर हिलाते हुए कहा ये तो है ही) । इस बीच हाजरी एक बच्चे की तो रह ही गई। नाम था नपोरा। तो बहिन जी बोली नपोरा का संबोधन करते हुए नपोरा । चेहरे पर सत्तर तरीके के बल पढ़ गए बहिन जी के । जी बहिन जी(यानि नपोरा प्रेजेंट) अब नपोरा को बुलाया गया अपनो नाम काहे नाई बदलबाऊत। नाई बहिन जी हमारी अम्मा ने रखो। हम नाई बदलबईं। चलऊ अपने बप्पा का पठऊ । उनसे कहिई कि कहूं अइसो नामऊ होत। नपोरा अपने पापा को बुला लाता है। जी बहिन जी का बात है। देखऊ नपोरा गारी होत अऊ तुम जा नाम को बदरबाबऊ। नाई तउ नाम काटि दौ जइही( बहिन जी ने धौस दिखाते हुए हड़काया कहा नपोरा गाली होती है, नाम बदलबाओ नहीं तो नाम काट दिया जाएगा) लेकिन नपोरा के बापू कहां मानने वाले थे। कहते हैं, नाई बहिन जी हम कतई नाई नाम बदरिहीं, नाम चाहे रहई या नाई रहई( हम नाम कतई नहीं बदलेंगे, नाम चाहें कटे या बच रहे) हें नाई तौउ (हा नहीं तो) बचपनई मां नाम रक्खि लओ( छोटे पर से ही नाम रख लिया था) । सारे गौंतरिया नपोराई कहत( सारे रिश्तेदार उसे नपोरा ही कहते हैं)। हम नाई बदरिहीं कतई ( हम नहीं बदलेंगे कतई)। और आखिर उसका नाम नपोरा ही रहा वो आज काफी बड़ा हो चुका है लेकिन वो आज भी नपोरा ही है। ये सब सुनकर एक अद्भुत अनुभव की प्राप्ति हो रही थी । क्योंकि जो शब्द संचार मैं स्कूल में सुन रहा था, वही शब्द संचार मैं अपने दादी, बाबा, पापा और मित्रमंडली से करता था। वही ठेठ गंवई अंदाज़। मजा आ जाता था सचमुच। और मिट्टी की खुशबू तो आपको पता ही है कैसी होती है। “देश की माटी माटी चंदन, मस्तक इसे लगा लें हम”। लेकिन उस गंवई भाषा ने भी बदलाव का दौर देखा । मैं दिल्ली पहुंचा, द्रुतगामी गति से चलने वाली मीडिया का पत्रकार बनने। इस दौर ए पत्रकारिता ने मेरा भाषा संचार कुछ ऐसा कर दिया कि बस पूछिए मत। जो शब्द कभी “हम” हुआ करता था वो “ मैं” में बदल गया, “आप” बदल गया “तू” में। खड़ी बोली का ऐसा भूत सवार हुआ कि अब जब घर पहुंचता हूं तो बमुश्किल ही गंवई अंदाज़ बाहर आ पाता है। बिल्कुल बनावटी सा। मजे की बात तो ये है कि यही दिल्ली मेड भाषा अब गले का हार बनकर सोभायमान होती है । डिलाइट्स के बीच ये भाषा मुझे उन जैसा ही बनावटी बना देती है। छोले कुल्चे सी टिकाऊ ये भाषा बदलते परिवेश के बीच मुझे वो ताकत देती है कि अब मैं उनके बीच ठगा सा नहीं महसूस करता । जब शुरु में दिल्ली आया तो लोग बड़ी आसानी से मेरी भाषा को पहचान लेते थे कि बेचारा कहीं यूपी व्यूपी का होगा । ठग लोग साले को। और कई बार भाषा के चलते ठगा गया। कभी अपनों से तो, कभी परायों से। लेकिन आज पूरे पांच साल का अनुभव हो चुका है इस दिल्ली मार्का लैंग्वेज का । यानी पूरा पोस्ट ग्रेजुएट कर चुका हूं, इस भाषा में, देखते हैं अब कौन ससुरा ठगता है। अब तो मैं ही ठग लूं ससुरों को। लेकिन बनावट के तड़के से लबरेज इस भाषा में वो स्वाद नहीं है। जो मेरी ठेठ गंवई भाषा में था । आज भी उन शब्दों में बातें करने को कसमसाता हूं। कि काश कोई अपना मिल जाए, और बदलते परिवेश में मुझे अपनों सा अहसास करा दे। और फिर वही गांव का स्कूल याद आ जाए। वो बहिन जी जो अब मां जी हो चुकी होंगी, वो कलट्टर जो चपरासी भी न बन पाया होगा, वो संतरा जिसके छिलके छिल कर सूख चुके होंगे और वो नपोरा जो आज भी नपोरा ही होगा। शायद समय के कुछ परिवर्तन से बदले होंगे लेकिन फिर भी वैसे ही होंगे। आज के लिए इतना ही। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-712848448640230924?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/712848448640230924/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=712848448640230924' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/712848448640230924'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/712848448640230924'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/04/blog-post_08.html' title='भाषा तो ऐसी होती है  (शाहजहांपुर के गंवार से दिल्ली की ‘खड़ी बोली’तक)'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3157405201009456373</id><published>2009-04-07T04:32:00.000-07:00</published><updated>2009-04-07T04:36:48.162-07:00</updated><title type='text'>“जूता” पहनो तो लाइसेंस जरूरी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;छोटा सा था । बस ये समझें, जब पैदा ही हुआ था। कोमल से पैरों में, मां ने पहनाया था। ऊन से बुना जूता, ताकि मेरे पैरों की कोमलता बरकरार रहे । मोजे से दिखने वाले वो जूते जब गंदे हो जाते थे, तो मां उन पर पॉलिश न करके,निरमा से धो देती थी । दिन में कई बार गंदे हो जाते थे वो जूते। लेकिन इसका भी इंतज़ाम था । कई जोड़ी जूते थे मेरे, पास ऊन से बुने हुए, रंग बिरंगे से। कई बार बदलती थी मां दिन भर में। कई बार तो, वो जूते कपड़ों से मैच हो जाया करते थे । मैं छोटा सा तो था ही बोल पाता नहीं था ,बस कुदरती मां मां ही मुंह से निकलपाता था । मैं जब उन्हे देखकर खुश होता तो मां भी मुझे वात्सल्य देती ।धीरे-धीरे बड़े होने का समय भी आया और न जाने कब वो छोटा सा “नंदू” (घर पर सब मुझे नंदू बुलाते हैं) 5 फिट साढ़े दस इंच का फुल साइज़ युवा हो गया । साइज़ बढ़ा था । तो जूता भी बढ़ना था । एक नंबर से आठ नंबर तक पहुंचने में 16 साल लग गए। अब ये जूता कुछ ऐसा हो चुका है, कि ठक ठक का साउंड पल्यूशन भी करता है। जब पानी पड़ जाए तो यही ठक-ठक, चर्र-चर्र होने लगता है । बेहद मजबूत बाटा का जूता, हिलाए से न हिले, बहुत दिनों से यही पहन रहा हूं। रंग भी काला है, मेरा वेरी फेवरेट कलर,आज ये आठ नंबर का जूता वाकई रौबीला सा अहसास कराता है। जहां से निकलता हूं, बस लोग देखते रह जाते हैं, कि “एक्खें कुंवर साब आ रहे हैं” । अपने दोस्तों के बीच इस जूते ने बहुत सम्मान सा दिलाया, मजा तो तब आया जब एक दिन ये किसी पर बज गया, मतलब वफादार ने निभाई वफादारी,उस दिन तो वाकई मैं निहत्था था सिर्फ जूते का सहारा था, बस जूते ने इज्जत बचा ली। इतना ही नहीं इस जूते से बड़े महान काम भी होते हैं। समाज को सुधारने के अपना विरोध जताने के, लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने को हाइलाइट करने के दरअसल सात अप्रैल 2009 को एक बार फिर जूता चला (मेरा नहीं किसी और का), निशाने पर थे चिदंबरम साहब और निशानेबाज़ थे सीनियर पत्रकार जरनैल सिंह सभी ने देखा कि किस तरह चौरासी के दंगों पर आई सीबीआई रिपोर्ट के विरोध में ये जूता चला। जूता चलने का इतिहास बेहद पुराना है ,अफगानिस्तान को ही ले लें वहां तो विरोध जूता चलाकर ही दिखाया जाता है।लेकिन जरनैल जी इंस्पायर्ड थे उस ईराकी पत्रकार से, जिसने बुश पर जूता चलाया था उस दिन भी जूता विरोध के स्वर बोल रहा था। लेकिन सोचने वाली बात ये है, कि चमड़े से बना ये “मृत जूता” कितना और बोलेगा विरोध के स्वर, क्या लोकतंत्र के रहनुमा, ऐसे ही जूते का फायदा उठाएंगे, जूते को एक हथियार बनाएंगे,कहीं ऐसा न हो जाए,कि जूता पहनने वालों के लिए एक दिन लाइसेंस कम्पलसरी हो जाए। और जूता खरीदने के लिए पहले आरटीओ के चक्कर लगाने पड़ें। इतिश्री फिलहाल।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3157405201009456373?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3157405201009456373/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3157405201009456373' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3157405201009456373'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3157405201009456373'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/04/blog-post_07.html' title='“जूता” पहनो तो लाइसेंस जरूरी'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-1478701930052365964</id><published>2009-04-07T01:50:00.000-07:00</published><updated>2009-04-07T01:53:48.679-07:00</updated><title type='text'>बड़ा महंगा है ये रब, जो “तुझमें दिखता है”</title><content type='html'>&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;&lt;strong&gt;पीढ़ी बदल चुकी है। आदिकाल नहीं रहा। बेचारे नंगे पुंगे वो लोग जो पत्तों से अपने तन को ढका करते थे । सिलाई मशीन से सिले कपड़ों के दिवाने हो चुके हैं। वो खेतिहर मजदूर भी नहीं रहे जो अपने जीवन यापन के लिए जानवरों पर निर्भर होते थे, जानवरों से खेती करवाना उनका शिकार करना, उनके पेट की छुदा को शांत करता था। और उससे मिली ताकत से खुद ही यदा कदा खेतों में बैल की तरह काम किया करते थे। आधुनिकीकरण के इस युग में ट्रैक्टर ट्रॉली, थ्रेशर, आदि आधुनिक यंत्र उनका रुप ले चुके हैं। लेकिन समय का बदलाव ऐसे ही जारी रहता है । हर किसी को अपने तौर तरीकों में परिवर्तन करना पड़ता है। और शायद यही परिवर्तन उसे जीने के मायने समझाता है। आज आधुनिकता का दौर कुछ यू है। कि बगैर महिला मित्र इंसान अपने को अधूरा समझता है। उस महिला मित्र को जवां पीढ़ी परिवार से ऊपर भी ओहदा दे देती है। बाप, पाप हो जाता है। मां न जाने कहां खो जाती हैं। घरवाले, बाहरवाले हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही होता है जब मुहब्बत का जुनून सर चढ़कर बोलता है। लेकिन मजा तो तब आता है। जब मोहब्बत का ये भूत, महबूबा में अपने रब को देखता है। “तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करुं  सजदे सिर झुकता है यारा मैं क्या करुं” सभी ने सुना होगा। यानी महबूबा में दिखा भगवान। जो ले लेता है प्राण। प्राण कैसे  लेता है वो भी समझिए ! इस रब को चाहिए मैकडॉन्ल्ड्स का बर्गर, कोल्ड ड्रिंक्स, पिज्जा हट का पिज्जा, बनाना लीफ की थाली, हफ्ते में एक बार डिस्को थेक की थिरकन, मल्टीप्लेक्स में एक चलचित्र-वो भी गोल्डन लेन में, महंगे डिजाइनर शोरुम्स से सूट्स वो भी बगैर छूट, बाइक पर लॉंग ड्राइव, कभी कभी सड़क पर खड़े खोमचों का स्वाद, प्रिन्स पान वाले का महंगा पान, वोडका के दो दो पैग (मालूम हो कि रब सिर्फ वोडका सेवन करते हैं) वो भी किसी धांसू बार में । वाकई बड़े महंगे पड़ते हैं ये रब। खून चूस लेते हैं, फिर प्राण क्या बचेंगे खाक। इसलिए ऐसे रब से सावधान। वरना आदिकाल कहीं वापस न आ जाए। और फिर वही तंगी आपको नंगा न कर दे । और आप मजबूर हो जाएं पत्ते पहनने को। &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-1478701930052365964?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/1478701930052365964/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=1478701930052365964' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/1478701930052365964'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/1478701930052365964'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='बड़ा महंगा है ये रब, जो “तुझमें दिखता है”'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-2318469988839328595</id><published>2009-03-17T01:05:00.000-07:00</published><updated>2009-03-17T01:07:03.851-07:00</updated><title type='text'>श्रमजीवी-स्लमजीवी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc33cc;"&gt;उन गलियों में सड़कें नहीं होती। सड़कों के नाम पर उनके ही द्वारा बनाई गई कुछ पगडंडियां होती हैं जिनके किनारे बसता है भारत का श्रमजीवी भविष्य। टीन के नीचे सोता भारत का बहुत बड़ा तबका। ये तबका और श्रमजीवी भविष्य 24 घंटे संघर्ष में बिताता है या यूं कहें दो जून की रोटी की जुगाड़ उनसे बैलों की तरह काम करवाती है। इनके घरौंदों की हालत किसी चिड़िया के घोंसले जैसी ही समझिये, जिन पर आंधी औऱ तूफान की मार सबसे पहले पड़ती है। रात को सोते समय अगली सुबह ये भरोसा नहीं होता कि छत के नाम पर पड़ा खपड़ैल या टीन शेड उनके सिर होगा या नहीं। लेकिन वो लोग तो श्रम को जीते हैं। उनके लिए हर साल आने वाली प्राकृतिक आपदांयें मायने नहीं रखती, उन्हे तो आदत हो चुकी है, श्रम के साथ जीने की और श्रम करते-करते मर जाने की। कफन की भी चिंता करना उनके लिए बेजा होती है, । क्योंकि इनके मरने के बाद नगरपालिका जैसे सरकारी संस्थान टेण्डर जैसा जारी करते हैं, खासकर आपदाओं के समय। और ‘लाश के वास्ते’ सवारी में उनकी लाशों को भी डाल दिया जाता है। उनके साथ ये ज्यादा होता है जिनके ‘न आगे नाथ ना पीछ पगहा’ हो। महानगरों में धन्नासेठों के लिए ये लोग एनर्जी सेविंग टॉनिक का काम करते हैं, क्योंकि इन्हीं के बीच से निकलने वाला भारत का भविष्य ट्रैफिक सिगनल पर उनकी कारों के शीशे साफ करता है, पंचर जोड़ता है, न्यूटन से लेकर प्रेमचंद्र को बेचता है, और सड़क के किनारे पानी पिलाने का पवित्र काम भी करता है। अगर संयुक्त राष्ट्र की मानें तो पूरे विश्व में लगभग एक बिलियन लोग स्लमजीवी हैं। यानि ये पूरे बिलियन भर लोग अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई में ही जीवन बिता रहे हैं। मजा तो तब आता है जब इन्हीं स्लमजीवी लोगों पर डेविड मिलिबैंड मेहरबान होते हैं। और मुंबई की झुग्गियों से प्रेरणा लेकर एक ऐसी फिल्म बना डालते हैं जो ऑस्कर में आठ-आठ पुरस्कार ले उड़ती है। स्लमजीवियों पर बनी इस फिल्म के बारे में आप और हम सभी जानते हैं। लेकिन फिर भी याद दिलाना जरुरी है कि इस फिल्म का नाम स्लमडॉग था। स्लमडॉग के नाम को समझाने की जरुरत नहीं हर कोई आसानी से समझ सकता है। फिल्म की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी कि एक स्लमजीवी कैसे एक करोड़पती बन जाता है। वो भी महज़ एक रियलिटी शो के द्वारा। फिल्म अच्छी थी, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन सच्चाई से कोसों दूर थी। दरअसल जिन स्लमजीवियों के जीवन को तीन घंटों में समेटा गया उनके जीवन की सच्चाई इतनी कठिन है कि उनकी व्यथा सिर्फ वे ही जान सकते हैं। हकीकत यही है कि सतत् श्रम के साथ जीने वाले ये स्लमजीवी सिर्फ झुग्गी में रहने वाले वो लोग हैं, जो अपने अस्तित्व की लड़ाई ही लड़ रहे हैं, और जिनके अस्तित्व पर ही ख़तरा हो वो भला कैसे करोड़पती  बन सकता है। लेकिन फिर भी वो लोग जीना जानते हैं हमसे और आपसे बेहतर तरीके से। क्योंकि उनकी आशाओं का संसार टीन शेड, खपड़ैल, और तंग गलियों तक ही सीमित है।        &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-2318469988839328595?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/2318469988839328595/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=2318469988839328595' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/2318469988839328595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/2318469988839328595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/03/blog-post_17.html' title='श्रमजीवी-स्लमजीवी'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-7141521097699703676</id><published>2009-03-15T23:29:00.000-07:00</published><updated>2009-04-11T01:24:04.529-07:00</updated><title type='text'>मेरी होली तो बस ऐसी ही है</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/SeBS1a9A8vI/AAAAAAAAADo/zh4GE6N3Myo/s1600-h/ppp.gif"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5323345837273707250" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 256px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/SeBS1a9A8vI/AAAAAAAAADo/zh4GE6N3Myo/s320/ppp.gif" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc33cc;"&gt;नई सुबह, नया उजियारा&lt;br /&gt;नए से रंग, लगे हर कोई प्यारा&lt;br /&gt;दर पर दस्तक देती होली&lt;br /&gt;प्यार और ठिठोली&lt;br /&gt;इन रंगों में रंग दो सबको&lt;br /&gt;हो जाओ सब अपने&lt;br /&gt;ये रंग आज सबको रंग देंगे&lt;br /&gt;उल्लास के रंग से&lt;br /&gt;हर्ष के रंग से&lt;br /&gt;उमंग के रंग से&lt;br /&gt;तरंग के रंग से&lt;br /&gt;कुछ ऐसी ही रंगत भरती है ये होली&lt;br /&gt;ये रंग भेदभाव नहीं जानते&lt;br /&gt;वो तो बस लोगों को नए रंग में&lt;br /&gt;रंग देना चाहते हैं&lt;br /&gt;ये रंग ही नूर हैं&lt;br /&gt;जो रोशन करेंगे सारी दुनिया को&lt;br /&gt;आज ऐसी ही खुशी पूरे भारत में हो&lt;br /&gt;हर कोई गोपाल बने&lt;br /&gt;गोपी बने, ग्वाला बने,&lt;br /&gt;और बन जाए मां यशोदा, मां देवकी......&lt;br /&gt;लेकिन आज&lt;br /&gt;अधूरी मेरी होली है&lt;br /&gt;मेरी दुनिया&lt;br /&gt;बेनूर और बदरंग है&lt;br /&gt;मेरे सपनों का संसार&lt;br /&gt;आज सिर्फ एक सपना है&lt;br /&gt;मुझ पर आतंक का साया है&lt;br /&gt;खून के छीटे हैं&lt;br /&gt;जो बंदरंग कर रहे हैं&lt;br /&gt;मेरे तन को&lt;br /&gt;मेरे मन को&lt;br /&gt;मेरी आपके ही जैसी&lt;br /&gt;एक मां थी&lt;br /&gt;एक पिता थे&lt;br /&gt;एक भाई था&lt;br /&gt;एक बहन थी&lt;br /&gt;और एक छोटा बेटा&lt;br /&gt;जो अब एक&lt;br /&gt;ख्वाब बन चुके हैं&lt;br /&gt;वो आज नहीं हैं&lt;br /&gt;मेरी होली उनके बगैर होगी&lt;br /&gt;ये दर्द मुझे&lt;br /&gt;मानवता के उन&lt;br /&gt;दुश्मनों से मिला&lt;br /&gt;जो रिश्तों को नहीं मानते&lt;br /&gt;जो आतंक को जानते हैं&lt;br /&gt;जो धर्म नहीं जानते&lt;br /&gt;अधर्म को फैलाते हैं&lt;br /&gt;उनका धर्म&lt;br /&gt;तो सिर्फ लोगों की मौत है&lt;br /&gt;वो लाल रंग तो जानते हैं&lt;br /&gt;लेकिन सिर्फ खून का&lt;br /&gt;वो होली तो खेलते हैं&lt;br /&gt;लेकिन सिर्फ लहू से&lt;br /&gt;वो इंसान तो हैं&lt;br /&gt;लेकिन इंसानियत के दुश्मन हैं&lt;br /&gt;दर्द आज भी, बहुत है&lt;br /&gt;जो टीस देता हैं&lt;br /&gt;रह रह कर सताता हैं&lt;br /&gt;मेरी होली तो बस ऐसी ही है&lt;br /&gt;बस ऐसी ही&lt;br /&gt;क्योंकि मेरी होली का रंग&lt;br /&gt;लाल है&lt;br /&gt;मेरे अपनों के लहू से&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-7141521097699703676?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/7141521097699703676/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=7141521097699703676' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7141521097699703676'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7141521097699703676'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='मेरी होली तो बस ऐसी ही है'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/SeBS1a9A8vI/AAAAAAAAADo/zh4GE6N3Myo/s72-c/ppp.gif' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-803446280337721630</id><published>2009-01-17T06:07:00.000-08:00</published><updated>2009-01-17T06:09:02.821-08:00</updated><title type='text'>अलग-थलग पड़े पड़ोसी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc33cc;"&gt;26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों ने समूचे विश्व को एक बार फिर झकझोर दिया.....इस भीषण हमले में जिस देश का नाम आया वो कोई चौंकाने वाला नहीं था....यानि भारत का पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान....देश की शान पर हुए इस सबसे बड़े हमले के बाद उन चर्चाओं ने एक बार फिर ज़ोर पकड़ा जो पाकिस्तान पर इस बात को लेकर दबाव बनाती कि बस अब पानी सर से ऊपर जा चुका है......आतंक की जिस फसल को पाकिस्तान में बोया जा रहा है.......वो अब जड़ सहित उखाड़ फेंकी जानी चाहिए......लेकिन मामले को लेकर हमेशा की तरह पाकिस्तान का अड़ियल रवैया बरकरार है...पाक सरकार कहती है कि ये मुल्क ऐसा नहीं है जहां आतंक को या तो पनाह दी जाती है....या उसका लालन पालन होता है.......लेकिन मायानगरी पर हुए हमलों में जो सबूत मिले हैं वो इशारा तो पाकिस्तान की ओर ही करते हैं......खासकर इस हमले में पकड़े गए एकमात्र आतंकी कसाब को लेकर जो बात पाक सरकार ने कही है.....वो और भी चौंकाने वाली है.....कि कसाब उनकी सरजमीं का नहीं है.......इस मामले को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तल्खी इस कदर उभरी कि सीमा पर तलवारें निकलने तक की नौबत एक बार फिर आ गई.......मजबूरन भारत के पास भी एक ही चारा बचा और वो था पाकिस्तान को मोहताज बना देना......उस पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाना.....ये दबाव भी तभी कारगर होता जब विश्व पटल पर नामचीन देश पाकिस्तान को उसकी हरकत के लिए चेताते......और हुआ भी ऐसा.......अब वो अमेरिका पाकिस्तान से परे है जिसने कभी अफगानिस्तान पर किए हमले में पाकिस्तानी ऐयरबेस इस्तेमाल किया था.......साथ ही कई और देश भी ऐसे हैं......जो पाकिस्तान पर इस बात को लेकर दबाव बना रहे हैं कि वो भारत की हर संभव मदद करे ताकि आतंक पर लगाम लगाई जा सके। &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-803446280337721630?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/803446280337721630/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=803446280337721630' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/803446280337721630'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/803446280337721630'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='अलग-थलग पड़े पड़ोसी'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-7991328923829964997</id><published>2009-01-17T05:43:00.000-08:00</published><updated>2009-01-17T05:51:32.189-08:00</updated><title type='text'>कसक-2008</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;देख रहा था दूर सूर्य को&lt;br /&gt;सिर्फ अंधेरा पाया&lt;br /&gt;नवजीवन की इस बेला में&lt;br /&gt;घोर कष्ट था छाया&lt;br /&gt;मानव दानव बन बैठा है&lt;br /&gt;मन में छिपा कपट बैठा है&lt;br /&gt;इंतजा़र में बूढ़ी मां ने&lt;br /&gt;त्याग दिया इन आंखों को&lt;br /&gt;मन को मारा उस बेवा ने&lt;br /&gt;छीना जिसका पति उन्होंने&lt;br /&gt;ये इंतज़ार की सिसकन है&lt;br /&gt;ये सिसकन है उस धरती की&lt;br /&gt;जिस धरती पर खून बहा&lt;br /&gt;ये खून उन इंसानों का&lt;br /&gt;जो बेबस थे लाचार थे&lt;br /&gt;उन्हें तो ये तक न पता&lt;br /&gt;कि मौत का तमाशा कब&lt;br /&gt;उनके घर के बाहर होने लगे&lt;br /&gt;आंखों में कसक&lt;br /&gt;और ह्रदय में सिसकन&lt;br /&gt;उन लोगों के लिए है&lt;br /&gt;जिनके इंतजार में ये आंखें&lt;br /&gt;थक कर बूढ़ी हो जाएंगी&lt;br /&gt;लेकिन वो टूट चुकी सांसें&lt;br /&gt;अब दोबारा वापस न आयेंगीं...अनुपम मिश्रा &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-7991328923829964997?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/7991328923829964997/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=7991328923829964997' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7991328923829964997'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7991328923829964997'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2009/01/2008.html' title='कसक-2008'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-630406749351141156</id><published>2008-12-20T10:31:00.001-08:00</published><updated>2008-12-23T06:39:09.014-08:00</updated><title type='text'>ताजमहल हूं मैं...</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;color:#cc33cc;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc33cc;"&gt;&lt;strong&gt;मैं ताजमहल&lt;br /&gt;एक मोहब्बत का पैगाम&lt;br /&gt;शाहजहां और मुमताज&lt;br /&gt;की मोहब्बत का&lt;br /&gt;मेरे नाम ने सिखाई&lt;br /&gt;दुनिया को मोहब्बत&lt;br /&gt;और सिखाया&lt;br /&gt;भाईचारा&lt;br /&gt;मुझे देखा है दुनिया ने&lt;br /&gt;एक ऐसा ही ताज&lt;br /&gt;मेरा भाई है&lt;br /&gt;वो महाराष्ट्र की अंगड़ाई है&lt;br /&gt;वो ताज है&lt;br /&gt;मायानगरी का&lt;br /&gt;वो ताज है&lt;br /&gt;सपनों की नगरी का&lt;br /&gt;वो ताज है&lt;br /&gt;आमची मुंबई का&lt;br /&gt;बीते दिनों ने&lt;br /&gt;इसने इतना कुछ झेला&lt;br /&gt;जो और कोई होता&lt;br /&gt;तो कब का टूट जाता&lt;br /&gt;बिखर जाता&lt;br /&gt;सपनों का ये महल&lt;br /&gt;आतंकियों का शिकार हुआ&lt;br /&gt;ये दिन था २६ नवंबर 2008&lt;br /&gt;इसके बाद&lt;br /&gt;उन पूरी तीन रातों में&lt;br /&gt;ताज ने देखा वो सब&lt;br /&gt;जिसे देख हर किसी की&lt;br /&gt;आह निकल गई&lt;br /&gt;ताज की सुंदर छवि को&lt;br /&gt;ऐसा चोट लगी थी उस दिन&lt;br /&gt;कि तड़प आज भी बाकी है&lt;br /&gt;लेकिन उसकी टूटी सांसों का&lt;br /&gt;संसार अभी भी बाकी है&lt;br /&gt;उसको चोट देकर वो समझे&lt;br /&gt;टूटेगा हौंसला भारत का&lt;br /&gt;लेकिन पिछले सौ सालों में&lt;br /&gt;देखा उसने इतना था&lt;br /&gt;कि तोड़ न पाए वो जज़्बे को&lt;br /&gt;तोड़ न पाए साहस को&lt;br /&gt;आज कर रहा है फिर स्वागत&lt;br /&gt;जो न भूल सकेगा कोई&lt;br /&gt;क्योंकि मैं ताजमहल हूं&lt;br /&gt;एक मोहब्बत का पैगाम&lt;br /&gt;देश को एक रखने का नामअनुपम मिश्रा &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-630406749351141156?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/630406749351141156/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=630406749351141156' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/630406749351141156'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/630406749351141156'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2008/12/blog-post_20.html' title='ताजमहल हूं मैं...'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3281426352709699929</id><published>2008-12-11T06:52:00.000-08:00</published><updated>2008-12-11T06:54:45.340-08:00</updated><title type='text'>जब पत्रकारों को सताए भूख</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#cc33cc;"&gt;ऊंची ऊंची इमारते...उन पर बडी़ बडी़ छतरियां...और सड़कों पर वाहनो की लंबी कतार...ये है हमारी फिल्मसिटी की पहचान...ये फिल्मसिटी नोएडा की ऐसी अनोखी जगह है...जहां से ताबड़तोड़ ख़बरें निकलती है...ये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का गढ़ है...हर पत्रकार दौड़ता भागता दिखाई देता है...काम का ऐसा बोझ कि ज़िंदगी जीना ही कभी कभार याद नहीं रहता...ख़बरों के मायाजाल में एक बार फंसे तो समझो कि लंका लग गई...बहुत प्रेम होता है इन्हें ख़बरों से...कोई शिफ्ट नहीं होती बेचारे पत्रकारों की...बस सतत् ही काम में लगे रहो एक बैल की तरह...बेचारे कोल्हू के बैल को तो मालिक थोड़ा आराम दे देता है लेकिन ये बेचारे पत्रकार बेचारे ही रह जाते हैं....बड़े बदनसीब...इनका दर्द कोई नहीं समझ सकता...ये तो दर्द था पेशे का...लेकिन आजकल एक दर्द औऱ सता रहा है इन ख़बर के खिलाडि़यों को...वो है पेट की छुदा का दर्द...दरअसल हमारी फिल्मसिटी में कभी पेड़ों के नीचे खाने पीने की दुकानें हुआ करती थी...वहीं पास में सुट्टा बाज़ार भी लगा करता था...जिन से दिनभर थके पत्रकार बंधु नाश्ता पानी कर लिया करते थे...और टेंशन को धुएं में उडा़ दिया करते थे...लेकिन इन दिनों फिल्मसिटी में मंदी घुस गई है...सारी दुकानें सफाचट्ट...अब हमारे सामने मुसीबत ये है कि गम ग़लग करने को जाएं तो जाएं कहां...जहां कभी दुकाने हुआ करती थीं...उन पर कमेटी की ऐसी गाज गिरी कि अब सिगरेट के खाली खोखे भी नहीं दिखाई देते...बेचारे पत्रकारों की हालत देखने वाली होती है जंब लंच टाइम में बाहर निकलते हैं...भूख मइया उनके सिर पर सवार होती हैं...पेट में सैकड़ों चूहे उछल कूद कर रहे होते हैं...कहते हैं मुझे भूख लगी है खाना दो...अब मुद्दा ये है कि खाना लाएं कहां से...सो बेचारे 11 नंबर की साइकिल से इधर उधर फंटियाते फिरते हैं...लेकिन उनकी भूख मिटाने वाला कोई नहीं मिलता...कोई उनके दर्द को नहीं समझता...फिल्मसिटी की वो दुकानें ही तो सहारा थीं...आज भूख बहुत सताती है...&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-3281426352709699929?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/3281426352709699929/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=3281426352709699929' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3281426352709699929'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/3281426352709699929'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2008/12/blog-post_11.html' title='जब पत्रकारों को सताए भूख'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-9131077483993151235</id><published>2008-12-05T04:27:00.000-08:00</published><updated>2008-12-05T05:03:20.195-08:00</updated><title type='text'>शहादत के तीन दिन</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मैं मायानगरी हूं&lt;br /&gt;कुछ मुझे सपनों की नगरी कहते हैं&lt;br /&gt;तो कुछ कहते हैं देश धरा&lt;br /&gt;मैं सिखलाता लोगों को&lt;br /&gt;कैसे जीवन जाता जिया&lt;br /&gt;सिखलाया मैने ही उनको&lt;br /&gt;जीत दिलाकर जाना&lt;br /&gt;मेरी उम्मीदों के साए&lt;br /&gt;हर एक सफलता पाना&lt;br /&gt;लेकिन उस दिन हुआ कुछ ऐसा&lt;br /&gt;नज़र लग गई मुझको&lt;br /&gt;दिन 26 का&lt;br /&gt;माह नवंबर&lt;br /&gt;सन् दो हजा़र था आठ&lt;br /&gt;लोग व्यस्त से आने जाने में&lt;br /&gt;लौट रहे थे घर को&lt;br /&gt;कि अचानक हुए धमाकों ने&lt;br /&gt;थामा मेरी रफ्तार को&lt;br /&gt;सपनों की इस नगरी ने&lt;br /&gt;देखा लाशों के संसार को&lt;br /&gt;हर चौराहा, हर चौबारा रोया था&lt;br /&gt;चीख पुकार से&lt;br /&gt;बिखरा लहू, सिसकते लोग&lt;br /&gt;भाग रहे थे सड़कों पर&lt;br /&gt;आलम बदहवास था ऐसा&lt;br /&gt;जां पर बनी थी हर कोई पर&lt;br /&gt;गोली, गोलों और धमाकों&lt;br /&gt;के बिस्तर पर सोया मैं&lt;br /&gt;भारत मां से आज कहूं क्या&lt;br /&gt;कि फूटी किस्मत मेरी है&lt;br /&gt;इतना सबकुछ सहते सहते&lt;br /&gt;अब बस मेरी बारी थी&lt;br /&gt;अब जवाब देना था उनको&lt;br /&gt;सांसें थामी जिन दहशतगर्दों ने&lt;br /&gt;तैयार हो गए, वीर हमारे&lt;br /&gt;एक और शहादत को&lt;br /&gt;लहू बहे तो कोई बात नहीं थी&lt;br /&gt;फिर उन्ही जवानों की टोली थी&lt;br /&gt;तैयार हुए थे मां के बेटे&lt;br /&gt;दुश्मन को धूल चटाने को&lt;br /&gt;न माफी देंगे&lt;br /&gt;देंगे गोली&lt;br /&gt;ली हैं जान जिन्होंने मेरी&lt;br /&gt;घायल ताज, तड़पता नरीमन&lt;br /&gt;चीख चीख कर कहता मुंबई&lt;br /&gt;आज गिरा दो लाशे उनकी&lt;br /&gt;ली है जान जिन्होंने अपनी&lt;br /&gt;हर विधवा की कसम है तुमको&lt;br /&gt;हर बूढे़ को आस है&lt;br /&gt;आस आज उस मां को भी है&lt;br /&gt;छीना जिसका बेटी बेटा है&lt;br /&gt;आज निभाना फर्ज है तुमको&lt;br /&gt;खोया जिनका कोई अपना है&lt;br /&gt;इन्ही कसमों को याद किया था&lt;br /&gt;उन जब वीरों ने&lt;br /&gt;लहू बहे या जां जाए&lt;br /&gt;अब फिक्र नहीं थी लोगों को&lt;br /&gt;बस मकसद था&lt;br /&gt;बस हसरत थी&lt;br /&gt;दिल में यही तमन्ना थी&lt;br /&gt;मिट्टी में मिल जाए दुश्मन&lt;br /&gt;बस बाकी यही तमन्ना थी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-9131077483993151235?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/9131077483993151235/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=9131077483993151235' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/9131077483993151235'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/9131077483993151235'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='शहादत के तीन दिन'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-7025019679453612792</id><published>2008-11-22T16:15:00.000-08:00</published><updated>2008-11-22T16:21:20.487-08:00</updated><title type='text'>रात के सौदगर...</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;हाड़ कंपा देने वाली सर्दी शुरू ही होने वाली है....देर रात दो बजे के बाद का समय है...सन्न सन्न सरपट दौड़ती गाड़ियों की आवाज़...और जगह दिल्ली का दिल कहा जाने वाला कनॉट प्लेस का इलाका...दिन भर की आपा धापी के बाद देर रात शायद इसी जगह का एक इलाका शिवाजी स्टेडियम ही शायद चहल पहल का पर्याय बनता है...ये चहल पहल होती है उन ख़बर दारों की जो इलैक्ट्रॉनिक मीडिया से...ताल्लुक रखते हैं...यानी रात्रि प्रहरी जब ख़बर लेने निकलते हैं...तो देर रात उनका शिवाजी स्टेडियम ही ठिकाना बनता है...हर एक को तलाश होती है एक ख़बर की...एक दूसरे की कैब का इंतज़ार करते लोग...एक चीज़ को बडी़ बेसब्री से तलाशते हैं...मतलब तो आप शायद ही समझें...लेकिन एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुडा़ पत्रकार ये बडी़ आसानी से बता देगा कि वो कौन सी तलाश है जिस पर सारे के सारे ख़बरी आंखे गड़ाये देखते रहते हैं...चलिए बता ही देते हैं...एक शब्द है ट्रांसफर...हिंदी में जिसे कहते हैं हस्तांतरण...यानि लेन देन...ये लेन देन होता है ख़बरों का...अब आप सोंच रहे होगे कि कैसे होता है ख़बरों का हस्तांतरण तो हम आपको बताते हैं...इस पूरे खेल का मज़ा...शुरू करते हैं एक ख़बरी माध्यम से...दिल्ली के नांगलोई में एक वारदात हो जाती है जिसे वो ख़बरी माध्यम सबसे पहले कवर करके ले आता है...लेकिन वो इस ख़बर को लेकर दफ्तर नहीं जाता...पहले दस्तक देता है शिवाजी स्टेडियम...जहां पहले से ही मौजूद पत्रकार गण इस इंतजार में होते हैं...कि कब वो ख़बरी माध्यम ख़बर लाए...और हम कैमरा टू कैमरा उसके विज़ुअल अरेंज कर लें...अब तो सारा माजरा समझ आ ही गया होगा...इनकी यूनियन इतनी तगड़ी है कि कोई ख़बर किसी से छूटती ही नहीं...कोई न कोई ख़बरी माध्यम बनकर ट्रांसफर दे ही देता है...ये तो बात थी ट्रांसफर की लेकिन अब बात नांगलोई वाली ख़बर पर जिरह की...ख़बरी माध्यम वाला संवाददाता कहता है ख़बर मजेदार है बाइट भी है पैकेज चल जाऐगा...आसाइंन्मेंट को भी पटा लेंगे...तभी राम लाल बोले जो एक दूसरे चैनल से ताल्लुक रखते थे...बोले अरे यार विज़ुअल दमदार नहीं हैं...एंकर विज़ुअल से ही काम चलाना पडे़गा...राम लाल की बात पूरी हुई नहीं कि लल्लू बोल पडे़ बोले इसलिए कि वो भी उन्हीं पत्रकार बंधुओं में से एक थे...बोले यार ऐसा है ...ये ख़बर कुछ जंच नहीं रही...क्योंकि पुलिस ने तो बाइट दी ही नहीं...बीच में ही काटते हुए पप्पू ने कहा बिल्कुल पुलिस की बाइट नहीं है विज़ुअल भी ढंग के नहीं हैं तो कैसी स्टोरी कैसा पैकेज और कैसा ऐंकर विज़ुअल...कहो तो ड्रॉप करवा दें...इतना कहना था कि सबकी सहमति हो गई...हां चलो ठीक है...ड्रॉप कर देते हैं स्टोरी...और इस तरह एक स्टोरी असाइंन्मेंट तक भी नहीं पहुंच पाई...बेचारा ख़बरी माध्यम इतनी मेहनत से कड़कड़ाती ठंड में स्टोरी करके लाया था...और इस तरह ठंड में लाई गई वो स्टोरी शिवाजी स्टेडियम में ही बनकर ऑनएयर हो गई...अनुपम मिश्रा...&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2007056638468959805-7025019679453612792?l=khabarloongasabki.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/feeds/7025019679453612792/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2007056638468959805&amp;postID=7025019679453612792' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7025019679453612792'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2007056638468959805/posts/default/7025019679453612792'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khabarloongasabki.blogspot.com/2008/11/blog-post.html' title='रात के सौदगर...'/><author><name>anupam mishra</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03356533737754609259</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_GB_9lfD3h_E/S_KoQkjt_FI/AAAAAAAAAGA/g4m1tWwnIq0/S220/New+Image.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2007056638468959805.post-3422211316814064247</id><published>2008-10-23T22:38:00.000-07:00</published><updated>2009-01-17T06:12:56.686-08:00</updated><title type='text'>अपने तो,अपने होते है...</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#cc33cc;"&gt;वक्त की नज़ाकत कहती है कि बदल जाओ.........अब वो समय नहीं रहा .....अब वो अपने, जो कभी लंगोटी में साथ साथ खेला करते थे बडे़ हो गए हैं, पतलून पहनने लगे हैं......तो मैने भी काफी दिमाग लगाया कि कहीं वक्त मुझे बरगला तो नहीं रहा , कही इसके मन में मेरे खिलाफ कोई चोर चो नहीं। जो मुझे पुचकार कर कह रहा है कि बदल जाओ। मैं भी ऐसे नहीं मानने वाला, इतनी जल्दी नहीं बदलने वाला था। अब वक
